Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 52

अनुभव खुली किताब पढ़ो

72 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जल्दबाजी में न कोई काम स्वयं करें, न दूसरे से करवाएँ, जल्दीबाजी में काम लेने से मूर्ख आदमी को पछताना पड़ता है।
विवेक
जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वे काम ही उसे तपाते हैं, जैसे मुँह में डाला हुआ गर्म भोजन।
विवेक
जिसे हम नहीं समझ सकते वह गलत ही है, यह मानने की जल्दबाजी करना भूल है, कितनी ही बातें पहले समझ में नहीं आती थीं, वे आज दीपक की तरह दिखाई देती हैं।
ज्ञान
जब पड़ाव दूर हो तो रुक-रुक कर चलना चाहिए।
पुरुषार्थ
श्रद्धा, शील, लज्जा, संकोच, श्रुत (ज्ञान), त्याग और बुद्धि ये सात धन जिस स्त्री या पुरुष के पास है वही वास्तविक धनी है उसी का जीवन सफल है।
धन
जो ईश्वर की आराधना के साथ-साथ पुरुषार्थ करते हैं उनके दुःख और दारिद्रय दूर होते हैं और ऐश्वर्य बढ़ता है।
पुरुषार्थ
जो मनुष्य अपनी उन्नति चाहता है, उसे चाहिए कि वह दूसरों के गुण देखने की आदत डाले।
चरित्र
जो मानव अपने अवगुण व दूसरों के गुण देखता है, वही महान् बन सकता है।
विनम्रता
आप दूसरों को तभी ऊपर उठा सकते हो, जब आप स्वयं ऊपर उठ चुके हो।
चरित्र
अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन में दो सर्वोत्तम वरदान हैं।
स्वास्थ्य
जिनके भाग्य में विनाश लिखा है, उनकी टालमटोल, विस्मृति, सुस्ती और निद्रा-ये चार निकृष्ट नौकायें हैं।
पुरुषार्थ
महापुरुषों का सर्वश्रेष्ठ सम्मान हम उनका अनुकरण करके ही करते हैं।
भक्ति
जो लोग हल के सहारे जीते हैं, वास्तव में वे ही जीते हैं और सब लोग तो दूसरे की कमाई हुई रोटी खाते हैं।
पुरुषार्थ
जो लोग खेती करके जीविका चलाते हैं, वे केवल यही नहीं कि स्वयं कभी भीख न मागेंगे, बल्कि दूसरे भीख माँगने वालों को कभी इंकार किए बिना दान भी दे सकेंगे।
दान
जीवन का सच्चा पथ यह नहीं कि-जो हमें प्राप्त नहीं है उसके लिए हम रोते रहें बल्कि जो है उसमें संतोष का सच्चा सुख प्राप्त करें।
संतोष
आपका जीवन एक ऐसी खुली पुस्तक होना चाहिए, जिसका प्रत्येक पृष्ठ खुला हुआ हो, जिसकी प्रत्येक पंक्ति स्पष्ट हो और पढ़ी जा सके।
सत्य
जो गुणवान है वही जीवित है। जो धार्मिक है, वही जीवित है। जो गुण व धर्म से रहित है, उसका जीवन निष्फल है।
चरित्र
जीवन वही है जो परतंत्र न हो।
चरित्र
जिसका वृत्तान्त सुनकर तथा जिसका स्मरण करने पर प्राणियों को आनन्द होता है, उसी का जीवन शोभा देता है।
चरित्र
तरह-तरह की अभिलाषाएँ करते-करते ही सारी आयु बीत गई पर हाय! अब तक वह कुछ नहीं कर सका जो सत्पुरुषों के द्वारा स्मरण करने योग्य शेष रहता।
अनासक्ति
जिन मूल्यों के लिए जान दी जा सकती है, उन्हीं के लिए जीना सार्थक है।
चरित्र
धीरे-धीरे जियो का अर्थ इतना ही तो है कि जीवन की शक्ति संभाल कर खर्च करो।
संयम
निष्कलंक का ही जीवन है, यश हीन का जीवन मरण तुल्य है।
चरित्र
इस अज्ञानी लोक को जिस आचरण से तत्त्वबोध हो वह आचरण ज्ञानी करता है क्योंकि ज्ञानी का अज्ञानी को बोध देने के अतिरिक्त और कुछ कर्त्तव्य नहीं है।
ज्ञान
देर करना सदैव खतरनाक है और किसी भव्य योजना को टालते रहना प्रायः उसे नष्ट करना होता है।
समय
जिस समय जो कार्य करना उचित हो, उसे उसी समय शंका रहित होकर शीघ्र करना चाहिए क्योंकि समय पर हुई वर्षा फसल की पोषक होती है असमय की वर्षा फसल विनाशिनी होती है।
समय
सैकड़ों आज्ञाओं से मनुष्य उतनी तत्परता से प्रवृत्त नहीं होता जितना लोभ से कार्य करता है।
अनासक्ति
युवा लोग किसी कार्य की समाप्ति पर थक जाते हैं और वृद्ध कार्य के प्रारम्भ में ही थक जाते हैं।
पुरुषार्थ
असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं हुआ है।
पुरुषार्थ
असफलताएँ कभी-कभी सफलता का आधार होती हैं, यदि हम अनेक बार भी असफल होते हैं तो कोई बात नहीं, प्रयत्न करके असफल हो जाने की अपेक्षा प्रयत्न न करना अधिक अपमानजनक है।
पुरुषार्थ
मनुष्य सफलता से कम असफलता से ज्यादा सीखता है।
पुरुषार्थ
जिसके पास उम्मीद है, वह लाख बार हार कर भी नहीं हारता है।
पुरुषार्थ
जो व्यक्ति अपने सामने कोई बड़ा उद्देश्य नहीं रखता है, वह जीवन भर केंचुए की ही चाल में रेंगता रह जाता है।
पुरुषार्थ
अपना ही दोष ढूँढ़ निकालना ज्ञानवीरों का काम है।
विनम्रता
बुद्धिमानों की परीक्षा संकट काल में होती है और शूरों की संग्राम में होती है।
चरित्र
संकट उपस्थित होने पर भी जिसकी बुद्धि विचलित नहीं होती है वह कार्य में सफल हो जाता है।
पुरुषार्थ
मनुष्य के पास बुद्धि बल से बढ़कर श्रेष्ठ कोई दूसरी वस्तु नहीं है।
ज्ञान
जिसके पास बुद्धि है उसके पास सबकुछ है किन्तु मूर्ख के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है।
ज्ञान
बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
ज्ञान
थोड़ा पढ़ना और अधिक सोचना, कम बोलना अधिक सुनना, यही बुद्धिमान बनने का उपाय है।
ज्ञान
बुद्धिमान के पास थोड़ा सा भी धन हो तो वह बढ़ता रहता है और वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयम के द्वारा सर्वत्र प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है।
ज्ञान
बुद्धिमान मूर्खों से जितनी शिक्षा प्राप्त करते हैं, उतनी सीख मूर्ख बुद्धिमानों से नहीं ले पाते हैं। बुद्धिमान लोग सदैव पुरुषार्थ द्वारा अपने भाग्य को बदल देते हैं।
ज्ञान
कोई दूसरा हमारी भूल को सुधारे उससे कहीं अच्छा है कि अपनी भूल अपने ही हाथों सुधार ली जाये।
विनम्रता
अपने लक्ष्य को न भूलो अन्यथा जो कुछ मिलेगा, उसी में संतोष मानने लगोगे।
पुरुषार्थ
जिसका उद्देश्य ऊँचा है उसे आराम तलवी और लोकप्रियता से बचना चाहिए।
पुरुषार्थ
लक्ष्य हीन जीवन भटकाव भरा होता है अतः लक्ष्य अवश्य बनायें।
पुरुषार्थ
जो मिट्टी से भी सोना बनाते हैं, वही व्यवहार कुशल है।
विवेक
किसी वस्तु के दोष का ध्यान न करते हुए विद्वान् उनके गुणों को ग्रहण कर लेते हैं, भौंरा जैसे काँटो वाले फूलों की गंध और पराग का उपयोग कर लेता है।
विवेक
शिक्षाएँ उनकी ग्रहण करें जो विद्वान् हों, श्रेष्ठ कर्म करते हों, खोटे स्वभाव के व्यक्तियों को सदैव दूर ही रखना चाहिए इसी में मनुष्य का कल्याण निहित है।
संगति
सफलता एक ऐसी सीढ़ी है, जिस पर तुम अपने हाथ जेब में डालकर नहीं चढ़ सकते हो।
पुरुषार्थ
यदि तुम जीवन में सफलता पाना चाहते हो तो धैर्य को अपना घनिष्ठ मित्र, अनुभव को अपना परामर्श दाता, सावधानी को अपना बड़ा भाई और आशा को अपनी संरक्षक प्रतिभा बना लो।
पुरुषार्थ
मैंने समय नष्ट किया और समय अब मुझे नष्ट कर रहा है।
समय
क्या तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है? तो समय को व्यर्थ मत गँवाओ क्योंकि जीवन समय से बना है। आनन्द और कर्म से घंटे छोटे प्रतीत होते हैं।
समय
सद्गुणों को पाने के लिए प्रयत्न करो बाहरी आडम्बरों से क्या लाभ, ठांठ गाय केवल गले में घंटी बाँधने से ही नहीं बिकती है।
चरित्र
उत्तम कार्य चाहते हो तो स्वयं करो।
पुरुषार्थ
छोटी–छोटी बातों के लिए दूसरों का मुँह ताँकना, समर्थ होने पर भी अपना काम स्वयं न करना गर्व की बात नहीं है, बल्कि स्वावलम्बी होना निश्चय ही गर्व की बात है।
चरित्र
काम करके कुछ उपार्जन करना शर्म की बात नहीं, दूसरों का मुँह ताकना शर्म की बात है।
पुरुषार्थ
प्रतिष्ठा, आलसियों और अपाहिजों की तरह दूसरों के बल पर जीने में नहीं है, वह है अपना काम स्वयं करने में और सच्चाई–ईमानदारी से अपना पसीना बहाकर रोटी कमाने में।
पुरुषार्थ
शरीर को रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं है।
स्वास्थ्य
वही सच्चा साहसी है, जो कभी निराश नहीं होता है।
पुरुषार्थ