Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 3 / 6

मस्तिष्क को शान्त रखने वाला सदैव विजयी होता है।
संयम
जो व्यक्ति अपनी वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर और लिंग; इन छह के वेग को जीत लेता है, वही धीर कहलाता है, उसी को पूरी पृथ्वी पर शिष्य बनाने का अधिकार है अर्थात् वही गुरु बनने योग्य है।
संयम
जो दुनिया का गुरु बनता है, वह दुनिया का गुलाम हो जाता है और जो अपने आपका गुरु बनता है, वह दुनिया का गुरु हो जाता है।
संयम
जो मन की मानते हैं वे मानी होते हैं और जो मन को मारते हैं वे ज्ञानी होते हैं।
संयम
जितना प्रयत्न व परिश्रम परद्रव्य के उपार्जन या रक्षण में किया जाता है, उससे भी कम प्रयत्न यदि समता भाव के सम्भालने में किया जावे तो सांसारिक वैभव तो अनायास व अनाकुल सुख की प्राप्ति भी अविलम्ब होगी।
संयम
पर द्रव्य का आश्रय कर कुछ भी विचार कर दुःखी हो लो और आगे के लिए कर्म बाँध लो किन्तु परद्रव्य कभी सहायक नहीं होगा, मात्र अपने समता परिणाम का ही विश्वास रखो और समता सुधा का पान कर अमर बनो।
संयम
जो उलझनें कभी न सुलझें, वे माध्यस्थ भाव से क्षणमात्र में सुलझ जाती हैं।
संयम
जब आपको किसी मामले में भलाई-बुराई न सूझ पड़े, तब उस समय अपनी इच्छा पर संयम रखें।
संयम
मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
संयम
स्त्री विषयक आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धन का दुरुपयोग करना; ये सात दुःखदायी कार्य लोगों को सदा के लिए त्याग देने चाहिए क्योंकि इनसे प्रतापी राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।
संयम
जो जितने ऐश-ओ-आराम में जीते हैं, वे उतने ही आलसी और देह प्रेमी होते हैं।
संयम
शराब, सैक्स और संगीत मूर्च्छा में ले जाते हैं।
संयम
अत्यधिक अनुशासन से व्यक्ति विद्रोही बन जाता है।
संयम
क्रोधाग्नि, कामाग्नि, जठराग्नि और दावाग्नि को जीतने वाला ही आनंद को प्राप्त करता है। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता के भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना तथा संयमपूर्वक रहना ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं।
संयम
उपसर्ग करने वाला नहीं उपसर्ग सहने वाला सदा याद किया जाता है।
संयम
जब गंध अधिक बढ़ती है, तब बाग उजड़ जाते हैं। जब आवाज अधिक बढ़ती है, तब राग बिगड़ जाते हैं ॥ क्योंकि हर चीज की एक सीमा होती है बन्धुओं! जब स्वार्थ अधिक बढ़ता है, तब व्यवहार बिगड़ जाते हैं ॥
संयम
तौलने से अनाज की रक्षा होती है, फेरने से पान की रक्षा होती है, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की रक्षा होती है, मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है, संयम से आत्मा की रक्षा होती है, बाड़ी से खेत की रक्षा होती है और अच्छे संस्कारों से परिवार की रक्षा होती है।
संयम
कायर पुरुष शस्त्रधारी होने पर भी वैरी का घात नहीं कर सकता, उसी प्रकार विषय-कषायी व्यक्ति बहुत ज्ञान होने पर भी दुर्गति के दुःख नष्ट नहीं कर सकता है।
संयम
कामना को सन्तुष्ट नहीं करना ही अच्छा है। उपेक्षा सबसे बड़ा दण्ड है।
संयम
कामी, क्रोधी, लोभी, अहंकारी, मद्यपायी, व्यसनी सूर्योदय में भी नहीं देख पाते हैं।
संयम
पराधीनता नरक के समान दुःखदायी होती है।
संयम
उन्नति वही कर सकता है, जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।
संयम
जिसमें शान्ति का निवास नहीं है, उसके सारे सद्गुण व्यर्थ हैं।
संयम
जुआ सगे बाप का न हुआ। जुआ के कारण ही युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डवों को १२ वर्ष तक वनवास हुआ था, जिससे द्रौपदी आदि को एवं समस्त परिवार को दुःखी होना पड़ा था।
संयम
शराब पीने से प्राणी की स्मरण शक्ति क्षीण होती है, शराब से व्यक्ति की कामाग्नि अति तीव्र होती है, जिससे व्यक्ति स्वस्त्री से संतुष्ट न होकर परस्त्री एवं वेश्या सेवन करता है। शिकारी सदा भिखारीवत् होता है।
संयम
अव्यवस्थित दिनचर्या सदैव हानिकारक होती है, इससे आप पराधीन हो जाते हैं और आपके गुणों को अवगुणों की चादर ढँक लेती है, फिर शुरू होता है समस्याओं का अंतहीन सिलसिला। अपनी आवश्यकताएँ कम करके आप वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।
संयम
अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को कभी स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए।
संयम
दूसरों के सहारे (बैसाखियों से) चलने वाला मंजिल नहीं पा सकता है।
संयम
वही उन्नति कर सकता है जो स्वयं को उपदेश देता है।
संयम
अपनी भूल अपने ही हाथों सुधर जाएँ तो यह इससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।
संयम
पड़ोसी की सौ भूल सुधारने की अपेक्षा अपनी एक भूल सुधारना कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है।
संयम
जो करें स्वयं के बल पर करें, दूसरों का सहारा लेकर नहीं क्योंकि परायी नींव पर खड़ा भवन अधिक समय तक नहीं टिक सकता है।
संयम
दूसरों के सहारे जीवन जीने वाला कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता है, जैसे बैसाखी के सहारे चलने वाला पर्वत पर नहीं पहुँच पाता है।
संयम
धैर्यवान, बुद्धिमान महापुरुष के लिए शोक और रुदन विषम परिस्थिति में सर्वथा त्याज्य है।
संयम
अपनी बुराइयों को अपने मरने से पहले ही मर जाने दो।
संयम
सबसे शानदार विजय है–अपने पर विजय प्राप्त करना और शर्मनाक बात है–अपने से परास्त हो जाना।
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सभ्यता की एकमात्र कसौटी है–सहनशीलता।
संयम
स्वावलम्बन द्वारा सम्पादित कार्य से सुख उपजता है।
संयम
स्वावलम्बन परमार्थ के लिए जरूरी है।
संयम
किसी भी विकार का ताँता लगने पर उस उपयोग को बदल देना वीरता है।
संयम
अपने विचार के विपरीत दूसरों की परिणति देखकर संक्लेश मत करो तुम्हारी परिणति ही तुम्हारे अधीन है।
संयम
इक ले रहो तो निर्जन वन में, ग्राम रहो तो धर्मी गण में। मन न लगे तो लगो लिखन में, निर्मल मन हो तो लगो पठन में। कुमति रहे, चल गुरु चरणन में, हो विकल्प लग देव भजन में। काम समय लग मल (अशुचिभावना) वर्णन में, क्रोध करो तो निज कुमतिन में। मान करो निजशुचि गुण गान में, माया हो छुप शुद्धातम में। लोभ करो निर्मल निज गुण में, हो प्रसन्न निर्मल चिन्तन में। प्रेम करो केवल ज्ञानि में, कर विरोध मिथ्याभावन में। शोक करो कुत्सित कृत्यन में डर नित डरनित पाप करन में। घृणा करो तो पापीमन में, रह निःशंक नित आत्म मनन में। तन मन धन दो ज्ञान मिलन में, प्रिय हित वचन कहो सब जन में।
संयम
हर परिस्थिति में शान्त रहें तो जीवन में अपने आप को बहुत मजबूत पायेंगे क्योंकि लोहा ठंडा रहने पर ही, मजबूत होता है गर्म रहने पर लोहे को मनचाहे आकार में ढाल दिया जाता है। ''पुरुषत्व तो परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने में है।''
संयम
जो व्यक्ति जितनी अपने स्वार्थ की आहुति करता है, उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती है।
संयम
अरे आत्मन्! शान्ति की परीक्षा अनिष्ट समागम में होती है।
संयम
जो स्वयं भीतर की निर्बलता से लड़े वह साहसी है।
संयम
मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रण कर्ता, स्वामी है।
संयम
दूसरों को नहीं स्वयं को वश में करने वाला वीर होता है।
संयम
हारना तब आवश्यक हो जाता है जब लड़ाई अपनों से हो और जीतना तब आवश्यक हो जाता है जब लड़ाई अपने आप से हो।
संयम
कभी भी लोग आपके बारे में टीका-टिप्पणी करें तो घबराना मत, बस यह बात याद रखना हर एक खेल में दर्शक ही शोर मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं।
संयम
व्यक्ति महान् इसलिए नहीं कि उसके पास पाँचों इन्द्रियों के भोग हैं, बल्कि वो व्यक्ति महान् होता है जो पाँचों को छोड़ देता है।
संयम
साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है।
संयम
तोते की तरह बंधन में बैठने को साधना नहीं संयम के साथ बैठना साधना है।
संयम
आत्मानुशासक, अनुशासन प्रिय ही दूसरों पर अनुशासन कर सकता है।
संयम
स्पर्शन इन्द्रिय डेढ़ प्रतिशत, रसना एक प्रतिशत, घ्राण साढ़े तीन प्रतिशत, चक्षु तिरासी प्रतिशत, कर्ण ग्यारह प्रतिशत, अच्छे या बुरे पदार्थों से आत्मा को प्रभावित करते हैं।
संयम
धीरे-धीरे जियो का अर्थ इतना ही तो है कि जीवन की शक्ति संभाल कर खर्च करो।
संयम
सच्चा यज्ञ अपने भीतर की कषायों की आहूति देना है।
संयम
अनुशासनहीन बालक आसानी से बिगड़ जाते हैं।
संयम
युद्ध जीतने से ही नहीं इन्द्रियों को जीतने से सच्चा शूरवीर होता है। वाक्पटुता से ही नहीं जो हितकर वचन बोले वही सच्चा वक्ता है और केवल धन का दान करने से ही नहीं जो दूसरों का मान सम्मान करे वही सच्चा दाता है।
संयम
महापुरुष धनी होने पर भी उन्मत्त नहीं होते हैं युवक होने पर भी चंचल नहीं होते हैं और शक्तिशाली होने पर भी प्रमत्त नहीं होते हैं।
संयम
गुरुजनों के शासन से शून्य किस के बाल्यकाल में उद्दण्डता नहीं आती है ?
संयम
अच्छा कार्य, तभी सरल हो पाता है जब इच्छा आत्मानुशासन सीख लेती है।
संयम
अपने द्वारा की गयी अनियंत्रित चंचलता दुःख देती है।
संयम
वैसे तो सभी इन्द्रियज्ञान प्रायः समता के बाधक हैं किन्तु आँख द्वारा अवलोकन अधिक बाधक है अतः नेत्रोपयोग निजचर्या में ही करो यथा लिखने में, पढ़ने में, चलने में, उठने–बैठने में, चीज उठाने रखने में, दर्शन में, पूजन में, वंदन में, वैय्यावृत्य में, भोजन में, धर्मात्माओं से वार्तालाप में, दुखियों को समझाने में और नित्य क्रिया में।
संयम
रसना का सम्बन्ध मन से है, मन चंचल होता है अतः रसना को जीतना कठिन है।
संयम
कषाय नहीं होने देना बड़ी तपस्या है।
संयम
जहाँ अपवाद का बादल छा रहा हो, वहाँ घबराना मूर्खता है, वह वातावरण तो तुम्हारा उपकारक है धीर बनाने वाला है, अपने आत्म तत्त्व को देखो और प्रसन्न रहो।
संयम
मान लो तुम्हें दुनिया का कोई मनुष्य नहीं जानता, तुम अकेले एक जगह पड़े हो, कोई चर्चा करने वाला नहीं है तो ऐसी हालत क्या तुम्हें पसंद है? बुरी तो नहीं लगती? यदि विषाद नहीं है तो कल्याण के पात्र हो।
संयम
खुद पर विजय सबसे बड़ी जीत, खुद से हार जाना शर्मनाक हार है।
संयम
किसी के सहारे की अपेक्षा मत रखो, शरीर ही सहारा नहीं देगा तब दुनिया क्या सहारा देगी।
संयम
दुनिया का सबसे मुश्किल काम, अपने काम से काम रखना है।
संयम
मदन का दमन मन से होता है।
संयम
आप किसी को सुधार पाओ या नहीं पर अपनी आँखों को अवश्य सुधार लेना।
संयम
कषायोदय में चारित्र नहीं होता है, चारित्र के सद्भाव में निराकुल सुख शान्ति की शक्तियाँ प्रकट होती है।
संयम
खुशी से सहन किया कष्ट, कष्ट मालूम नहीं पड़ता है।
संयम