Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 62

पश्चात्ताप का रस-देखो कवि सरस

16 सूत्र

प्रकृति, विकृति, संस्कृति- भूख लगने पर खाना प्रकृति है, बिना भूख के खाना विकृति है, अतिथि को खिलाकर खाना संस्कृति है।
दान
मैं रिश्वत वालों का अन्न नहीं लेता- एक थानेदार के पड़ोस में एक भिखारी भीख माँग रहा था, पड़ोसी ने दुत्कार दिया, वह आगे बढ़ गया, थानेदार को दया आई, भिखारी को आवाज देते हुये कहा! ठहरो मैं खाना भेजता हूँ, भिखारी अनसुनी करके आगे बढ़ गया, थानेदार ने समझा इसने सुना नहीं, उसने नौकर से कहा उसे रोटी दे आओ, नौकर ले गया, तो भिखारी ने मनाकर दिया, कहा! मैं रिश्वत लेने वाले का अन्न-जल ग्रहण नहीं करता, नौकर ने भिखारी को चार गालियाँ सुनाई और वापस आ गया, उसने थानेदार को बताया, थानेदार सुनकर सन्न रह गया, बहुत गुस्सा आई दर-दर का भिखारी होकर मेरी उपेक्षा करता है, लेकिन मन आत्म ग्लानि से भर गया, सब कुछ होने के बाद भी थानेदार को उथल-पुथल मच गई, उसने रिश्वत लेना छोड़ दिया, एक वर्ष बाद वही भिखारी दरवाजे पर खड़ा भीख माँग रहा था, 'दाता रोटी दे दो' थानेदार ने कहा मेरे जैसे रिश्वत खोर का तुम अन्न कैसे खाओगे? भिखारी ने हँसकर कहा! आप रिश्वत नहीं लेते, आपकी चरण रज माथे, थानेदार ने उसके चरण पकड़ लिए, और कहा! तुम मेरे सच्चे शिक्षक हो।
चरित्र
हाय कुछ न कर सके न पीर पर की हर सके, रात बात में गयी प्रात खात में गया। फिर हमारी जिन्दगी से एक दिन निकल गया, जागरण के कोष से एक दिन निकल गया।। जैसे-जैसे श्वाँस कम हो रही है देह से, मोह त्यों-त्यों बढ़ रहा है, आदमी की गेह से। भावना के द्वार पर साधना के हाट पर, रात सोच में गयी प्रात खात में गया। फिर हमारी जिन्दगी से एक दिन निकल गया, जिन्दगी के कोष से एक दिन निकल गया।। इसलिये सुधार कर आज का न काल कर, हँस रही थी जो कली देखते ही ढह गयी। रात चाह में गयी प्रात आह में गया, फिर सरस की जिन्दगी से एक दिन निकल गया।।
समय
कम खाना कम सोवना, कम दुनिया से प्रीत। कम बोलो मुख से वचन, यह साधु की रीत।।
संयम
सुख दुःख दाता कोई न आन, मोह राग रुष दुःख की खान। निज को निज पर को पर जान, फिर दुःख का नहीं लेश निदान।।
अनासक्ति
बड़े न होते गुणन बिन, विरद बढ़ाई पाय। कहत धतूरे को कनक, गहना गढ़यो न जाय।।
चरित्र
भला बुरा लखिये नहीं, आये अपने द्वार। मधुर बोल जस लीजिये, नातर अजस तैयार।।
वाणी
धर्महानि सङ्क्लेश अति, शत्रु विनय कर होय। ऐसा धन नहीं लीजिए, भूखे रहिए सोय।।
धन
धाम पराया वस्त्र पर, पर सय्या परनार। पर घर वसवौ अधम ये, त्यागे विवुध विचार।।
चरित्र
को स्वामी मम मित्र को, कहा देश में रीत। खरच किता आमद किती, सदा चिन्तवों मीत।।
विवेक
दुष्ट तिया का पोषना, मूरख को समझाय। बैरी ते कारज परे, कौन नाही दुःख पाय।।
संगति
विपदा को धन राखिये, धन दीजे रख दार। आतम हित को छाड़िये, धन दारा परिवार।।
अनासक्ति
जाके किये लाज आवे, जग में अजस पावे, घनेन सो वैर होय, पापहु की बढ़ती। काय को कलेस होय, आपुस मे नेस (बिगाड) होय, नीचनि पे पेस होय, धर्म प्रीति हटती। कुल को अचार जाय, क्रिया को प्रचार जाय, हेय-उपादेय की समझ दूर पड़ती। देश, कुल, नृप, पुर, नीति के विरोधी, ऐसे कारज न करो, मीत तजो रीती अड़ती (विपरीत)।।
चरित्र
मञ्जिल उन्ही को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पङ्खों से कुछ नहीं होता, हौसलों में उड़ान होती है।।
पुरुषार्थ
पानी पीना छानकर, कछु कष्ट न होय। जीव दया हो जायगी, पाप लगे न कोय।।
अहिंसा
रोगी, भोगी, आलसी, शङ्का, हठी अज्ञान। ये दुर्गुण दारिद्रय के सदा रहत भगवान्।।
चरित्र