Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 44

धर्म धुरी मजबूत हो

83 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जीवन में ऐसे जियें कि आपत्ति के समय चेहरे से मुस्कान न जाए और सम्पत्ति के समय चेहरे पर गुमान न आए।
चरित्र
जिन्दगी उसकी नहीं जो जिन्दगी से घबराते हैं, बल्कि जिन्दगी उसकी है, जो जिन्दगी से टकराते हैं।
पुरुषार्थ
जीवन को तोड़ना नहीं सिर्फ मोड़ना है।
विविध
जीवन का आनंद, गौरव-सम्मान व स्वाभिमान के साथ जीने में हैं।
चरित्र
अंत तक सक्रिय रहने में ही जीवन की सार्थकता है।
पुरुषार्थ
जो हर परिस्थिति में ढलना जानता है उसे ही जीने की कला आती है।
विवेक
दास होना बुरा नहीं परन्तु दास रहकर ही मर जाना अवश्य बुरा है।
पुरुषार्थ
हम दुनिया को नहीं बदल सकते, मगर दुनिया के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल सकते हैं।
मन
जीवन में घटने वाली दुर्घटनाओं को हमेशा याद करते रहना चाहिए जिससे नई दुर्घटनाएँ न होने पाएँ।
विवेक
मौके का लाभ नहीं उठाना ही प्राणी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
पुरुषार्थ
दूसरों के दोष जानना आसान है, स्वयं के दोषों को जानना कठिन है।
विनम्रता
पहाड़ से गिरकर मनुष्य उठ सकता है परन्तु नजरों से गिरा हुआ कभी नहीं उठ सकता है।
चरित्र
याद रखें, महान् विजेता वही होते हैं, जो किसी एक उद्देश्य को लेकर काम करते हैं और जिनकी दृढ़ता, जिनका संकल्प अविभाज्य है।
पुरुषार्थ
गाय दूध देती नहीं निकालना पड़ता है, ऐसे ही जीवन में महान् कार्य स्वतः ही सम्पन्न नहीं होते, उनके लिए प्रयत्न व प्रयास करना पड़ता है।
पुरुषार्थ
दिमाग को ठंडा, जेब को गरम, जुबान को नरम और दिल में रहम व आँखों में शरम रखने वाला हर जगह आदर पाता है।
चरित्र
यदि गुण न हों तो रूप व्यर्थ है, विनम्रता न हो तो ज्ञान व्यर्थ है, उपयोग न आये तो धन व्यर्थ है, साहस न हो तो शस्त्र व्यर्थ हैं और यदि परोपकार न हो तो जीवन ही व्यर्थ है।
चरित्र
पुण्य का परिवार–पिता–ज्ञान, माता–दया, भाई–सत्य, बहन–सुबुद्धि, पुत्र–सन्तोष, पुत्री–ममता, मूल बाबा–क्षमा।
धर्म
प्रत्येक व्यक्ति के अभिप्राय को सुनो परन्तु सुनकर एकदम से बहक न जाओ उस पर विचार करो, जिससे आत्मा सहमत हो वही करो, बातें सुनने में जितनी कर्णप्रिय होती हैं; उनके अंदर उतना रहस्य नहीं होता, रहस्य वस्तु की प्राप्ति में है, दर्शन में नहीं, मिश्री का स्वाद चखने से आता है, देखने से नहीं।
विवेक
एक अच्छा इंसान बनें और प्रतिज्ञा करें कि छोटों के साथ नरमी से, बड़ों के साथ करुणा से, संघर्ष करने वालों के साथ हमदर्दी से और कमजोर व गलती करने वालों के साथ सहनशीलता से पेश आयें क्योंकि हम अपने जीवन में कभी न कभी इनमें से किसी न किसी स्थिति से गुजरते हैं।
चरित्र
अधम पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को मृत्यु से भय होता है परन्तु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही महान् भय होता है।
चरित्र
धन, साधन, समय, कर्म तथा स्थान; इन पाँचों का स्पष्ट विचार करके ही किसी कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
विवेक
पुरुषत्व तो परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने में है।
पुरुषार्थ
अपनी मानसिक स्थिति को सदा सहज व स्वस्थ रखिये, नहीं तो क्रिया-प्रतिक्रिया से जगत् में जीना दूभर हो जाएगा।
मन
जो पुरुष धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का समयानुसार सेवन करता है, वह इस जन्म और पर-जन्म में धर्म, अर्थ, काम के संयोग को प्राप्त होता है।
धर्म
अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए दिन-रात सपने तक में उसी की धुन रहे तभी सफलता मिलती है। स्मरण रखो! सत्कर्मों से, समय से पहले व भाग्य से अधिक भी मिल सकता है।
पुरुषार्थ
पड़ोसी की सौ भूल सुधारने की अपेक्षा अपनी एक भूल सुधारना कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है।
संयम
बुद्धि और विवेक उसी का साथ देता है जो कामेन्द्रिय को वश में करना जानता है।
ब्रह्मचर्य
शान्ति की विजय युद्ध की विजय से श्रेष्ठ है।
अहिंसा
दूसरे का भला करने के समान कोई धर्म नहीं है दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है।
दान
धर्म में राजनीति नहीं होती अपितु राजनीति में धर्म आवश्यक है।
धर्म
धर्म को समझने के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं, अपितु दूसरों के दुःखों को समझना सबसे पहले अनिवार्य है क्योंकि प्राणी सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।
दान
निराशावाद भयंकर राक्षस है, जो हमारे नाश की ताक में बैठा रहता है, निराशा से ही जीवन के बहुमूल्य तत्त्व नष्ट हो जाते हैं, इससे विजय के अनेक अवसर लुप्त हो जाते हैं।
मन
निराशा उत्पन्न करने वाले लोगों, विचारों और सम्पर्कों से सदा दूर रहिए, आशा एक ज्योति है, जो घोर अंधकार में भी हमें प्रकाश के होने का संदेश देती है।
मन
पद से व्यक्ति की गरिमा नहीं किन्तु व्यक्ति से पद की गरिमा बढ़नी चाहिए।
चरित्र
अपने बहुमूल्य समय का एक-एक क्षण परिश्रम में व्यतीत करना चाहिए, ऐसा करने से कोई क्षण ऐसा नहीं बचता जब हमें पछतावा हो।
पुरुषार्थ
पुण्य और पाप सदैव चार हाथ आगे चलता है, जो अनुकूलता प्रतिकूलता करता जाता है।
कर्म
वह पाप अग्नि का कुंड है जो आदर, मान, साहस और धैर्य को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देता है।
कर्म
पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।
विविध
उत्तम पुरुषों की यह रीति है कि वे किसी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ते हैं।
पुरुषार्थ
उन्नति प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय स्वयं का परिश्रम होता है।
पुरुषार्थ
परिश्रम वह चाबी है जो किस्मत का दरवाजा खोल देती है।
पुरुषार्थ
श्रम और उद्योग चुंबक के समान हैं जो सब अच्छे-अच्छे पदार्थों को पास खींच लेते हैं। जो अवसरों का उपयोग करना जानते हैं, वे उन्हें पैदा भी कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
सतत् परिश्रम तथा साहस ही सफलता की कुंजी है।
पुरुषार्थ
भाग्य के भरोसे जीने वाला कभी भी भाग्यवान नहीं बन सकता किन्तु पुरुषार्थ करने वाला जरूर परमात्मा बन जाता है।
पुरुषार्थ
ज्येष्ठ बनने के लिए नहीं अपितु श्रेष्ठ बनने के लिए श्रम करना पड़ता है क्योंकि जो श्रेष्ठ बन जाता है, वह ज्येष्ठ भी बन जाता है।
पुरुषार्थ
बिन पुरुषार्थ किए भाग्य को दोष देना ज्ञानियों का नहीं आलसियों का काम है।
पुरुषार्थ
भाग्य (दैव) के अनुकूल होने पर भी यदि मानव उद्योगहीन (आलसी) है तो उसका कल्याण नहीं हो सकता है।
पुरुषार्थ
स्वयं के प्रयत्न के बिना मानव की उन्नति असम्भव है इसलिए मानव को अपना मित्र बनकर परिश्रम से अपनी उन्नति करनी चाहिए।
पुरुषार्थ
जो व्यक्ति अपने सत्कर्तव्यों के अनुष्ठान द्वारा पारलौकिक हित में प्रयत्नशील नहीं है वह जन्मान्ध हैं।
धर्म
जो सिर्फ बहाने बनाने में माहिर होते हैं, वे किसी और चीज में माहिर नहीं होते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल हैं तो सीधे अपने ध्येय की ओर चलो, लेकिन यदि परिस्थितियाँ अनुकूल न हों तो उस मार्ग का अनुसरण करो, जिसमें सबसे कम बाधा आने की सम्भावना हो।
पुरुषार्थ
संसार की सारी वस्तुएँ ठोकर लगने से टूटती हैं, पर एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो ठोकर लगने से बनता है। ठोकरों से घबराओ मत, इनसे शिक्षा लो, बोध लो, ज्ञान लो, ठोकरें मनुष्य को अनुभवी बनाती हैं और ठोकर खाकर ही व्यक्ति ठाकुर बनता है।
पुरुषार्थ
तुम अपने जीवन का निरीक्षण, विश्लेषण कर देखो! यदि तुम्हारे जीवन में शान्ति बढ़ रही है, संतोष बढ़ रहा है, आनंद बढ़ रहा है तो तुम्हारा जीवन सही है, यदि अशान्ति बढ़ रही है, तनाव बढ़ रहा है और जीवन बोझिल हो रहा है तो गलत है, यह बात स्वयं सोचो, स्वयं विचारो किसी दूसरे से पूछने की जरूरत नहीं जीवन की दिशा बदलो, जीवन का मार्ग बदलो।
विवेक
मनुष्य को कर्म का अधिकार इसलिए दिया गया है कि वह प्रत्येक वांछित वस्तु अपने पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त करे किन्तु मनुष्य हर वस्तु परमात्मा से माँगता है यह कर्म और परमात्मा दोनों का अपमान है।
पुरुषार्थ
अधिकार प्राप्त कर न्याय न भूलें, धन प्राप्त कर धर्म न भूलें, पति-पत्नी पाकर परमात्मा को न भूलें, सम्पत्ति पाकर संतों को न भूलें, साधन पाकर साधना को न भूलें, गुमान में आकर ग्रन्थों को न भूलें, पदार्थ को पाकर परमार्थ को न भूलें, सब कुछ पाकर सज्जनता–सदाचरण को न भूलें अन्यथा भविष्य बिगड़ जाएगा।
चरित्र
भागने वाले के पीछे भय रहता है, दौड़ने वाले के आगे एक उपलब्धि होती है, अतः भागो मत दौड़ना सीखो लक्ष्य मिलेगा।
पुरुषार्थ
यदि आप अपने को तनावपूर्ण और विलाप करता देख रहे हैं तो उसके जिम्मेदार आप स्वयं हैं, जो आपने-अपने-आपको ऐसा बनाने की स्वीकृति दे दी।
मन
सरलता, विनयशीलता, दयालुता, सहिष्णुता इन्हीं चार स्तम्भों पर मनुष्यता का महल टिका है, जिस मनुष्य में इन चार गुणों में से किसी एक गुण की भी कमी आती है, तो समझ लो उसकी मनुष्यता तीन पाये की कुर्सी की तरह है।
चरित्र
भविष्य की कल्पना छोड़ो, अतीत की चिंता छोड़ो, वर्तमान में जीना सीखो।
समय
भूत को भूल जाओ, वर्तमान को संभालों, भविष्य अपने आप सँभल जायेगा।
समय
पीछे के अनुभवों से जो लाभ नहीं उठाते, वे भविष्य को नहीं बना सकते, जो भविष्य को दूर तक नहीं देखता, वह ठोकर खाकर गिर पड़ता है।
विवेक