Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 76

त्याग करो मन से करो

98 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जिस घर परिवार में सभी लोग प्रसन्न रहते हैं वह घर पृथ्वी पर स्वर्ग है और जहाँ सभी आपस में संघर्ष करते हैं, झगड़ते हैं वह घर नरक है।
परिवार
जब नाखून बड़े होते हैं तब नाखून ही काटे जाते हैं अंगुलियाँ नहीं, इसी प्रकार अगर रिश्तों में दरार आ जाये तो दरार मिटाइये रिश्तों को नहीं।
परिवार
बहुमत सदैव सर्वोत्तम सटीक प्रत्युत्तर है।
विविध
जो कानून के साथ है वह बहुमत में है।
विविध
व्यक्ति और परमात्मा मिलकर बहुमत हो जाता है।
भक्ति
जो हाथ से छूटे वह त्याग और जो हृदय से छूटे वह वैराग्य, त्याग और वैराग्य में यही अंतर है।
अनासक्ति
कुल की रक्षा के लिए एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षा के लिए कुल का, देश की रक्षा के लिए गाँव का और आत्म कल्याण के लिए सारी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।
अनासक्ति
अच्छी समाधि होना साधु की सच्ची त्याग तपस्या का फल है।
समाधि
खोटी सलाह से राजा, परिग्रह से साधु, लाड़-प्यार से पुत्र, बिना अध्ययन से ब्रह्मण, कुपुत्र से कुल, दुर्जन की सेवा से शील, स्नेह न करने से मित्रता, अनीति से समृद्धि, अधिकतर प्रवास से स्नेह, मदिरापान से लज्जा, देखभाल न करने से खेती और प्रमाद करने से त्याग रूपी धन नष्ट हो जाता है।
विवेक
समस्त शास्त्रों में पाँच प्राणी जीवित रहते हुए भी मृत कहे हैं– दरिद्र, बीमार, मूर्ख, परदेश में रहने वाला और नित्य सेवा करने वाला।
विविध
जिसका स्वतः वियोग हो रहा है, उसके संयोग की इच्छा का त्याग कर दें–इसका नाम 'योग' है।
अनासक्ति
मुझको मिल जाये, यह भोग है और दूसरों को मिल जाये, यह योग है।
अनासक्ति
रात्रि भोजी सदा कुरूप, विकलांग, अल्पायु, रोग पीड़ित, भाग्यहीन और धरमहीन होता है तथा मरकर उल्लू, काक, बिलाव, गीध, सांवर, साँप बिच्छू तथा गोह होते हैं।
आहार
रात्रि भोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यंच तथा नरकादि गतियों में अन्धे बौने, विकलांग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःखों से परिपूर्ण कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता पीड़ित, अत्यन्त चंचल, अल्प आदर वाले होते हैं।
आहार
मांस खाने वाला जीव भव-भव में अल्पायु, विकलांग, रोगी, बहरा, दुर्जन, बौना, कोढ़ी और नपुंसक होता है।
आहार
भोजन, भजन और प्रवचन के पहले संक्लेश उत्पन्न होने वाली बात नहीं सुनना चाहिए।
आहार
देश बदला, भेष बदला, नाम बदला, निवास बदला पर जिन भावों को बदलने के लिए ये सब बदला वे नहीं बदले तो कुछ नहीं बदला।
अनासक्ति
रात्रि में जीवादि के न दिखने से पानी को पीना भी योग्य नहीं है और फिर पान सुपारी तथा फलादि का भोजन भष्य कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रि में चारों प्रकार के आहारों का त्याग करने से आधे उपवास का फल जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है–एक साल में १८३ उपवास का फल मिलता है।
आहार
हम साधु के सामने इसलिए सिर झुकाते हैं कि उनमें त्याग का बल है।
अनासक्ति
जिसके घर में माता अथवा प्रिय बोलने वाली पत्नि नहीं है, उसे वन में चले जाना चाहिए क्योंकि उसके लिए जैसा वन वैसा घर।
परिवार
तपस्या में क्षय पहले है और अक्षय बाद में प्राप्त होता है।
पुरुषार्थ
त्याग और उपलब्धि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अनासक्ति
दूसरों से झगड़ा करने की आदत एवं उद्दण्डपने की भावना को दूर करदो तो तुम्हें सर्वोत्तम आनन्द और प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
संयम
धन बुरा नहीं, धन की आकांक्षा बुरी होती है।
धन
अधिकांश लोगों को सन्त चरणों में आकांक्षा ही झुकाती है।
अनासक्ति
आकांक्षा की अग्नि में सुख की आहूति देना मूर्खता है।
अनासक्ति
आकांक्षा अशान्ति का कारण है।
अनासक्ति
आकांक्षा ही पाप की जननी है। अहंकार पाप का जनक है।
अनासक्ति
आवश्यकताएँ सीमित किन्तु आकांक्षाएँ असीमित होती हैं।
संतोष
तीव्र आकांक्षा में उचित-अनुचित के विचारने की क्षमता खो जाती है।
विवेक
संसार में खुश रहने के लिए एक ही उपाय है अपनी आवश्यकताओं को कम रखें।
संतोष
आदमी की आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो सकती है, परन्तु आकांक्षाओं की नहीं।
संतोष
गरीब वह है जिसका खर्च आमदनी से ज्यादा है।
संतोष
यदि गलती को छिपाया तो वह विष के समान अपना प्रभाव बढ़ाती जाएगी।
सत्य
तुम्हारा अन्तिम ध्येय शान्ति है, उसे प्राप्त करने का उपाय त्याग और तप है।
अनासक्ति
जिस क्षण हम पापों का त्याग अंतरंग से कर देते हैं, उसी क्षण हमें धर्म की प्राप्ति हो जाती है।
धर्म
मनुष्य खुद तो भोगी बनता है, पर दूसरों को त्यागी देखना चाहता है, यह अन्याय है। यदि उसे त्यागी अच्छा लगता है तो वह खुद त्यागी क्यों नहीं बनता?
अनासक्ति
यदि आप कुछ पाना चाहते हैं तो आपको कुछ-न-कुछ त्याग करना ही पड़ेगा।
अनासक्ति
सच्ची प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए सम्पत्ति की जरूरत नहीं, उसके लिए त्याग व सेवा ही काफी है।
अनासक्ति
त्याग के सिवा संसार में कोई दूसरी शक्ति नहीं है।
अनासक्ति
माया को छोड़ने वाला व्यक्ति समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
अनासक्ति
सच तो यह है कि त्याग मार्ग से दूर रहकर सुख पाने की परिकल्पना मात्र बन्ध्या के पुत्र सी निरर्थक है।
अनासक्ति
पैसे का त्याग आसान है सुविधा का त्याग करना कठिन है।
अनासक्ति
विराट को पाने के लिए क्षुद्र को छोड़ना पड़ता है जैसे महल को बनाने के लिए झोपड़ों को मिटाना ही पड़ता है।
अनासक्ति
त्याग से अनेक प्रकार के सुख उत्पन्न होते हैं, इसलिए अगर तुम उन्हें अधिक समय तक भोगना चाहो तो शीघ्र त्याग करो।
अनासक्ति
त्याग का मतलब यह नहीं कि मोटे और तंग वस्त्र धारण कर लिए जाएँ त्याग तो यह है कि अपनी प्रतिष्ठा, इच्छाओं को जीता जाए।
अनासक्ति
कोई भी त्याग बदले की भावना से नहीं करना चाहिए।
अनासक्ति
दानी को राजा और त्यागी को महाराज कहा जाता है।
दान
त्याग के बिना स्वाधीनता की प्राप्ति नहीं होती है।
अनासक्ति
जितना भी भीतर से त्यागोगे, उतना ही सुख पाओगे।
अनासक्ति
त्याग का स्वभाव दयालु है तो दान का स्वभाव ममतामय है।
दान
परमात्मा की मंजिल वैभव की सीढ़ियों से नहीं तप-त्याग-संयम की पावन सीढ़ियों से प्राप्त होती है।
अनासक्ति
अगर इन्द्रिय सुख की इच्छा है तो पाप करना न चाहते हुए भी पाप होगा, इन्द्रिय सुख की इच्छा ही पाप करना सिखाती है, अतः पापों से छूटना हो तो इन्द्रिय सुख की इच्छा का त्याग करो।
अनासक्ति
राग इंसान को शैतान बना देता है। वैराग्य इंसान को महान् बना देता है ॥ त्याग से डरने वालों को शायद पता नहीं है। त्याग इंसान को भगवान् बना देता है ॥
अनासक्ति
इस जगत् में मेघ के बिना वृष्टि नहीं होती, बीज के बिना अंकुर नहीं होता, तप के बिना कर्म क्षय नहीं होता और रत्नत्रय के बिना मोक्ष नहीं होता है।
कर्म
मिलने से नहीं त्यागने से माँगना (याचना) मिटता है।
अनासक्ति
मोही मुनि से निर्मोही गृहस्थ और मोही गृहस्थ से निर्मोही जानवर मोक्षमार्गी हैं।
अनासक्ति
जो संत के कहने पर त्याग नहीं करते उन्हें फिर डॉक्टरों के कहने पर त्यागना पड़ता है।
अनासक्ति
इच्छा से पहले संतोष नहीं है अन्यथा इच्छा ही क्यों होती है? इच्छा के समय भी संतोष नहीं अन्यथा संतप्त क्यों होता? इच्छा के बाद भी संतोष नहीं अन्यथा चेष्टा करके व्याकुल नहीं होता, इच्छा के पूर्व, वर्तमान व भावी तीनों रूप दुःखदायी है, अतः इच्छा त्यागो।
संतोष