Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 365

मिलावट। पाँच मार्ग। लड़की की जिद।

18 सूत्र

'मूर्च्छा परिग्रहः'- यह निर्दोष लक्षण है, यदि बहिरङ्ग पदार्थों को परिग्रह का लक्षण बनावेंगे तो पशु निष्परिग्रही हो जायेंगे और तीर्थंकर आदि भी परिग्रही हो जायेंगे।
अनासक्ति
अगर कर्म बन्ध से बचना है तो घर को आश्रम बनाकर अतिथि की तरह रहो और कुछ भी अपना मत मानो।
अनासक्ति
वर्णीजी चिरोंजाबाई के साथ गोमटेश यात्रा को गये, वहाँ वर्णीजी स्नान करने नदी पर गये, नहाते समय पैसों का पर्स अलग रख दिया, वर्णीजी ने नहाया, कमरे में आ गये, भोजन करने बैठे तब पैसों का पर्स याद आया, जैसे-तैसे भोजन किया, नदी पर गये महिलायें पानी भर कर आ रहीं थीं, पर्स वहीं पड़ा था, वर्णीजी ने उनसे पूँछा, आपने पर्स को क्यों नहीं उठाया? उन्होंने जबाव दिया, हम गोमटेश के राज्य में विना दी हुयी वस्तु को कभी नहीं छूते, यह एक आश्चर्यकारी घटना थी।
चरित्र
एक व्यक्ति जीवन से परेशान होकर विष लेने बाजार गया, विष लाया खाया और सो गया, सुबह स्वस्थ होकर उठा, वह सोचता है, कि खुदा को मेरी मृत्यु मञ्जूर नही है, अब मजे से जीवन जीते हैं, वह बाजार गया चार पेड़ा लाया, और खाकर सो गया, वह आज तक नहीं उठा, सोचो जहर खा के जी गया, पेड़ा खा के मर गया।
विविध
पाँच मार्ग- 'बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह' 'नरकायु' के आस्रव के कारण हैं। 'अल्प आरम्भ और अल्पपरिग्रह' 'मनुष्यायु' के आस्रव के कारण हैं। 'मायाचारी' 'तिर्यञ्चायु' का कारण है। 'सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा, बालतप और सम्यग्दर्शन' 'देवायु' के आस्रव के कारण हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्ष का मार्ग है।
कर्म
भिखारी राजा बना उसने अपने कपड़े सम्भाल कर रखे, ये हमारा इतिहास है, इसी तरह अपने को भी 'काल अनन्त निगोद मझार' इसको पढ़कर अपना इतिहास याद रखना चाहिए।
विविध
लड़की ने जिद की, कि मैं नए कपड़े पहनूँगी पुराने नहीं, वह ठण्ड में काँप रही थी, उससे पूँछा क्या हो गया? उसने बोला पुराने कपड़े पहनना नहीं है नए कपड़े माँ देती नहीं है इसलिए ठण्ड में काँप रही हूँ। इसी प्रकार पञ्चम् काल में शुद्धोपयोग होता नहीं है। शुभोपयोग से संवर-निर्जरा के साथ बन्ध भी होता है, यदि बन्ध के भय से शुभोपयोग को नहीं अपनायेंगे तो अशुभोपयोग ही हाथ लगेगा और उससे दुर्गति में जाना पड़ेगा।
धर्म
द्रव्य क्षेत्र काल भाव- 1.द्रव्य-प्लेटफॉर्म का टिकिट/ट्रेन का टिकिट, 2.क्षेत्र-छोटी लाइन/बड़ी लाइनका टिकिट, 3.काल-आज का टिकिट कल नहीं चलेगा, 4.भाव-थर्डक्लास का टिकिट फर्स्टक्लास में नहीं चलता है।
ज्ञान
व्रत अङ्गीकार करना, याने आत्मा को हल्का बनाना है।
धर्म
जो व्रत पहली प्रतिमा में एक पैसे के बारबर होते हैं, वे ही व्रत ग्यारहवीं प्रतिमा में निन्यानवें पैसे के समान हो जाते हैं, क्षत्रिय तो महाव्रत लेते हैं, अणुव्रतों को लेना तो बनियों का काम है।
धर्म
कालसौकरिक कषायी ने हिंसा नहीं की, उसके पिता ने बहुत समझाया, उसने कहा हिंसा से जो दुःख होगा उसको तुम लोग बटाओगे? सबने हाँ कह दिया, उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली, कहा दुःख हो रहा है बटाओ, लोगों ने कहा बेटा दुःख तो तुम को ही भोगना पड़ेगा, हम संवेदना प्रकट कर सकते हैं, कालसौकरिक कषायी की इस घटना से उस सहित पाँच सौ कषायी अहिंसक बन गये थे।
अहिंसा
''आनयनप्रेष्यप्रयोग''-पाँच इन्द्रिय रूपी टेलीफोन तो अपने पास हमेशा रहते हैं, फिर भी टेलीफोन रखते हैं, जिससे आकुलता कई गुनी बढ़ जाती है।
अनासक्ति
व्रतों की पाँच-पाँच भावनायें- बिजली के खम्बे की मजबूती के लिये आजू बाजू में दो तार कस देते हैं ताकि गिरे नहीं इसी प्रकार व्रतों की मजबूती के लिये पाँच-पाँच भावनायें हैं।
धर्म
रत्नकरण्डक श्रावकाचार की वचनिका के अंतिम अध्याय में एक सौ आठ प्रकार की भावनाओं का वर्णन है जो पढ़ने योग्य है।
धर्म
जो ज्यादा वचन बोलता है, उससे अहिंसा का पालन नहीं होता है।
वाणी
ट्यूब में हवा एक सीमा तक भरी जाती है, अधिक होने पर ट्यूब फट जाता है, इसी प्रकार धन की सीमा होना जरूरी है अन्यथा नरक की ही तैयारी होती है।
संतोष
व्रतों को अङ्गीकार करने वालों के अतिचार कहे हैं, लेकिन अव्रती तो सदा अनाचारी ही है।
धर्म
''स्त्री रागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वरतानुस्मरण वृष्येष्टरस स्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च''-इस सूत्र से पाँचों इन्द्रियों का संयम हो जाता है।
संयम