स्वास्थ्य, शान्ति एवं दीर्घायु के शिक्षा सूत्र- 1.खाओं कम चबाओ ज्यादा, 2.बोलो कम, विचारो ज्यादा, 3.बैठो कम, चलो ज्यादा, 4.लेना कम, देना ज्यादा, 5.पहनों कम, खुले वदन रहो ज्यादा, 6.उपदेश कम आचरण ज्यादा, 7.आज्ञा कम, सेवा ज्यादा, 8.खेद कम, प्रसन्न ज्यादा, 9.सोओं कम, जागो ज्यादा। स्वास्थ्य 0 – भेजें
टहलना वह व्यायाम है जिसके बाद अन्य व्यायाम की जरूरत नहीं होती है, इससे स्थूलता पर नियन्त्रण, सौन्दर्य प्रसाधन आदि लाखों रोगों में लाभ मिलता है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
मुस्कान के वक्त चेहरे की चौदह मांस पेशियाँ खिंचती है चेहरा उदास हो तब बहत्तर मांस पेशियाँ खिंचाव में आ जाती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
तम्बाकू में चार हजार तत्त्व होते हैं, चौबीस विष होते हैं और ब्यालीस प्रतिशत ऐसे पदार्थ होते हैं, जो कैन्सर उत्पन्न करते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
कैन्सर पीड़ितों में से बीस प्रतिशत वे लोग होते हैं जो स्वयं निकोटीन का सेवन नहीं करते किन्तु धूम्रपान करने वालों के साथ रहने से बीमार होते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
दिल्ली यूनीवर्सिटी में आयोजित कोकाकोला प्रतियोगिता विजेता आठ बोतल पीकर सदा के लिए सो गया। स्वास्थ्य 0 – भेजें
एक स्वस्थ मनुष्य पाँच सैकण्ड में एक श्वास पूर्ण करता है, पन्द्रह सैकण्ड में तीन और साठ सैकण्ड में बारह बार। स्वास्थ्य 0 – भेजें
प्रेम की उद्दीप्त भावना शरीर को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने का सर्वोत्तम साधन है, प्रेम ही आपको स्वास्थ्य व परमानन्द की अनुभूति करायेगा। स्वास्थ्य 0 – भेजें
मुखाग्नि बेटा देता है, लेकिन सिगरेट पीने वाले अपने हाथ से ही अपने मुँह में मुखाग्नि देते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
जैसे वात-पित्त आदि का प्रकोप न हो, रोग की वृद्धि न हो, शरीर रत्नत्रय का सहकारी बना रहे, अपना संहनन बल वीर्य देख, देश काल आहार की योग्यता देख, तप में उत्साह देख परिणामों की उज्ज्वलता बढ़ती जाय वैसा तप करना चाहिए, इच्छा निरोध कर विषयों में रागघटाना तप है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
उपवास तीव्र व जीर्ण रोगों में प्रभाव शाली प्रक्रिया है, ऐसी दशा में जल उपवास प्रशंसनीय है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
उत्तम परिणाम की प्राप्ति हेतु दस जल उपवास रोग मुक्ति हेतु त्रैलोक्य चिन्तामणि है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
इंसान स्वास्थ्य की बली देकर पैसा कमाता है और पैसे की बलि देकर स्वास्थ्य पाने में जीवन गमाता है, पर गया हुआ स्वास्थ्य पुनः प्राप्त नहीं होता है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
अति स्त्री संसर्ग से बचना चाहिए वरना शूल, खाँसी, बुखार, श्वास, रोग, दुबलापन, पाण्डुरोग, क्षय व ऐठन आदि रोग हो जाते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
रोगों का राजा एड्स- जो भौतिकवादी, विलासप्रिय अमेरिका आदि देश ब्रह्मचर्य का मखोल उड़ाते थे, वे अब ब्रह्मचर्य को महत्त्व देने लगे हैं, यह रोग वेश्यागमन से होता है, यह अजीब किस्म का वायरस यानि विषाणु है, यह वायरस इतना छोटा है कि इसका व्यास 100 नेनोमीटर या 0.1 माइक्रो मीटर से नापा गया है, ऐसे सूक्ष्माति सूक्ष्म जीव ने आज लगभग एक सौ तेतीस देशों में एड्स का असाध्य रोग फैला दिया है, इसका शोध 1983 में पेरिस के डॉ. तुक मोटारनीन ने और 1984 में अमेरिका के डॉ. रावर्ट गैली ने किया था। स्वास्थ्य 0 – भेजें
एक बार पूरे खून में एड्स परमाणु फैल जायें, तो कुछ महिनों में मौत अपने पञ्जे में दबोच लेती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
सारी दुनिया में पचास लाख से एक करोड़ लोग इस घातक वायरस के जीते-जागते नमूने हैं, इनमें से पन्द्रह लाख केवल अमेरिका में हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
एक आँख बराबर स्थान में छियानवे रोग हो सकते हैं, पूरे शरीर में पाँच करोड़ अड़सठ लाख निन्यानवे हजार पाँच सौ चौरासी रोग हो सकते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
ऑक्सीजन की यदि वाञ्छित मात्रा में वृद्धि हो जाय, तो मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ जाती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
प्रदूषित मानसिकता, प्रदूषित जलवायु व प्रदूषित आहार से व्यक्ति असमय में वृद्ध हो जाता है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
फसल में गो मूत्र के छिड़काव से जीव मरते नहीं, भाग जाते हैं, फसल अच्छी होती है, फलों पर गोमूत्र का छिड़काव करने से फल औषधि युक्त हो जाते हैं, गोमूत्र में एक सौ आठ औषधियां हैं, गोमूत्र के सेवन से अनेक रोग शान्त होते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
हर्र, बहेरा आँवला, घी शक्कर से खाय। स्वास्थ्य सदैव बना रहे, अतुलित शक्ति प्रदाय।। स्वास्थ्य 0 – भेजें
काली मिर्च जो पीसकर घी शक्कर से खाय। नेत्र दोष वाके मिटे, गिद्ध दृष्टि हो जाय।। (ग्यारह नग काली मिर्च, पाँच ग्राम गाय का घी, दस ग्राम बूरा) स्वास्थ्य 0 – भेजें
मीठा, खट्टा, नमकीन, ''वातनाशक'' रस हैं। मीठा, कषायला, कड़वा, ''पित्तनाशक'' रस है। कड़वा, कषायला, चरपरा ''कफनाशक'' रस है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
प्रतिदिन एक या दो नींबू का रस पानी में मिलाकर अन्त में पीने से खायी हुयी वस्तु सड़ती नहीं है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
कान खींचने से दिमाग खुलता है, पहले लोग बड़े-बड़े कुण्डल पहनते थे कि कान खिंचते रहें। स्वास्थ्य 0 – भेजें
प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाएं- जल चिकित्सा, योग, व्रत, मिट्टी, मालिश, एक्युप्रेशर, सूर्यचिकित्सा, सात्विक भोजन, शान्ति दायक सफ़ेद आदि रङ्गों का प्रयोग करें, आपातकाल में एलोपेथिक का प्रयोग कर सकते हैं। उचित रङ्गों का चुनाव- नीला रङ्ग शीतलता, हरा रङ्ग सन्तुलन, सफ़ेद रङ्ग शुद्धता व आध्यात्मिकता, लाल व पीला रङ्ग सुस्त मन पर प्रेरक प्रभाव, उत्साह व शक्ति भरते हैं, काला रङ्ग घृणा द्वेष को दर्शाता है और मस्तिष्क को सुस्त, मन्द तथा निष्क्रिय बनाता है। हँसिये और हँसाइये- स्वयं प्रसन्न रहें एवं अपने सानिध्य में रहने वालों को प्रसन्न रखें। स्वास्थ्य 0 – भेजें
सूर्योदय से पूर्व का समय ही सर्वाधिक उपयोगी होता है, जब आप प्राणवायु से भरपूर लाभ प्राप्त करते हैं। श्वाँस एवं हृदय रोगों से भी मुक्ति मिलती है। प्राणायाम प्राचीन तकनीक है, इससे ऋषियों ने सैकड़ो वर्षों की उम्र पायी थी और अपने मस्तिष्क को बुद्धिमत्ता का अक्षय कोष बनाया था। प्राणायाम वह उत्तम विधि है, जिससे आप एक पन्थ दो काज नहीं तीन काज वाली उक्ति चरितार्थ करते हैं। एक तो हृदय एवं फैफड़ों का व्यायाम जो हृदय और श्वाँस सम्बन्धी रोगों को व्यक्ति के पास फटकने भी नहीं देता है, दूसरे मस्तिष्क को ऋणायन से भरपूर प्राणवायु रूपी पर्याप्त भोजन मिलता है, तीसरा प्राणायाम से आप अद्भुत शान्ति का अनुभव के साथ मानसिक तनाव से मुक्ति प्राप्त करते हैं। स्वास्थ्य 0 – भेजें
आधा अन्न, दुगनी सब्जी, तिगुना पानी, चार गुनी हँसी से सदा स्वस्थता और प्रसन्नता रहती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
पूर्व में सिर रख कर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है, दक्षिण में सिर रख कर सोने से बल और आयु की प्राप्ति होती है, पश्चिम में सिर रख कर सोने से चिन्ता बढ़ती है, और उत्तर में सिर रख कर सोने से धन और जीवन की हानि होती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें
रोगी पूरब सिर जो सोए, तन मन का सुख चैन संजोए। शयन करो ले बाँयी करवट, उठो सदैव दाँहिनी करवट।। पश्चिम मुख मज्जन कर आना, पूर्व मुखी हो सदा नहाना। पढ़ने उत्तर मुख हो जाना, भोजन दक्षिण मुख न पकाना।। पूर्व मुखी होकर जो खाता, लम्बे जीवन का सुख पाता। दक्षिण मुख होकर जो खाता, भारी नाम बढ़ाई पाता।। श्वेत वस्त्र उत्तर मुख धारो, पूर्वोत्तर मुख जाप सम्हारो। उत्तर दक्षिण मुख निहारा, दिशा बोध यह सीखो सारा।। स्वास्थ्य 0 – भेजें
कार्तिक सुदी अष्टमी से अगहन वदी अष्टमी तक, सोलह दिनों को प्राणघातक माना जाता है, इन दिनों में रोग हो गया तो व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। स्वास्थ्य 0 – भेजें