Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Mind

मन

369 सूत्र · पृष्ठ 5 / 5

हमारी चिन्ताएँ हमेशा हमारी कमजोरियाँ बताती हैं।
मन
सब मेरे विचारों से सहमत हों, यह मत सोचिए, बल्कि यह सोचिए कि मेरे विचार सही व शुद्ध हों।
मन
चिन्तन के साथ निर्णय करना जरूरी है, अन्यथा चिन्तन भार-भूत बन जायेगा।
मन
उपेक्षित व्यक्ति सक्षम और प्रतिभा सम्पन्न क्यों न हो पर उसमें आत्मविश्वास की कमी रहती है।
मन
आकुलता संसार को बढ़ाने वाली है।
मन
मन वहीं लगता है जहाँ प्रीति होती है।
मन
आपका हृदय कैसा है- किसमिस के समान, बादाम, नारियल या बेर के समान स्वयं निर्णय करें।
मन
शरीर की, वचन की, मन की एवं आत्मा की शक्ति उत्तरोत्तर अनन्त गुनी होती है।
मन
सकारात्मक और नकारात्मक सोच-चार मिलने वालों ने कहा 'आप अस्वस्थ्य दिख रहे हैं' मन ने स्वीकार कर लिया और व्यक्ति बीमार हो गया, तब अस्वस्थ व्यक्ति अपने को स्वस्थ मानेगा, तो स्वस्थ क्यों नहीं होगा? इसके लिए चार की नहीं अकेले की आवश्यकता है।
मन
मुट्ठी में सारी दुनिया का मतलब अगर आपके पास सोच है तो पेन्सिल से सारी दुनिया का नक्शा बना सकते हैं।
मन
'मुझे वही करना है जो मेरे हित में है' इससे अन्तः स्रावी ग्रन्थियाँ प्रभावित होती हैं, जिससे हमारी शारीरिक शक्ति बढ़ती है व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
मन
पिच्छि के वेंत की तरह मन को ज्ञान के पानी में भिगोकर धीरे-धीरे मोड़ो, वरना टूट जाएगा।
मन
मन प्रायः गलत दिशा की ओर प्रेरित करता है, मौज-मस्ती के लिए, पाप-पाखण्ड के लिए, भोग-विलासिता के लिए, धन-वैभव के लिए, नाम-यश के लिए। एक बार मन की हो जाए तो उसकी माँग बढ़ जाती है, मन की मानोगे तो पाप में फँसोगे और दुर्गति में जाओगे। अतः मन को मनाने की कला सीखें। जो मन की मानता है वह आँसू बहाने को विवश होता है और जो मन को मना लेता है वह मुस्कुराने की कला सीख लेता है। धर्म शिक्षा की लगाम से दुष्ट मन रूपी घोड़े को नियन्त्रित कर सकते हैं।
मन
दूर रहकर भी बीमार व्यक्ति के लिए सकारात्मक प्रार्थना या जाप किये गए, उसे शीघ्र लाभ मिला, जिन्हें नकारात्मक प्रार्थना की गयी, वे ज्यादा बीमार हो गये, वचनों के माध्यम से अपने को व दूसरों के चारित्र को निर्मल बना सकते हैं।
मन
मन घड़ी के उस पैण्डुलम की तरह है, जो सदा दायाँ-बायाँ घूमता रहता है।
मन
मन उस विषेले सर्प के समान है, जो काँचुली तो छोड़ देता है पर विष नहीं छोड़ता है।
मन
मन गधे की उस लीद की तरह है, कि जो ऊपर से चिकनी और अन्दर से खुरदरी होती है।
मन
मन उस मृग की तरह है, जो तृण से आच्छादित खाई को न देखकर तृण खाने दौड़ता है और खाई में गिर जाता है।
मन
मन उस श्वान की तरह है, जो हड्डी को चूसते हुये दाड़ों से रिसते हुये खून के स्वाद में खुश होता है।
मन
मन स्तम्भ से बन्धे हुये उस नटखट बन्दर की तरह है, जो कभी शान्त नहीं बैठता, उछल कूँद करता रहता है।
मन
मन उस चिकनी मछली की तरह है, जो पकड़ में नहीं आती, हाथों से बार-बार फिसल जाती है।
मन
मन उन मेंढकों की तरह है, जिन्हें तराजू पर तौलना सम्भव नहीं है।
मन
मन उस बगुले की तरह है, जो कि तन से धवल और मन से काला होता है।
मन
मन विना लगाम के घोड़े की तरह है, जो सवार को मञ्जिल तक नहीं पहुँचाता, गड्ढे में अवश्य पटक देता है।
मन
मन उस जल की तरह है, जिसका कोई निश्चित रूप गन्ध नहीं होता है।
मन
मन उस दरवाजे की तरह है, जो भीतर की तरफ और बाहर की तरफ भी खुलता है।
मन
मन को वश में करने का उपाय परिग्रह और परिचय से अपने को दूर रखना है।
मन
मन की गति- एक प्रश्न पूँछा कि वायु से भी अधिक चञ्चल क्या है? तब उत्तर में कहा- चञ्चल गिलहरी को पकड़ना, समुद्र की लहरों को गिनना, आकाश की ऊँचाई को मापना, सागर की गहराई को मापना आसान है, किन्तु मनुष्य के मन की गति को मापना आसान नहीं है।
मन
मानव मनु की नहीं मन की सन्तान है, मन बर्फ की तरह न हो पानी की तरह हो, जिससे मन किसी भी पात्र में समा जाये।
मन
मन को मोड़ना- मन को मनाकर दिशा बदल दो, समस्या को समाधान के रूप में देखो, समस्या के पहाड़ को रास्ता बदल कर पार करो, संसार में ऐसा कोई कल्पवृक्ष नहीं जो आपकी इच्छा पूरी कर दे, अतः मन को तोड़ने की अपेक्षा इच्छायें खत्म करें।
मन
सात सौ खरब बोल्ट की पावर आपके पास है, सकारात्मक सोचेंगे तो उस रूप में काम आएगी, नकारात्मक सोचेंगे तो पल भर में सारा खून पानी बन जायेगा।
मन
नकारात्मक विचारों का प्रवेश बन्द करें।
मन
क्या दिन भर आपके चेहरे पर खुशी खेलती रहती है?
मन
क्या आपको अपने से बातें करना आता हैं?
मन
क्या आपको अपनी सुनना आता है?
मन
लवण सागर और क्षीर सागर शास्त्रों में दो सागर कहें हैं, जिसके मन में प्रेम, करूणा, भक्ति का भाव हो वह क्षीर सागर हैं, जिसके मन में काम, क्रोध, मद, मोह, मान, मत्सर हो वह लवण सागर है।
मन
कुत्ते को काँच का महल- कुत्ते को काँच के महल में रात को छोड़ दिया वह अपने ही प्रतिबिम्ब को देखकर रातभर भौंकता रहा कोई दूसरा कुत्ता नहीं था, स्वयं की छाया थी, ये संसारी प्राणी भी पर को नहीं निज को भोग कर स्वयं मर रहा है।
मन
हाथी के कान, पीपल के पत्ते, हवा, पानी ये सदा चञ्चल होते हैं, उसी प्रकार धनादि से मन सदा चञ्चल होता है।
मन
सर्प ने काटा चूहा दिखा- जिसे सर्प ने काटा था सर्प बिल में अन्दर खिसक गया उसी समय चूहा निकला अतः उसने समझा चूहे ने काटा है तो कुछ नहीं हुआ और जिसे चूहे ने काटा था, चूहा बिल में घुस गया उसी समय सर्प निकला, अतः उसने समझा सर्प ने काटा है तो वह डरकर मर गया, एक मिनट में सारी कोशिकाएँ मर गयीं, सकारात्मक सोच से शक्ति बढ़ती है, परोपकार की भावना से आत्मा को सिंह जैसा बल प्राप्त होता है, नकारात्मक सोच से शक्ति घटती है।
मन
बाहर की नहीं मन की सफाई सबसे बड़ी है, अतः मन को साफ करने का नाम शौच धर्म है।
मन
मन आकाङ्क्षाओं में जीता है, तन आवश्यकताओं में जीता है।
मन
जब अपना मन पवित्र होता है, हर चेहरे पर अपना चित्र होता है। फिर दुनिया में कहीं भी चले जाओ, जो भी मिलता है अपना मित्र होता है।।
मन
हम लाख अपने भावों को दबाने का प्रयास करें, पर वे किसी न किसी वातायन से बाहर झांक ही लेते हैं।
मन
हमारी आखों के तेज को हमारे बुरे विचारों की हवा हर लेती हैं।
मन
विषयासक्त मन कर्म बन्ध का कारण है, विषय विरक्त मन मोक्ष के लिए कारण है, अतः मनुष्य का मन ही बन्ध और मोक्ष का कारण है, एक मन नर से नारायण और एक मन नर से नारकी बना देता है, राम–रावण की तरह।
मन
अव्यवस्थित मन किसी व्यवस्था को जन्म नहीं देता है, सङ्कल्प लेने से विकल्प मिट जाता है।
मन
लोग गड़न्त तो छोड़ते है पर मनगड़न्त नहीं छोड़ते हैं।
मन
घर को छोड़ देने पर भी अगर उसका विकल्प नहीं छूटता है तो आत्मा में स्थिरता नहीं आती है।
मन
सर्प पिटारे में रहता है तो देवता नजर आता है, घर में निकल आता है तो काल नजर आता है, मिर्च की धूनी और लाठियों से पीटा जाता हैं, उसी प्रकार मनुष्य का मन संयम के पिटारे में रहता है तो धरती पर पूजा जाता है, संयम के अभाव में रावण व कंस की तरह मारा जाता है।
मन
जिसका मन वश में है सारा जगत उसके वश में होता है और जो मन के वश में होता है वह सारे जगत के वश में होता है।
मन
नाश्ता नहीं किया तो कमजोरी लगी, उपवास किया तब कुछ नहीं हुआ, क्योंकि मन ने उपवास करना स्वीकार कर लिया था।
मन
जैसे चलनी में डाला गया जल सर्व प्रयत्न करने पर भी नष्ट हो जाता है, उसी तरह चञ्चल चित्त से धारण किया गया व्रत-तप नष्ट हो जाता है।
मन
घर में खुलापन रहने से सुविधा अधिक होती है, इसी तरह हृदय में खुलापन रहने से प्रसन्नता अधिक होती है।
मन
सब कुछ खोने से खराब उस उम्मीद को खोना है, जिसके बल पर सब कुछ पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
मन
भाव समवाय- मन की महत्त्वाकाङ्क्षा पर रोक लगाना, कर्म-नोकर्म मिलने पर राग-द्वेष नहीं होना भाव समवाय प्रत्यय है, जब तक भावों में निर्मलता नहीं होगी तब तक द्रव्य, क्षेत्र, काल और भव रूप चार प्रत्यय मिलने पर भी कार्य की सिद्धि नहीं होगी।
मन
भाव- बरसात में मेरे कपड़े गीले न हो जायें, मैं घर पहुँच जाऊँ इसके बाद खूब पानी गिरे, फिर चाहे गरीब का आटा गीला हो जाये। ट्रेन लेट हो जाये जिससे हमें मिल जाये, चाहे उसमें बैठे हजार लोग भूखे तड़फ रहे हों। इसकी कोई चिन्ता नहीं रहती। ट्रेन पर बैठे, सीट मिल गयी तो स्वयं लेट जाते हैं, चाहे दूसरे खड़े हों। हमें माल खरीदना है तो सस्ता हो जाए, और बेचना है तो महँगा हो जाए, चाहे दूसरे को कितना भी नुकसान हो जाए। हमें आवश्यकता है तो पानी बरस जाए अन्यथा नहीं बरसे भले ही दूसरे की खेती सूख जाए, वकील और डॉक्टर कभी ये भावना नहीं भा सकते कि सभी जीव सुखी रहें, अन्यथा उनकी दुकानदारी बन्द हो जाएगी। लोग भगवान् से प्रार्थना भी अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं ये सब भावों के भेद हैं।
मन
भावों का प्रभाव- राजा भटक गया, जङ्गल में बुढ़िया की कुटिया पर गया पानी माँगा, बुढ़िया ने कहा बेटा लू लग जायेगी, बगीचा से एक अनार का लौटा भर रस लाकर राजा को पिलाया, राजा ने सोचा इतना सुन्दर बगीचा मेरे राज्य में आता है या नहीं ? मन्त्री से पता करवाया, अपना है तो 'कर' लगाना है, अगली बार राजा फिर भटक कर, बुढ़िया के यहाँ गया, जूस माँगा, अब बुढ़िया ने पचास अनारों को निचोड़ा फिर आधा लोटा जूस निकला, वह भी बेस्वाद था, राजा ने पूँछा आज क्या हो गया, बुढ़िया ने कहा ! राजा का भाव बिगड़ गया है, भावों का प्रभाव पड़ता है।
मन
कोई तीर्थों को जाता है तो कहते हैं पेटी, थैला, रुपया, बच्चों को सम्भाल कर रखना, लेकिन कोई ये नहीं कहता कि भावों को सम्भालकर रखना क्योंकि भावों का सम्भालना ही महत्त्वपूर्ण है।
मन
साधु को अन्तराय आय तो भावों को सम्भालते हैं, श्रावक को विपत्ति आये तो भावों को बिगाड़ते हैं।
मन
एक मूर्ख कुंए में पैर लटका के बैठा था, लोगों ने उससे पागल कहा, वह बोला यहाँ पर किस ने बताया कि मुझे लोग पागल कहते हैं, चेष्टा देखकर भावों का पता चल जाता है बताने की आवश्यकता नहीं होती है।
मन
सबसे कम भाव सिद्धों में और सबसे ज्यादा भाव संसारी जीवों में पाये जाते हैं।
मन
मन के हारे हार है- जापान का सेनापति तेगूलाङ्ग बड़ा चतुर था, अपनी सेना के मनोबल को कम देखकर उसने कहा कि देवी ने प्रसन्न होकर ये सिक्का दिया है, यदि दो बार उछालने पर चित्त आये तो अपनी जीत होगी सिक्का उछाला दोनो बार चित्त आया क्योंकि उसमें पट्ट था ही नहीं, सेना का हौसला बढ़ गया और कम सेना भी विशाल सेना से जीत गयी।
मन
तन की शक्ति को विकसित करने के लिए मन को ठीक करें, यही मन स्विच बोर्ड है, सारा कनेक्शन यहीं है, सारे सॉफ्टवेयर के तार इसी मन से जुड़े हैं।
मन
मन के पार चेतना के स्तर पर जीने का प्रयास करना चाहिए।
मन
सारी बीमारी व स्वस्थता सोच पर निर्भर है 'थूबोनजी' क्षेत्र में प्रायः सभी सङ्घ बीमार था, एक बहन भी बीमार हो गयी, उनके लिये आचार्य श्री जी से उपाय पूँछा तो उन्होंने कहा ''नहा दो'' (नहा वनस्पति) यही बात उन बहन से कही तो उन्होंने आस्था वश औषधि की जगह नहा लिया (स्नान) और वे ठीक भी हो गयीं। जबकि नहा नामक दवा देने को कहा था।
मन
जैसी सोच वैसा जीवन मुनि को राज्य परिवार का राग हुआ तो रौद्रध्यान हो गया और सोच बदली तो केवलज्ञान हो गया।
मन
चञ्चल मन में विद्या और धर्म नहीं टिकते हैं।
मन
मन की शान्ति ही ज्ञान का फल है।
मन
आज संवेदना खत्म हो गयी है, अखबार में पढ़ते जाते हैं 'बाम्बे में विस्फोट पाँच सौ मौते', चाय की चुस्की लेते जा रहे हैं, लेकिन न प्याला छूटता, न आहार छूटता, न अखबार छूटता है।
मन