Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 240

जीवन जीना मौन से।

18 सूत्र

आवश्यकों का पालन करते समय, मलमूत्र का विसर्जन करते समय, पाप कार्य में, वमन के समय अथवा वाणी सम्बन्धी दोष से बचने के लिए हमेशा मौन रहना चाहिये।
वाणी
भोजन में लालसा रोकने से स्वाभिमान की रक्षा होती है, भोजन के समय मौन रहने से तप बढ़ता है और श्रुत की विनय होने से कल्याण होता है।
संयम
भोजन में लालसा के कारण हुङ्कार आदि सङ्केत नहीं करना, भोजन के आगे–पीछे संक्लेश नहीं करना, मौन पूर्वक भोजन करने से तप और संयम की वृद्धि होती है।
संयम
स्वारथ का संसार- बड़ा लड़का जङ्गल में निकलने वालों को लूटकर धन लाता था और घर चलाता था, एक दिन किसी बाबा को लूटने लगा, बाबा ने कहा संसार स्वार्थी है, क्यों मोह के वश हो पाप कमाकर दुर्गति में जाते हो, वह बोला हमारा सारा परिवार हमसे बहुत प्यार करता है, मेरा जहाँ पसीना गिरता है वहाँ सभी लोग खून बहाने को तैयार रहते हैं, बाबा ने कहा एक बार उनके सच्चे प्यार की परीक्षा कर लो, बाबा के कहे अनुसार घर जाकर बहाना बना कर लेट गया और जोर–जोर से कराहने लगा, बाबा वैद्य का भेष धारण करके आया और बोला मेरे पास मरे को जिन्दा करने की दवा है, लेकिन जो इसे पियेगा वो मर जायेगा और यह जिन्दा हो जायेगा, अभी तक जो विना उसके जीवित रहने को तैयार नहीं थे, रो रहे थे, अब वे सभी कहने लगे, हम स्वयं कमा कर खायेंगे, यहाँ तक कि माँ ने भी कह दिया कि हम समझ लेंगे कि हमारे छह ही बेटे हैं, वैद्य ने कहा इस दवा को हम पी लें? सबने कहा बड़ी कृपा होगी, स्वार्थी संसार देखकर उसको संसार से वैराग्य हो गया, सोचने लगा स्वार्थियों के लिये पाप करके हम दुर्गति में क्यों जायें और वह आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ गया।
अनासक्ति
स्वामित्व बुद्धि- यह संस्था, परिवार, समाज, देश मेरे विना नहीं चलेगा, ऐसा कहते हुये कई चले गये, संस्था वहीं खड़ी हैं, ज्यों की त्यों चल रहीं हैं, उनकी रक्षा कौन करता है?
अनासक्ति
मौन धारण करने वाले को भोजन सम्बन्धी लालसा के लिये हुङ्कार, अङ्गुलि दिखाना, खांसी, भोंह चलाना, सिर हिलाना आदि से सङ्केत नहीं करना चाहिए।
संयम
जिसके द्वारा मौन धारण किया जाता है, उसके द्वारा सन्तोष धारण किया जाता है, वैराग्य प्रदर्शित किया जाता है और संयम पुष्ट किया जाता है।
संयम
भोजन में लालसा के त्याग से तप की वृद्धि होती है, स्वाभिमान की रक्षा होती है और तीनों लोकों में मन की सिद्धि होती है। ''श्रुत की विनय होने से कल्याण की प्राप्ति होती है, समृद्धि की प्राप्ति होती है और मनुष्य लोक को प्रसन्न करने वाली जिनवाणी की प्राप्ति होती है''।
संयम
जिसके द्वारा निर्दोष मौन का पालन किया जाता है उसकी वाणी शास्त्र से सम्बन्धित, मनोरम एवं ग्रहण करने योग्य होती है।
वाणी
लोक में जितने भी विद्वानों के द्वारा वन्दनीय पद हैं, वे सभी मौन धारण करने वाले प्राणी के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं।
संयम
शुद्ध मौन धारण करने से मन की सिद्धि पूर्वक शुक्लध्यान की प्राप्ति होती है, वचन ऋद्धि के साथ तीनों लोकों का उपकार करने वाली दिव्यध्वनी खिरती है।
ध्यान
मौन का नियम पूरा हो जाने पर एक महोत्सव करना चाहिए, जिनालय में एक घण्टा दान करना चाहिए और आजीवन मौन का निर्दोष पालन करना चाहिए।
संयम
जो पर दोष कहने में मूक रहता है, पर स्त्री के देखने में अन्धा रहता है, पर के धन हरण करने में लङ्गड़ा रहता है वह पुरुष तीनों लोकों में विजय प्राप्त करता है।
संयम
विना पूँछे न बोलें, दूसरे के द्वारा पूँछे जाने पर भी न बोलें, बुद्धिमान आत्म शान्ति के लिए जानते हुए भी मूर्ख की तरह आचरण करे।
संयम
यदि स्वयं अशान्त हो तो कभी मत बोलो क्योंकि अशान्त व्यक्ति के वचन सुनकर सभा में अशान्ति होगी।
संयम
जो दुष्ट सभा में श्रोताओं का समय बर्बाद करता है, वह मूर्ख मौन का आलम्बन क्यों नहीं लेता है?
वाणी
जहाँ नदी गहरी होती है वहाँ जल प्रवाह शान्त तथा गम्भीर होता है, इसी प्रकार गम्भीर व्यक्ति शान्त होता है।
संयम
महापुरूष बोलकर कम, मौन से अधिक उपदेश देते हैं।
वाणी