Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 20

धैर्य

95 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

परिणामों में निर्मलता आने से असंयम स्वयं ही भाग जायेगा।
संयम
समता की परीक्षा विषमता में ही होती है। समता के बिना साधुपन नहीं रह सकता।
संयम
समता के अभाव में मौन, अध्ययन, नियम, व्रत, उपवास, तप सब व्यर्थ हैं।
संयम
हम हर मिलने वाले से कुछ सीख सकते हैं पर हमारा दिमाग खुला होना चाहिए।
ज्ञान
सब्र और सच्चाई एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को गिरने नहीं देती ना किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में।
चरित्र
सम्पत्ति स्वयं अपने साथ विपत्ति को लेकर आती है।
धन
साधु शरीर से श्रम भले करते हों पर लक्ष्य अंदर की शान्ति का रहता है, यदि अन्तरंग में शान्ति नहीं तो 'श्रम' मजदूर के श्रम समान है।
ध्यान
साहस मानवीय गुणों में प्रमुख है क्योंकि वह बाकी सभी गुणों की गारंटी देता है, साहस सिर्फ खड़े होकर बोलना ही नहीं, बैठकर धैर्यपूर्वक सुनना भी है।
चरित्र
'शोक' धर्म, बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, शरीर, जप, तप, संयम और शान्ति को नष्ट करता है। शोक से मुक्त होना है तो शौक करना छोड़ दो।
अनासक्ति
जब भी आप हार जायें उसे सफलता की ओर एक सीढ़ी मानें, जो कि आप तय कर चुके हैं।
समृद्धि
कोटि-कोटि साधना का उद्देश्य मन को शान्त करना है, अन्यथा सारी साधना बेकार है।
ध्यान
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है, इस बात को समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्ति में घबराते नहीं हैं।
चरित्र
आपत्ति पड़ने पर जो घबराता नहीं है, वह कल्याण को प्राप्त करता है।
चरित्र
अज्ञानी लोग छोटे काम ही आरम्भ करते हैं और अत्यन्त व्यग्र हो जाते हैं, बुद्धिमान लोग महान् कार्य हाथ में लेते हैं परन्तु व्याकुल नहीं होते हैं।
चरित्र
दुःख आ पड़ने पर मुस्कुराओ उसका सामना करके विजयी होने का साधन इसके समान और कोई नहीं है।
चरित्र
जो लुट जाने पर भी मुस्कुराता है, वह चोर का दिल चुरा लेता है।
चरित्र
किसी कार्य के लिए कला एवं विज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, उसमें धैर्य की भी आवश्यकता है।
चरित्र
धैर्यवान और बुद्धिमान मनुष्य को बहुविध शोक, विलाप और रुदन सभी अवस्थाओं में त्याग देने योग्य है।
अनासक्ति
धीर पुरुष कार्य प्रारम्भ कर दृढ़ता से करते हैं, छोड़ते नहीं हैं।
पुरुषार्थ
शक्ति भय के अभाव में रहती है, न कि मांस या पुट्ठों के गुणों में जो कि हमारे शरीर में होते हैं।
चरित्र
परिस्थितियाँ ही मनुष्य में साहस का संचार करती हैं।
चरित्र
तत्त्वज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह अपमान को अमृत के समान समझकर उससे सन्तुष्ट हो और विद्वान् मनुष्य सम्मान को विष के तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।
विनम्रता
जो अधीर और असमर्थ होते हैं, उनमें उत्साह उत्पन्न नहीं होता, प्रायः उत्साही पुरुष ही राज्य सम्पत्ति का उपभोग करते हैं।
पुरुषार्थ
भरी नदी की भाँति व्यवहार, वचन और भावों में गंभीरता होना चाहिए चाहें, बिजली कितनी ही तड़के पर आकाश में खलबली नहीं मचती है, विविध लहरों में भी निश्चलता यही समुद्र का सच्चा गांभीर्य है।
चरित्र
विश्वास पूर्वक अपराध करते जाओ हम तुम्हारा सब कुछ सहन कर लेंगे, विश्वास रखो कि गुणों से भरे हृदय में दोष नहीं समाते हैं।
क्षमा
जीवन संघर्ष में वही सफल होते हैं, जिन्हें माता-पिता ने शान्त रहने और धैर्य रखने की शिक्षा दी हो, धैर्य प्रतिभा का एक आवश्यक अंग है।
संयम
भय से मनुष्य को तब तक डरना चाहिए जब तक भय नहीं आया है, परन्तु जब आ ही जाए तो निडर होकर उस पर प्रहार करना चाहिए।
चरित्र
मनुष्य के मन पर भय का जितना प्रभाव पड़ता है, उतना और किसी शक्ति का नहीं।
मन
संतोष रूपी अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं, उन्हें जो शान्ति और सुख मिलता है, वह धन के लोभियों को इधर-उधर दौड़ने से भी प्राप्त नहीं होता है।
संतोष
चोर से जैसी सावधानी बरतते हो वैसी ही क्रोध से भी बरतो।
क्षमा
मानसिक पापों से सदा सावधान रहो, उनका परित्याग करो, मन से उन कुवासनाओं को निकाल दो, जो दुष्कर्म कराती हैं।
मन
असावधानी विनाश को शीघ्र ही बुलाती है, सचेत रहो, सावधानी रखो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अंदर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है।
संयम
जिस राजा में कानों को अप्रिय लगने वाले वचनों को सहन करने की क्षमता है, पृथ्वी निरन्तर उसकी छत्रछाया में रहेगी।
क्षमा
संकट के स्थान में सहसा दौड़ पड़ना मूर्खता है, बुद्धिमानों का यह भी कहना है कि जिससे डरना चाहिए उससे डरते ही रहें।
विवेक
कामान्ध को कुछ नहीं दिखता, जो नशा करके मदोन्मत्त हो जाए उसे भी कुछ नहीं दिखता और जो किसी स्वार्थ के लोभ से अन्धा हो जाता है उसे भी किसी काम में कोई दोष दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति