Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 339

सम्यग्दर्शनादि के दृष्टांत। बीस प्रकार की भूलें।

43 सूत्र

जो तत्त्वार्थ सूत्र का पाठ करता है उसे एक उपवास का फल मिलता है और जो अर्थ का विचार करता है उसे अनन्त उपवास का फल मिलता है।
ज्ञान
जो बिन ज्ञान क्रिया अवगाहे, जो बिन क्रिया मोक्ष फल चाहे। जो बिन मोक्ष कहे मैं सुखिया, सो अजान मूढ़न में मुखिया।।
ज्ञान
जिसमें अक्षर अल्प हों और अर्थ बहुत हो उसे सूत्र कहते हैं।
ज्ञान
तत्त्वार्थसूत्र में चकार की संख्या- पहले अध्याय में 2, आगे के अध्यायों में क्रमश: 11, 7, 10, 9, 6, 3, 5, 4, 3 कुल 60 चकार आये हैं।
ज्ञान
तत् शब्द की संख्या क्रमश: 6, 3, 7, 2, 2, 4, 4, 2, 3, 1 कुल 34 तत् शब्द आये हैं।
ज्ञान
सूत्रों की संख्या क्रमश: 33, 53, 39, 42, 42, 27, 39, 26, 47, 9 कुल 357 सूत्र आये हैं।
ज्ञान
छोटे सूत्रों की संख्या क्रमश: 4, 14, 3, 7, 9, 2, 6, 5, 10, 1, कुल 61 छोटे सूत्र आये हैं।
ज्ञान
बड़े सूत्रों की संख्या क्रमश: 2, 4, 8, 2, 1, 3, 6, 3, 3, 2 कुल 34 बड़े सूत्र आए हैं।
ज्ञान
श्वेताम्बर तत्त्वार्थसूत्र में क्रमश: 35, 52, 18, 53, 44, 26, 38, 26, 49, 7 कुल 344 मानते हैं, तीसरे अध्याय में 1 से 11 वे सूत्र तक और 33 से 39 वे सूत्र तक कुल 18 सूत्र मानते हैं।
ज्ञान
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनों की एकता मोक्ष का मार्ग है जैसे अजवाइन का फूल, कपूर, पिपरमेंट की एकता अमृतधारा है।
धर्म
जिन भक्ति सम्यक्त्व का कारण है, श्रुत भक्ति ज्ञान का कारण है और गुरु भक्ति चारित्र का कारण है।
भक्ति
रत्नत्रय देव, नरक और तिर्यञ्च गति में नहीं है, उस रत्नत्रय को मानव पर्याय में हाँसिल कर लेना बुद्धिमानी है।
धर्म
रत्नत्रय- साईकिल में बैलेंस बनाना श्रद्धा है, सामने देखना ज्ञान है और पैडल मारना चारित्र है।
धर्म
दीपक में तैल श्रद्धा है, बाति ज्ञान है, अग्नि चारित्र है।
धर्म
मोक्ष मार्ग लक्ष्य है, दर्शन-ज्ञान-चरित्र आत्मभूत लक्षण हैं, लक्षणाभास नहीं हैं।
धर्म
चरित्रहीन व्यक्ति का विपुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त करना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे नेत्रहीन व्यक्ति के सामने लाखों दीपक जलाना बेकार है।
चरित्र
जैसे वात-पित्त-कफ की हानि-वृद्धि होती है तो शरीर में विकार हो जाता है उसी प्रकार दर्शन-ज्ञान-चरित्र की हानि होने पर आत्मा में विकार हो जाता है।
धर्म
अन्धा- मिथ्यादर्शन, पङ्गू- मिथ्याज्ञान, आलसी- मिथ्याचारित्र है, इसके विपरीत तीनों की एकता रत्नत्रय है।
धर्म
जिस प्रकार बारात में वधू का स्वामी वर होता है, उसी प्रकार सम्यक्त्वी जीव सातिशय पुण्य व मोक्ष का अधिकारी होता है।
धर्म
बीस प्रकार की भूलें- तीन गृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र, तीन अगृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र, सात गृहीत तत्त्व, सात अगृहीत तत्त्व सम्बन्धी भूल।
विवेक
इन्द्रभूति गौतम को मानस्तम्भ देखते ही निसर्गज सम्यग्दर्शन हुआ था, शेर को उपदेश से अधिगमज सम्यग्दर्शन हुआ था।
धर्म
काँटे का पैनापन निसर्गज है, बाण का पैनापन अधिगमज है, क्रोध की ललाई अधिगमज है, क्षमाभाव निसर्गज है, निज आत्मा को निज में लगाना निसर्गज है।
विवेक
मोटर अजीब तत्त्व है, सवारी जीव तत्त्व है, एक-एक का चढ़ना आस्रव है, सीट पर बैठना बन्ध है, सवारी का आना बन्द हो जाना संवर है, एक-एक करके उतर जाना निर्जरा है, सम्पूर्ण सवारी का उतर जाना मोक्ष है, इसी प्रकार सभा, नाव, रोटी आदि में घटाना एवं दार्ष्टान्त के रूप में आत्मा में घटाना चाहिए।
धर्म
नाम निक्षेप- नाम है अशोक और दिन भर शोक करता रहता है।
Misc.
जीव द्रव्य का ज्ञान-जीव को प्रदेशों की संख्या की मुख्यता से अस्तिकाय में ग्रहण किया है, उत्पाद व्यय ध्रौव्य की मुख्यता से द्रव्यों में ग्रहण किया है, ज्ञायक भाव की मुख्यता से तत्त्व में ग्रहण किया है एवं काल की मुख्यता से पदार्थों में ग्रहण किया है।
ज्ञान
अपना परिचय- नाम क्या है- जीव द्रव्य, कहाँ रहते हो- असंख्यात प्रदेश में, उम्र- अनाद्यनन्त, भाव- जानना देखना।
ज्ञान
नाम निक्षेप से लोगों द्वारा जैन साहब कहना, स्थापना निक्षेप से अष्ट मूलगुण धारी होना, द्रव्य निक्षेप से तत्त्वाभ्यासी होना, भाव निक्षेप से सम्यग्दर्शनादि से सहित होना।
धर्म
नय की अपेक्षा हलुआ में आटा, घी, शक्कर, बादाम आदि हैं, किन्तु प्रमाणकी अपेक्षा एक शब्द में हलुआ कहा जाता है।
ज्ञान
रसना से हलुआ चखा तो सिर्फ रस का ज्ञान हुआ, उसे नय कहते हैं।
ज्ञान
प्रमाण को षड्दर्शन वाले मानते हैं, लेकिन नय को मात्र जैन सिद्धान्त ही स्वीकार करता है।
ज्ञान
प्रमाण और नय विशेष के विषय हैं जैसे-पाँच ज्ञान हैं वे प्रमाण हैं, प्रमाण से महासत्ता और अवान्तरसत्ता, दोनों भिन्न हैं, महासत्ता दर्शन का विषय है, अवान्तरसत्ता प्रमाण और नय का विषय है।
ज्ञान
सत् आदि आठ अनुयोगों में प्रथम-प्रथम के ग्रहण करने पर द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव बनते हैं, जैसे सत् से द्रव्य, क्षेत्र से क्षेत्र, काल से काल, भाव से भाव, निक्षेप में भी द्रव्यादि बनते हैं, जैसे विद्यार्थी का नाम द्रव्य, उसका निवास क्षेत्र, उसकी उम्र काल, उसकी योग्यता भाव निक्षेप है।
ज्ञान
जीवविपाकी= भाव है, पुद्गलविपाकी= द्रव्य है, क्षेत्रविपाकी= क्षेत्र है, भवविपाकी= काल है।
कर्म
सभा है-सत्, कितने लोग हैं-संख्या, कहाँ पर हैं-क्षेत्र, कहाँ से आये, कहाँ जायेंगे-स्पर्शन, कितने बजे तक सभा होगी-काल, इसके बाद सभा कब होगी-अन्तर, क्षायोपशमिक आदि-भाव, स्त्री अधिक पुरुष कम इत्यादि-अल्पबहुत्व।
ज्ञान
असंज्ञीजीव के अवग्रह, ईहा आदि ज्ञान होते हैं।
ज्ञान
अर्थस्य से यहाँ तक अर्थावग्रह का वर्णन हुआ।
ज्ञान
गणधरदेव को मन:पर्यय ज्ञान होने से आहारक पुतला नहीं निकलता है।
ज्ञान
''तदनन्तभागेमन:पर्ययस्य'' इस सूत्र के विषय में दो मत हैं, एक मत के अनुसार सर्वावधि ज्ञान परमाणु को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान परमाणु के अनन्तवे भाग को जानता है, दूसरे मत के अनुसार सर्वावधिज्ञान कार्मण द्रव्य को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान कार्मण द्रव्य के अनन्तवे भाग को जानता है।
ज्ञान
विदेह आदि क्षेत्रों में जो अवधिज्ञान साथ जाये उसे क्षेत्रानुगामी अवधिज्ञान कहते हैं।
ज्ञान
मन:पर्ययज्ञानी मन में स्थित पदार्थ को जानते हैं, यदि मुट्टी में हैं तो नहीं जानेगे, लेकिन मुट्टी की वस्तु मन में हो तो जान लेंगे।
ज्ञान
अनुमान मतिज्ञान का भेद है और निमित्तज्ञान श्रुतज्ञान का भेद है, नारद और पर्वत जङ्गल में जा रहे थे, एक ने कहा यहाँ हाथी गया है, पैरों के चिन्हों से जाना, आगे जाकर कहता है, हथिनी गई है, वह एक आँख से कानी है, उस पर रानी बैठी है, वह गर्भवती है, उसको पुत्र होगा, ये सब अनुमान से जाना, बड़े पैर से हाथी का ज्ञान, लघुशङ्का से हथिनी का ज्ञान, एक तरफ की डालियाँ खाने से कानी हथिनी का ज्ञान, उतरते समय वजन पड़ा, इसलिए गर्भवती का ज्ञान, दाईं ओर से उतरी इसलिए लड़के का ज्ञान हुआ।
ज्ञान
प्यासे दो मित्र पानी की खोज में थे, देखा यहाँ से ठण्डी हवा आ रही है, पक्षी उड़ रहे हैं, हरे भरे वृक्ष हैं, महिलाएँ पानी ला रही हैं, अन्त में तालाब पर पहुँच गए, ये अनुमान ज्ञान है।
ज्ञान
हीयमान अवधिज्ञान जैसे भुज्यमान आयु सदा घटती जाती है, वर्धमान अवधिज्ञान जैसे तृष्णा बढ़ती जाती है, अवस्थित ज्ञान जैसे शरीर का तिल आदि, अनवस्थित ज्ञान जैसे चन्द्रमा की कलाएं इत्यादि।
ज्ञान