Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 44

धर्म धुरी मजबूत हो

83 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

सौभाग्य और दुर्भाग्य मनुष्य की दुर्बलता के नाम हैं, मैं तो पुरुषार्थ को ही सबका नियामक समझता हूँ, पुरुषार्थ ही सौभाग्य को खींच लाता है।
पुरुषार्थ
संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसके जीवन में भाग्योदय का अवसर न आया हो लेकिन जब मनुष्य उसका स्वागत करने को तैयार नहीं होता तब अवसर उलटे पैर लौट जाता है।
पुरुषार्थ
मौके का लाभ न उठाना ही प्राणी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
पुरुषार्थ
आपका भाग्य आपके हाथ है, जो शक्ति और सहायता आप चाहते हो वह सब आपके भीतर मौजूद है इसलिए अपना भाग्य आप ही बनाओ।
पुरुषार्थ
भूल कुछ नया सीखने का अवसर होती है, बशर्ते हम उस अवसर का अर्थ और महत्त्व समझें।
ज्ञान
भूल का अर्थ अज्ञानता या अपराध नहीं, भूल हो जाना एक सहज प्रक्रिया है, पर उस भूल को सुधार कर बेहतर बनने की भावना मन में होना चाहिए।
चरित्र
जो भूल को भूल नहीं मानता उसकी भूल जीवन में शूल बन जाती है।
चरित्र
जब तक मनुष्य उद्योग करता है उससे भूल होना संभव है।
पुरुषार्थ
जो करें स्वयं के बल पर करें, दूसरों का सहारा लेकर नहीं क्योंकि परायी नींव पर खड़ा भवन अधिक समय तक नहीं टिक सकता है।
संयम
दूसरों के सहारे जीवन जीने वाला कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता है, जैसे बैसाखी के सहारे चलने वाला पर्वत पर नहीं पहुँच पाता है।
संयम
मंजिल कागज पर लिखने से नहीं कदम बढ़ाने से मिलती है।
पुरुषार्थ
जिसमें तुम्हारा कोई बस नहीं, उसके लिए दुःख करना बन्द कर दो।
संतोष
आपके मन की अशान्ति बताती है कि आपका व्यक्तित्व गलत है।
मन
संसार में परमात्मा भी सबके मन की नहीं कर सकता है।
संतोष
अपमान होने पर भी मन को छोटा नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
मनुष्य में अगर मनुष्यता नहीं है तो मनुष्य पशु से भी नीचा है क्योंकि पशु तो अपने पूर्वकृत पापकर्मों का फल भोगकर मनुष्यता की तैयारी कर रहा है, पर मनुष्य नये पाप-कर्म करके नरकों की, पशुता की तैयारी कर रहा है।
कर्म
चौरासी लाख योनियों और चतुर्गतियों में मनुष्य भव ही एक ऐसी सीढ़ी है, जो ऊपर व नीचे की पूर्ण यात्रा कराने में समर्थ है।
धर्म
धैर्यवान, बुद्धिमान महापुरुष के लिए शोक और रुदन विषम परिस्थिति में सर्वथा त्याज्य है।
संयम
सबसे मुश्किल है कोई काम बगैर त्रुटि के करना और सबसे आसान है उसी काम में दूसरों की गलतियाँ निकालना।
विनम्रता
अपनी बुराइयों को अपने मरने से पहले ही मर जाने दो।
संयम
जल एक स्थान पर ठहरे रहने से बदबूदार हो जाता है और दूज का चन्द्रमा यात्रा के कारण पूर्णचन्द्र बन जाता है।
पुरुषार्थ
कई युद्ध ऐसे भी होते हैं जिनमें हारना ही विजय है।
विवेक
देश के युवक चाहें तो वे बड़े-बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते हैं।
पुरुषार्थ