Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 374

प्रतिक्रमण। प्रतिक्रमण विधान।

19 सूत्र

वचनगुप्ति- पाप के हेतु स्त्री कथा, राज कथा, चोर कथा और भोजन कथा न करना तथा झूठ आदि वचनों से निवृत्ति होना वचनगुप्ति है अथवा मौन रहना वचनगुप्ति है।
वाणी
कायगुप्ति- बाँधना, छेदना, मारण, हाथ-पैर का सङ्कोच विस्तार आदि काय क्रिया की निवृत्ति व्यवहार काय गुप्ति है, कायक्रिया निवृत्ति या कायोत्सर्ग कायगुप्ति है।
संयम
समितियों में भी गुप्ति का सद्भाव है, अतः अणुव्रती महाव्रती दोनों को आवश्यक है, उसके विना व्रती तो हो सकता है पर संयमी नहीं होता है।
संयम
परिहार विशुद्धि चारित्र वाले साधु प्रश्नकर्ता का सन्देह निवारण हेतु, धर्म कार्य की अनुज्ञा हेतु एवं स्वयं प्रश्न करने हेतु तीन जगह बोलते हैं।
धर्म
जो रत्नत्रय को प्राप्त किये विना साक्षात् ध्यान करने की इच्छा करता है वह मूर्ख आकाश के फूलों से वन्ध्यापुत्र का सेहरा बनाना चाहता है।
ध्यान
नेत्रगोचर जीवों को बचाकर गमन करने वाले मुनि के ईर्यासमिति होती है, यह ईर्यासमिति व्रतोंमें शुद्धि करने वाली मानी गयी है।
अहिंसा
वर्तमान में मुनि जिनालय में निवास करते हैं, जिससे श्रावकों के लिए धर्मोपदेश का दान हो जाता है।
धर्म
यदि मुनि घुटने तक जल में प्रवेश करें तो उसका प्रायश्चित्त एक कायोत्सर्ग है और घुटने से चार अङ्गुल ऊपर प्रवेश करें तो एक उपवास प्रायश्चित्त होता है, इसके आगे चार-चार अङ्गुल गहरे पानी में प्रवेश करने पर दूना-दूना प्रायश्चित्त होता है।
धर्म
तप से हीन ज्ञान मान्य है और ज्ञान से हीन तप पूज्य है, जिसके ज्ञान और तप दोनों होते हैं वह देव होता है और जो दोनों से रहित है वह केवल मनुष्य की संख्या पूरी करने वाला है।
ज्ञान
राजा श्रेणिक की तेतीस सागर की आयु पश्चात्ताप से चौरासी हजार वर्ष सिंधु में बिंदु के समान रह गयी थी।
कर्म
प्रतिक्रमण- घर की सफाई प्रति दिन की जाती है फिर भी पक्ष आदि बीतने पर विशेष रूप से सफाई की जाती है वैसे ही प्रतिक्रमण भी प्रतिदिन किया जाता है पर पाक्षिक विशेष रूप से किया जाता है, जो साधु भाव प्रतिक्रमण से युक्त होकर और उसके अर्थ में मन लगाकर सदा प्रतिक्रमण सूत्र को पढ़ता है, वह कर्मों की महान निर्जरा करता है।
धर्म
ऊपरी गुणस्थानों में अर्थात् मुनियों के आत्मध्यान से ही दोषों का परिमार्जन हो जाता है।
ध्यान
प्रतिक्रमण विधान- आदिनाथ भगवान् व महावीर भगवान् के समय प्रतिदिन प्रतिक्रमण करने का विधान है, शेष बाईस तीर्थंकरों के समय सब व्रतों में आहार, विहार, दुःस्वप्न, ईर्यापथ आदि में दोष लगें तब प्रतिक्रमण करते थे, मध्यम तीर्थंकरों के समय शिष्यों के बुद्धिकौशल था, पराक्रम सुदृढ़ था, चित्त एकाग्र और स्वलक्ष्य में दृष्टि रहती थी, किन्तु प्रथम और ''अन्तिम तीर्थंकर के समय शिष्य अज्ञानी व चञ्चल चित्त हैं, अपने अपराधों की स्मृति नहीं रहती है, अतः सबका प्रतिक्रमण करते हैं''।
धर्म
मोक्ष के साधन में अनुपयोगी नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का परमार्थ से सेवन नहीं करना चाहिए, परमार्थ से अर्थात् उपसर्ग आदि के कारण अयोग्य का सेवन होने पर भी प्रत्याख्यान में हानि नहीं होती है, शुद्धोपयोग में सहायक नामादि का सेवन मन को पवित्र करता और ''सदा अपराध की गन्ध से दूर रहने वाला साधु रत्नत्रय का आराधक होता है''।
धर्म
जिस प्रकार ताला खोलने के लिये चाबी सीधी घुमाई जाती है और लगाने के लिये उल्टी, उसी प्रकार ''जिन रागादि भावों से कर्म आश्रव किया था, अब उनसे विपरीत 'वीतराग' भावों को बनाओ तो संवर निर्जरा होती है''।
कर्म
पर द्रव्य का ग्रहण स्वात्मोपलब्धि का विरोधी है, ''जिसके प्रमाद का लेश भी नहीं रहता वह साधु अवश्य ही मोक्षमार्ग का आराधक होता है''।
अनासक्ति
आचार्य शिवसागर जी ने स्वाध्याय किया, पण्डित पन्नालाल जी शास्त्र विराजमान करने गये तो आचार्यश्रीजी पीछे से आये और कहा! रुको, उन्होंने मार्जन किया, फिर शास्त्र जी विराजमान किया और कहा! प्रतिष्ठापन समिति हमारी है भैया।
विनम्रता
हवाई जहाज उड़ने लगता है तो पहिये बन्द हो जाते हैं, उतरने लगता है तो खुल जाते हैं, उसी प्रकार मुनि ध्यान में बैठते हैं तो समिति बन्द होकर, गुप्ति में आ जाते हैं, बाहर आते हैं तो समिति प्रारम्भ हो जाती है।
ध्यान
जैसे सूखे सरोवर से हंसों का समूह उड़ जाता है उसी प्रकार वैयावृति से रहित पुरूष के पास व्रतों का समूह नहीं ठहरता है।
धर्म