Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 106

घाट में घाट का सन्तुलन।

16 सूत्र

एक बुढ़िया सुई खोज रही थी, किसी ने पूछा हे अम्ब! क्या खोज रही हो? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने कहा! प्रकाश में खोजो। बुढ़िया सड़क के उजाले में जाकर सुई को खोजने लगी, किसी ने पूँछा क्या खोज रही हो अम्मा? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने पूँछा कहाँ गिरी है? अम्मा ने कहा! घर में। तब सामने वाले ने कहा! घर में उजाला कर के खोजो तब मिलेगी। उसी प्रकार हमारी आत्मा एवं शान्ति अन्दर है पर हम उसे बाहर पैसे, गाड़ी, सुविधा, ऐश-आराम आदि में खोज रहे हैं।
विवेक
जैसे कुम्हार के चक्र पर रखी मिट्टी घूमती है वैसे ही जीव मोह पिशाच के द्वारा कोल्हू के बैल की तरह निरन्तर चिन्तातुर होकर घूमते हैं।
अनासक्ति
जैसे मुख में जीभ साथ में आती है और दाँत बाद में, उसी तरह अगृहीत मिथ्यात्व साथ में आता है, गृहीत बाद में आता है, दूध में पानी मिलाना गृहीत है और जो स्वभाव से मिला है वह अगृहीत है।
विवेक
पगड़ी का पड़ाव बड़ों के शिर पर- घर में छोटे लड़के को भले ही लाड़ प्यार अधिक हो किन्तु पगड़ी तो बड़े लड़के को ही बाँधी जाती है, उसी तरह से सम्यक्त्व की भले ही प्रशंसा की गयी हो, लेकिन मोक्ष तो चरित्र से ही प्राप्त होता है।
चरित्र
जैसे पनहारिन सिर पर जल का घट रखकर, हाथ छोड़कर चलती है, बातें करती है, हँसती है, लेकिन घट का सिर से सन्तुलन नहीं बिगड़ने देती है, प्रतिपल स्मृति घट पर रहती है कहीं गिर न जाये। जैसे गाय जङ्गल घास चरने जाती है, पर बछड़े का ध्यान हमेशा करती है। जैसे नृत्य कारिणी पूरे मञ्च पर नाचती है पर वाद्य स्वरों के साथ पैरों का संतुलन बनाकर रखती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव सबके बीच में रहता है, किन्तु अपने आत्मा को नहीं भूलता है।
विवेक
नित्य स्वाध्याय सम्यग्दर्शन का प्रबल कारण है।
ज्ञान
आठ अङ्ग बन्दर के भी होते हैं, मनुष्य के भी होते हैं, किन्तु जैसे मनुष्य के होते हैं, वैसे बन्दर के नहीं होते, उसी प्रकार आठ अङ्ग मिथ्यादृष्टि के भी होते हैं, सम्यग्दृष्टि के भी होते हैं, किन्तु जैसे सम्यग्दृष्टि के होते हैं, वैसे मिथ्यादृष्टि के नहीं होते हैं।
विवेक
जो सर्वश्रेष्ठ आत्मा को छोड़कर पर द्रव्यों में रमण करता है वही तो मिथ्यादृष्टि है, इसके अलावा और क्या मिथ्यादृष्टि के माथे पर सींग होते हैं?
विवेक
अपने दोषों को विलीन करना है तो परमात्मा में लीन हो जाओ।
ध्यान
जैसे मन्त्र की पूर्णता विष को दूर करती है वैसे ही आठ अङ्ग की पूर्णता संसार को दूर करती है।
विवेक
सम्यक्त्व के साथ नरक में रहना अच्छा है, किन्तु सम्यक्त्व के बिना देवगति में भी रहना अच्छा नहीं है।
विवेक
हिंसा से रहित, एकाकी, समस्त उपद्रव को सहन करने वाला मनुष्य वृक्ष की तरह जङ्गल में रहने पर भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के बिना मोक्ष को प्राप्त नहीं होता है।
विवेक
अभव्य मिथ्यादृष्टि जीव जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गए तत्त्वों की श्रद्धा करता है, प्रतीति करता है, रुचि करता है, स्पर्श भी करता है किन्तु धर्म को भोग का कारण बनाता है कर्मक्षय का कारण नहीं बनाता है।
विवेक
हिंसा रहित धर्म, अठारह दोष रहित देव, निर्ग्रन्थ गुरु के श्रद्धान करने से सम्यग्दर्शन होता है।
विवेक
मिथ्यादृष्टि होने से मनुष्य पशु के समान है और सम्यग्दृष्टि होने से पशु मनुष्य के समान है।
विवेक
दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप सम्यक्त्व के बिना पाषाण के समान है और सम्यक्त्व से सहित होने पर महामणि के समान मूल्यवान हो जाते हैं।
विवेक