Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

'मूर्च्छा परिग्रहः'- यह निर्दोष लक्षण है, यदि बहिरङ्ग पदार्थों को परिग्रह का लक्षण बनावेंगे तो पशु निष्परिग्रही हो जायेंगे और तीर्थंकर आदि भी परिग्रही हो जायेंगे।

'Murchha parigrahah' (attachment is possession)—this is a flawless definition; if outer objects are made the mark of possession, then animals would become possessionless and even the Tirthankars would become possessive.

— आराध्य सूत्र · #5

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति