Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 347

परिणाम। मध्यलोक का वर्णन।

35 सूत्र

नरक में आठ प्रकार के दु:ख- 1.पृथ्वी, 2.नदी, 3.वृक्ष, 4.गर्मी, 5.ठण्डी, 6.परस्पर में लड़ने का दु:ख, 7.भूख, 8.प्यास।
कर्म
'परिणाम' स्पर्श- हजार बिच्छू काटें उससे अधिक पृथ्वी के स्पर्श का कष्ट है। रस- हलाहल जहर के समान रस का कष्ट है। गन्ध- सप्तम नरक की मिट्टी का चने के बराबर दाना मध्यलोक में आ जाये, तो 'साड़े चौबीस' कोस के पञ्चेन्द्रिय जीव उसकी दुर्गन्ध से मर जायेंगे। रूप- नारकियों का रूप देखने मात्र से हार्टफैल हो जाये। देह- नारकियों का शरीर समस्त रोगों से ग्रसित होता है एवं नरक में कोई औषधि नहीं मिलती है।
कर्म
नरक में ऊपर के बिलों में ऊष्ण वेदना और नीचे के बिलों में शीतवेदना होती है, तथा वहाँ अपृथक् विक्रिया होती है जो भी विक्रिया करते हैं स्वयं के शरीर में ही होती है।
कर्म
जैसे पानी में डण्डा मारें तो पानी उचटता है और फिर उसी में मिल जाता है, उसी प्रकार नारकियों का शरीर तिल-तिल बराबर टुकड़े होने पर फिर से मिल जाता है मरते नहीं हैं पर पीड़ा अत्यधिक होती है।
कर्म
जैसे उल्लू को रात्रि में स्पष्ट दिखता है उसी प्रकार नरक में अन्धकार होने पर भी नारकियों को स्पष्ट दिखाई देता है।
कर्म
अम्बावरीष जाति के असुर अगर लड़ाई कराना बन्द कर दें, तो तीसरे नरक तक आधा दु:ख कम हो जायेगा।
कर्म
मध्यलोक का वर्णन- पहले सुषमासुषमा काल में शरीर की अवगाहना तीन कोष, दूसरे सुषमा काल में दो कोष, तीसरे काल में एक कोष की अवगाहना, चौथे काल में पाँच सौ धनुष, आयु भी इसी क्रम से तीन पल्य, दो पल्य व एक पल्य, एक कोटि वर्ष पूर्व उत्कृष्ट आयु होती है।
Misc.
जम्बूद्वीप को आदि लेकर स्वयम्भूरमण तक एक नाम वाले असंख्यात द्वीप समुद्र हैं, क्योंकि शब्द संख्यात हैं और द्वीप-समुद्र असंख्यात हैं।
Misc.
नन्दीश्वर का विस्तार एक अरब, त्रेसठ करोड़, चौरासी लाख योजन है, एक दिशा में तेरह जिनालय हैं, चारों दिशाओं में बावन जिनालय हैं।
भक्ति
तीर्थङ्कर उनके माता-पिता, बलभद्र, चक्रवर्ती, अर्धचक्रवर्ती, देव और भोगभूमि के जीवों का आहार होता है पर नीहार नहीं होता है।
Misc.
देव-नारकी, भोगभूमि के जीव, चक्रवर्ती, तीर्थङ्कर, नारायण, बलभद्र एवं कामदेव इनकी दाड़ी-मूँछ नहीं होती है।
Misc.
महाविदेह में एक-एक क्षेत्र के आश्रित छियानवे करोड़ गाँव होते हैं, नगर, मटम्ब, पत्तन आदि सब इसी में गर्भित हैं।
Misc.
एक-एक विजयार्द्ध पर एक सौ दस-एक सौ दसविद्याधरों की नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी के आश्रित एक-एक करोड़ नगर हैं, इस तरह ढाईद्वीप में एक सौ सत्तर विजयार्द्ध हैं और अठारह हजार सात सौ कुल उनकी नगरियाँ हैं, पाँच अरब कुल जनसंख्या है।
Misc.
मध्यलोक में सबसे ज्यादा जिनधर्म हैं और उससे कम जिनबिम्ब हैं, कृत्रिम जिनबिम्ब अधिक हैं अकृत्रिम कम हैं। मध्यलोक में 458 चैत्यालयों की प्रसिद्धि है किन्तु असंख्यात द्वीपों में असंख्यात अकृत्रिम चैत्यालय है। जैसे नन्दीश्वर भक्ति में लिखा है ''अगणित द्वीपों में अगणित हैं अगणित गुण गण मण्डित हैं''।
भक्ति
सीमन्धर स्वामी विदेहक्षेत्र की कच्छा नगरी में विराजमान हैं।
भक्ति
समवसरण में देव विक्रिया से जिनबिम्ब बनाकर पधराते है, किन्तु श्लोक वार्तिक में लिखा है अकृत्रिम जिनबिम्ब स्वर्ग से लाकर पधराते हैं।
भक्ति
सोलह अङ्ग प्रमाण जीव राशि में एक अङ्कको अनन्त के बराबर जानना चाहिए, तीन अङ्क मध्यम अनन्तानन्त प्रमाण सिद्ध हैं और तेरह अङ्क प्रमाण सभी जीव जानना, किन्तु बारहअङ्क प्रमाण अनाद्यनन्त निगोदिया और एक अङ्क में बहु भाग निगोदिया हैं और शेष में चारों गतियों के जीव हैं, देव राशि भी मध्यम अंसख्यात है।(उनतीस अङ्क मनुष्यों का प्रमाण कहा है, वह सामान्य है)।
Misc.
वर्तमान में भरत क्षेत्र में आर्त-रौद्रध्यानी, नष्ट, दुष्ट, दु:खी, पापी और अशुभ लेश्या वाले जीव अधिक है, पर धर्मध्यान आज भी हैं।
ध्यान
नरकों में तीर्थङ्कर प्रकृति की सत्ता वाले जीव के छह माह पूर्व साता का उदय आता है तब परकोटा बन जाता है, अर्थात् सुरक्षा हो जाती है।
कर्म
सत्तर लाख छप्पन हजार वर्षों का एक पूर्व होता है।
समय
चक्रवर्ती के पुत्र-पुत्रियों की संख्या तिलोयपणत्ति में लिखी है, इससे सिद्ध है कि शान्ति, कुन्थु, अरनाथ तीर्थङ्करों के भी पुत्रियाँ हुयी हैं।
Misc.
सिद्धक्षेत्र, सिद्धशिला, प्रथमस्वर्ग का ऋजुविमान, ढाईद्वीप, प्रथम नरक का पहला पटल ये पाँच पैतालीस लाख योजन के हैं।
Misc.
नाभिराय और मरूदेवी का विवाह इन्द्र ने किया था। तेरहवें कुलकर से पुत्र-पुत्री का अलग अलग जन्म हुआ था।
परिवार
पञ्चम काल में प्रथम तीन हजार वर्ष में चौसठ जीव विदेह क्षेत्र जाकर नौ वर्ष में दीक्षा ले कर अलग-अलग केवल ज्ञान प्राप्त कर, नौ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व काल तक विहार कर मुक्त होंगे, अगले तीन हजार वर्ष में बत्तीस, इसके अगले तीन हजार वर्ष में सोलह, आठ, चार, दो, एक, क्रमश: इक्कीस हजार वर्ष में एक भवावतारी होंगे।
Misc.
तीर्थङ्करों के कुल में कोई नरक नहीं जाता हैकृष्ण जी गए हैं।
Misc.
चक्रवर्ती और तीर्थङ्कर की जठराग्नि ज्वाला मुखी के समान तीव्र होती है।
Misc.
भरत-बाहुबली ने बन्दर और नेबला की पर्याय में दान की अनुमोदना की थी, उसके बाद उन्होंने कभी दान नहीं दिया, अत: इनको जाति स्मरण नहीं हुआ, राजा श्रेयाँस ने श्रीमति (वज्रजङ्घ की पत्नी) की पर्याय में आहार दान दिया था, इसलिये उनको जाति स्मरण हो गया था।
दान
महाविदेहों में हमेशा चौथा काल, उत्तमादि भोग भूमि में क्रम से पहला, दूसरा, तीसरा काल रहता है।
Misc.
पाँच विदेह क्षेत्रों में एक सौ सत्तर विद्याधरों की नगरियों में एवं आठ सौ पचास म्लेच्छ खण्डों में हमेशा चौथा काल ही होता है।
Misc.
तृतीय काल के प्रारम्भ से अन्त तक एवं असंख्यातद्वीप समुद्रों में हमेशा तीसरा काल ही रहता है अर्थात् जघन्य भोग भूमि रहती है।
Misc.
नरकों में सदा छठवा काल 'दुषमा-दुषमा' ही होता है।
Misc.
चौरासी लाख बिलों में चौरासी लाख स्थाई वैतरणी नदियाँ होती हैं।
Misc.
विदेह क्षेत्र में बत्तीस नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी में एक तीर्थङ्कर हो सकते हैं, छ: खण्ड होते हैं, हमेशा चौथा काल होता है, सामान्य केवली हमेशा रहते हैं, आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी भी हमेशा रहते हैं, एक नगरी के तीर्थङ्कर दूसरी नगरी में नहीं जाते हैं।
Misc.
लवण समुद्र में राक्षस द्वीप के विचित्री कूट पर्वत पर पचास योजन लम्बी-चौड़ी लङ्का है।
Misc.
सुमेरु पर्वत को चिड़िया चोंच से घिसकर जाय, सौ-सौ वर्ष बाद पुन: आवे, जितने समय में पूरा सुमेरु पर्वत घिस जाय उतना बड़ा एक सागर कहलाता है।
समय