Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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1104 सूत्र · पृष्ठ 10 / 15

गर्भपात, शराबी, चोर तथा व्रत तोड़ने वाले के लिए शास्त्र में प्रायश्चित्त का विधान है परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया गया है।
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सुसंस्कृत स्वभाव इस बात को जानकर परेशान होता है कि कोई उसके प्रति आभार मानता है किन्तु विकृत स्वभाव यह जानकर परेशान होता है कि वह स्वयं किसी के प्रति आभारी है।
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गुणज्ञों को शत्रुओं के भी गुणों से आनन्द होता है।
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अपने श्रेष्ठ गुणों से अलंकृत होकर कुरुप मनुष्य भी दर्शनीय हो जाता है, जैसे अष्टावक्र किन्तु गंदे दोषों से व्याप्त होकर रूपवान भी कुरूप हो जाता है जैसे रावण।
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मुझसे कोई पूछे कि जीवन किसे कहते हैं तो मैं उसकी व्याख्या करूँगा, संस्कार संचय को। जीवन की छोटी अवधि हमें लम्बी-चौड़ी आशाएँ करने से मना करती है।
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जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाये, वह दुष्ट है।
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लज्जा का आकर्षण सौन्दर्य से भी बढ़कर है।
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लज्जा शीलता मानव का अलंकार है, बुद्धिमान में यह न हो तो मान सहित चलना भी एक व्याधि है।
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महापुरुष घोर विपत्ति के समय भी धैर्य नहीं छोड़ते हैं, अधिक उन्नति होने पर क्षमाशील बने रहते हैं, सभा में बोलते हुए वाक पटु दिखते हैं, युद्ध के समय पराक्रम धारण किए रहते हैं, यश प्राप्त करने में अभिरुचि होती है, शास्त्रों के अध्ययन का उन्हें बड़ा चस्का होता है ये सभी गुण सज्जन पुरुषों में स्वभाव से ही पाए जाते हैं।
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पुष्प भले ही अपने वृक्ष का नामोल्लेख न करें किन्तु उसकी सुगन्ध उसके उत्पादक वृक्ष का नामोल्लेख कर देती है उसी प्रकार व्यक्ति का व्यवहार उसके कुल का परिचय दे देता है। भले और बुरे का पता उसकी सन्तान से चलता है।
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उन बातों से सदा दूर रहो जो तुम्हें नीचे गिरा देंगी, चाहे वे प्राण रक्षा के लिए अनिवार्य रूप से ही आवश्यक क्यों न हों।
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आपके व्यक्तित्व का आइना होती है, आपकी वेशभूषा।
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दो के बीच बात हो रही हो और आवश्यक हो तो कहे 'क्षमा करें' आपको दखल देना पड़ रहा है यह कहकर ही बात करें, किसी के कमरे में संकेत देकर ही जाये।
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मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान् बनता हैं।
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शिक्षक, चिकित्सक, संत और शासक पथभ्रष्ट नहीं होना चाहिए संत की इच्छा शक्ति और शासक की कार्यशक्ति एक हो तो देश की तस्वीर बदल सकती है।
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नैतिक शिक्षा—समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, हमें नैतिक मूल्यों की,
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किसी व्यक्ति के जीवन की ऊँचाई मापने के तीन पैमाने हैं, हृदय की मधुरता, उदारता और विनम्रता।
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विभीषण रावण के राज्य में रहता था फिर भी नहीं बिगड़ा और कैकयी राम के राज्य में रहती थी फिर भी नहीं सुधरी, तात्पर्य सुधरना एवं बिगड़ना केवल मनुष्य के सोच और स्वभाव पर निर्भर है सिर्फ माहौल पर नहीं है।
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एक छोटी सी अच्छाई भी आत्मा को ऊर्जा से भर देती है।
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यदि जीवन में निर्दोष हो तो कभी सफाई मत देना।
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आदमी कितना जिया यह मत देखो, आदमी कैसे जिया यह देखो।
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गैरों की बेटी पर जान देते हो, अपनी बेटी गर्भ में आती है तो जान लेते हो।
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आपके कारण किसी की आँखों में आँसू आये तो आपका जीवन निष्फल है और आपके लिए किसी की आँख में आँसू आये तो आपका जीवन सफल है।
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खिल सको तो फूल की तरह, बिखर सको तो खुशबू की तरह, जल सको तो दीप की तरह, ढल सको तो धातु की तरह, मिल सको तो दूध में पानी की तरह मिलना।
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इज्जतदार लोग ही इज्जत करते हैं क्योंकि जिसके पास जो होता है वही देता है।
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शख्सियत अच्छी होगी तभी दुश्मन बनेंगे, वरना बुरे की तरफ देखता कौन है।
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चमत्कार को नहीं चारित्र को नमस्कार करो, क्योंकि विषय वासना से बचने वाला ही वीर होता है।
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जलना छोड़ो प्रकाशित होना सीखो, प्रकाश में दुनिया प्रसन्न होती है, जलने वाला तो राख होने से पहले ही खोटी स्मृति रूपी दुर्गन्ध छोड़ जाता है। इतिहास कहता है उधार और वरदान नहीं देना चाहिए।
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उपकार भूलने वाला पापी और उपकारी का भी अपकार करने वाला महापापी होता है।
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गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, जन्म में क्या रखा है? रेशमी वस्त्र कीड़ों से उत्पन्न होता है, कमल कीचड़ में जन्म लेता है, नीलकमल गोबर से उद्भूत होता है, अग्नि काष्ठ से उत्पन्न होती है, मणि सर्प के फण से उपलब्ध होती है और गोरोचन गाय के पित्त से प्रकट होता है फिर भी गुणों के कारण मान्य हैं।
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जीवन एक पुष्प है और सबसे प्रेम करना उसका रस है 'योगी न बनो पर उपयोगी अवश्य बनो'।
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ऐसे जियो कि दूसरे आपसे जीना सीखें।
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दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा करना मनुष्य के जीवन का सबसे अच्छा अंत है।
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अधिकारों के साथ कर्त्तव्यों का ध्यान रखना चाहिए।
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मीठे वचन से मित्रता, विनय से गुण, दान से यश, अभ्यास से विद्या, उदारता से विश्वास, श्रृंगार से अनुराग, संसर्ग से प्रेम, उद्यम से लक्ष्मी, न्याय से राज्य, लोभ से मोह, क्रोध से अपराध और सेवा से सम्मान बढ़ता है।
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बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो अच्छाई के सामने छोटी लगती है।
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जिस दिन आपको यह पता चलेगा कि नेकी करने से शान्ति मिलती है तो आप बुरा काम करना छोड़ देंगे।
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महान् स्थान पर बैठकर आदमी महान् नहीं होता बल्कि महान् आदमी जहाँ बैठ जाता है वह स्थान महान् बन जाता है।
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भगवान् की नजरों में वो इंसान बड़ा नहीं जो करोड़ों रुपये कमाता है बल्कि वो इंसान बड़ा है जो करोड़ों के दिलों पर राज करता है।
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इंसान सुखी होने के लिए घर बदलता है, कपड़े बदलता है, गाड़ी, मोबाइल नम्बर, पता और पता नहीं क्या-क्या बदलता है फिर भी वो सुखी नहीं हो पाता क्योंकि वो अपना स्वभाव नहीं बदलता है। खुद की नजरों में ईमानदार बनो।
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सच्ची प्रशंसा वही है जो पीठ पीछे होती है।
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बुराई नौका में छिद्र के समान है वह छोटी हो या बड़ी एक दिन नौका को डुबो देती है। हमारा व्यवहार और शब्द शत्रु और मित्र बनाते हैं।
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मध्यस्थ मनुष्य सभी को प्यारा होता है।
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समुद्र खारा, चन्द्रमा कलंकित, सूर्य तीक्ष्ण, मेघ चपल, आकाश शून्य, कामधेनु पशु, कल्पवृक्ष काष्ठ, चिन्तामणि पाषाण है अतः सज्जनों की समानता किससे हो? अर्थात् सज्जन इन सबसे भी श्रेष्ठ होते हैं।
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नीति से रहित नेता, विनय से रहित शिष्य, शील रहित साधु, शान्ति से रहित साधक, पुण्य रहित आत्मा और धन रहित गृहस्थ कुछ भी नहीं है।
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पात्रता के बिना न संसार में कोई रिश्ता है और न इसके बिना अध्यात्म क्षेत्र में कोई रास्ता है।
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मित्र को निष्कपट व्यवहार से, शत्रु को नीति बल से, राजा को कार्य से, ठाकुर को आदर से, स्त्री को अत्यधिक प्रशंसा से, रसिक को रस से, सबको शील से वश करें।
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उनका विश्वास मत करो जिनकी भावनाएँ वक्त के साथ बदल जाएँ, विश्वास उनका करो, जिनकी भावनाएँ वैसी ही रहें, जब आपका वक्त बदल जाये तब भी।
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विषमता मानवता की खोज करा देती है।
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विचार का दीपक बुझ जाने पर आचार अंधा हो जाता है।
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आचरण रहित विचार कितने ही अच्छे क्यों न हो उन्हें खोटे मोती की तरह समझना चाहिए, अच्छे विचार समय, श्रम व धन की बचत करते हैं।
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जो मिठास गन्ने और शक्कर में नहीं होती वह स्वभाव में होती है।
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पहले का रावण बोल रहा है—क्या मेरे बाद किसी ने कोई घोर अपराध नहीं किया इस सारी पृथ्वी पर? हजारों रावण खुलेआम घूम रहें हैं फिर बार-बार कब तक मेरा पुतला जलाते रहोगे?
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आपका सम्मान उन शब्दों में नहीं जो आपकी उपस्थिति में कहे गये बल्कि उन शब्दों में है जो आपकी अनुपस्थिति में कहे गये हैं।
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मुख का आभूषण प्रियवचन, वक्षस्थल का प्रेम, नेत्रों का जिनदर्शन, हाथों का पात्रदान, पैरों का आभूषण तीर्थ वंदना हैं, साधु का आभूषण समता है।
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सभ्यता का स्वरूप-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता।
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जो संन्यासी नहीं होते हुए भी संन्यासी का वेश धारण कर अपनी आजीविका चलाता है, वह वास्तविक संन्यासी के पाप को प्राप्त होता है और मरकर तिर्यंच योनि में जन्म लेता है।
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पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है, फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।
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ईमानदारी से पेट भर सकता है पेटी नहीं, शुद्ध छने जल से बर्तन भर सकता है समुद्र नहीं।
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शांत, सरल स्वभावी का सब अनुसरण करते हैं।
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तीन चीजें जीवन के सबसे बड़े खजाने हैं—१. जीवन में सरलता, २. संघर्ष और कठिन समय में धैर्य, ३. दूसरों के प्रति सहानुभूति।
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तीन सबसे बड़ी उपाधि—१. शहीद, २. वीर, ३. संत।
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सदाचारी व्यक्ति सर्वत्र विश्वास का पात्र होता है।
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अच्छा स्वभाव शहद की मक्खी की तरह है, जो प्रत्येक झाड़ी से शहद ही निकालती है।
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मधुर स्वभाव वास्तव में एक जादू है, धन की अपेक्षा इसकी शक्ति अधिक है हीरे मणियों से बढ़कर इसका मूल्य है। मधुर स्वभाव एक सुगन्ध है, जिसका सौरभ धरती को स्वर्गीय सुरभि से भर देता है।
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चंदन घिसे जाने पर अधिक सुन्दर गंध छोड़ता है, गन्ना चूसने पर स्वादिष्ट लगता है, सोना जलाने पर सुंदर वर्ण ही रहता है, वैसे ही प्राणान्त होने पर भी उत्तम व्यक्तियों का स्वभाव विकृत नहीं होता है।
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ईमानदार होना, 'दस' हजार में 'एक' के बराबर होना है।
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बड़ी से बड़ी सम्पत्ति ईमानदारी के सामने तुच्छ है।
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प्रसिद्ध होने के बजाय ईमानदार होना अधिक अच्छा है।
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स्वभाव एक उपार्जित गुण है उसमें शिक्षा और सत्संग से सुधार हो सकता है।
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जिस मनुष्य का व्यवहार मधुर होता है, उसका कोई विरोध नहीं करता जो किसी से द्वेष नहीं करता, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता है ऐसे मनुष्यों को अनेकों सुख स्वयमेव मिलते रहते हैं।
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सज्जन चाहे फटे हाल ही हो, बड़प्पन के पूरे ठाठ वाले दुर्जन से अधिक शक्तिशाली होता है।
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स्वाभिमानी मनुष्य मर मिटता है, पर किसी के सामने दीन नहीं बनता है आग बुझ भले ही जाये, पर जीवित रहते वह ठंडी नहीं होती है।
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कोयल का सौन्दर्य उसके स्वर में है, स्त्री का सौन्दर्य उसके पतिव्रत धर्म में है, कुरूपों का सौन्दर्य विद्या में है और तपस्वियों का सौन्दर्य क्षमा में है।
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जिस सौन्दर्य में भोलेपन की झलक नहीं, वह बनावटी सौन्दर्य है।
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