Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 76

त्याग करो मन से करो

98 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

ख्याति के त्याग के उपदेश में यदि ख्याति का उद्देश्य रहा, तब व्रती का वेश निरर्थक है।
अनासक्ति
त्याग वही उत्तम है जिसमें पर की प्रतीक्षा व आशा न करनी पड़े।
अनासक्ति
आत्म शान्ति के लिए परिचय, उपकार, कषाय व विषयाभिलाषा छोड़ना होगी।
संयम
सर्व का त्याग ही सुख है सर्व संग्रह करने वाले सुखी नहीं हो सकते हैं।
अनासक्ति
राग-द्वेष का त्याग ही सच्चा त्याग है, केवल भेष तो दम्भ है और परवस्तु के त्याग से ही संतुष्ट हो जाना मिथ्या अन्धकार है।
अनासक्ति
परद्रव्य के संसर्ग के त्याग में शान्ति और सुख है।
अनासक्ति
पर द्रव्य के भोग, संयोग में नहीं तत्सम्बन्धी इच्छा के अभाव से सुख होता है।
अनासक्ति
भोजन सिर्फ आहार नहीं सेहत भी है, सिर्फ भोजन नहीं अमृत भी है, खाने के लिए नहीं किन्तु जीने के लिए खाए, जीभ जो माँगे वह न दें, पेट जो माँगे वह दें।
आहार
जिसको त्याग के संस्कार हैं, उसे त्याग में सुख मिलता है।
अनासक्ति
अन्तःकरण की पवित्रता दुर्गुणों के त्याग करने से होती है।
चरित्र
छोड़ने में आनंद आता है और छूटने में कष्ट होता है, अतः सब छूटे उसके पहले ही सब छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
यदि कामना और वासना का त्याग न हो तो सब व्यर्थ है।
अनासक्ति
जीवन के अंतिम समय में जो कार्य हम नहीं करना चाहते उन्हें आज ही स्थगित कर दें... और जो कार्य करने जैसा लगे उसे आज से ही करना प्रारम्भ कर दें, अन्त में नहीं।
पुरुषार्थ
जो मनुष्य को ठगने में चतुर, दूसरों से प्रेम करने वाली, पाप युक्त तथा कपट आदि सैकड़ों दुर्गुणों की खान ऐसी वेश्या नरक का घर होती है।
चरित्र
वेश्या त्यागी व्यक्ति को निज हित के लिए नृत्य, गायन, वादन में आसक्ति, कुसंगति, निष्प्रयोजन भ्रमण आदि को छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
पराई वस्तु लेना ही चोरी नहीं अपितु कर न चुकाना, रिश्वत लेना, मिलावट करना आदि भी चोरी है। 'कर' चोरी करने वाला भारत के १४० करोड़ लोगों की चोरी करता है।
सत्य
मुक्ति के इच्छुक को विषयों को विष के समान छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
झूठी प्रशंसा से प्रसन्न होना अपने पतन के द्वार खोलना है।
चरित्र
रागी जीव कभी मरना नहीं चाहता यहाँ तक कि नाली का कीड़ा भी, इसलिए निर्ग्रन्थ साधु सबसे पहले राग छोड़ते हैं।
अनासक्ति
समाधि में सबसे बड़ी बाधा वैर और आशा है।
समाधि
संसार में तो सुख के लिए बहुत कुछ जुटाना पड़ता, कमाना पड़ता, संग्रह करना पड़ता, परन्तु आत्मिक सुख के लिए सब कुछ छोड़ना पड़ता है।
अनासक्ति
चारण, बन्दी, नीच, नाई, माली और भिक्षुओं के साथ बुद्धिमान मनुष्यों को मन्त्रणा नहीं करना चाहिए।
संगति
जैसे श्लेष्म में पड़ी मक्खी मर जाती है, वैसे ही परिग्रह में पड़ा साधु भी मर जाता है।
अनासक्ति
पुद्गल के टुकड़ों का राग जिनमुद्रा को बदनाम व बर्बाद करता है।
अनासक्ति
जैसे सोने से भी कठोर वज्र को भी अग्नि पिघला देती है वैसे ही स्त्री भी अपनी शक्ति से सभी को पिघला सकती है।
ब्रह्मचर्य
लोगों की जितनी बुद्धियाँ भ्रष्ट हुई हैं, हो रही हैं और भविष्य में होगीं, वे सब श्री (लक्ष्मी) और श्रीमती के कारण हुई हैं।
धन
जो कुबुद्धि जन पर्व के दिन उपवासादि चारित्र को छोड़कर कामादि सेवन करता है वह निश्चय ही नरक का स्वामी होता है।
चरित्र
मैंने अब जाना कि त्याग से बड़ा सुख नहीं है, विद्या के समान नेत्र नहीं है तथा समीचीन दृष्टि के समान बल नहीं है।
ज्ञान
मनुष्य जब एक नियम तोड़ता है तो दूसरे नियम अपने आप टूट जाते हैं।
संयम
निराहार रहने के समान कोई तपस्या नहीं, ज्ञान से बड़ा कोई सुख नहीं।
पुरुषार्थ
संसार में सबसे बड़े अधिकार सेवा और त्याग से मिलते हैं।
संयम
उपवास करने से चित्त अन्तर्मुखी होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हल्की बनी रहती है, पाप का नाश और पुण्य का बंध होता है।
पुरुषार्थ
कर्म यदि अभिमान पूर्वक किया जाए तो सफल नहीं होता हैं, त्यागपूर्वक किया हुआ कर्म महान् फलदायक होता है।
विनम्रता
त्याग और तपस्या तुम्हारे मुख मण्डल पर अंकित हो और तत्परता और क्रियाशीलता तुम्हारे कामों पर हो।
पुरुषार्थ
पापजाल से विमुक्त ही ब्राह्मण है, शान्त गुणों से भूषित व्यक्ति श्रमण है, आशाओं को छोड़ने वाला ही संन्यासी है, सत्य रूपी भूषण से भूषित व्यक्ति ही साधु है।
धर्म
दो ही अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते, अकर्मण्य गृहस्थ तथा प्रपंच में लगा हुआ संन्यासी।
धर्म
गृहस्थ जीवन स्नेह एवं धर्म युक्त हो तो वही उसका सौन्दर्य एवं फल होता है।
परिवार
भले ही सब इन्द्रियों को वश में कर लिया हो परन्तु जब तक रसना को अपने वश में नहीं किया तब तक मनुष्य जितेन्द्रिय नहीं हो सकता, एक जिह्वा को जीत लिया तो सभी को जीत लिया।
संयम