Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 3 / 7

स्त्री, धूर्त, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्व के अभिमानी, चोर, कृतघ्न और नास्तिक का विश्वास नहीं करना चाहिए।
विवेक
ऋण, अग्नि, शत्रु और द्वेष को कभी बढ़ने नहीं देना चाहिए।
विवेक
धर्म, काम और अर्थ सम्बन्धी कार्यों को करने से पहले न बताएँ, करके ही दिखाएँ, ऐसा करने से अपनी मंत्रणा दूसरों पर प्रकट नहीं होती है।
विवेक
बदमाशी, चालाकी, कूटनीति आदि का ज्ञान तो ठीक है परन्तु उस ज्ञान का उपयोग ढाल की तरह स्वयं की रक्षा के लिए करना चाहिए तलवार की तरह दूसरों के घात के लिए नहीं।
विवेक
व्यक्ति का स्वभाव समझकर अनुकूल व्यवहार करने से किसी को संक्लेश नहीं होता है।
विवेक
अपने दुःखी होने में जो अपना अपराध सोचते हैं? वे व्याकुल नहीं होते और जो पर का अपराध सोचते हैं वे बिना विपदा दुःखी बने रहते हैं।
विवेक
प्रसंग के अनुसार परिधान का चयन आवश्यक है।
विवेक
कोई काम शुरू करने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न करें–मैं ये काम क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या होंगे और क्या मैं सफल होऊँगा? जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोष जनक उत्तर मिल जायें तभी आगे बढ़ें।
विवेक
जो आपकी बात सुनते हुए इधर-उधर देखे उस पर विश्वास न करो।
विवेक
ज्यादा घनिष्ठता दुःखदायी होती है। विवेकी चिंतन करता है और अविवेकी चिंता करता है।
विवेक
जो व्यक्ति अपना हित चाहता है, उससे यदि भूल से भी भूल हो जाय तो वह भूल को भूल से भी भूलता नहीं है।
विवेक
अपने रहस्य गुप्त रखें अन्यथा ये एक दिन बर्बादी के कारण बनते हैं।
विवेक
मंत्र-मंत्रणा-औषधि जितनी गुप्त होगी उतनी प्रभावशाली होती है।
विवेक
आवश्यक समय पर ही शोभता है जैसे मुकुट सिंहासन पर ही शोभता है।
विवेक
मेरे लिए पर के दोष अहितकारी नहीं हैं अपितु पर के गुण हितकारी हैं किन्तु मेरे स्वयं के दोष मेरे लिए अहितकारी हैं।
विवेक
जो पूर्वापर विचार कर निर्णय लेता है सफलता उसके चरण चूमती है।
विवेक
जो अनुभव विहीन होता है, रीति-नीति से शून्य होता है, वह अवसर और साधन मिलने पर भी इष्ट कार्य की सिद्धि नहीं कर पाता है।
विवेक
जीवन में यदि बुरा वक्त नहीं आता है तो अपने में छिपे गैर और गैरों में छिपे हुए अपने नजर नहीं आते हैं।
विवेक
आप इतने मधुर न हों कि लोग आपको निगल लें और इतने कटु भी न हों कि लोग आपको उगल दें।
विवेक
जो व्यक्ति निश्चित को छोड़कर अनिश्चित के पीछे भागता है उसका निश्चित कार्य नष्ट हो जाता है और अनिश्चित कार्य तो नष्ट है ही।
विवेक
जीव दूसरों को सुधारने के चक्कर में स्वयं को बिगाड़ लेता है।
विवेक
इस पर बार-बार चिन्तन करना चाहिए कि कौन-सा समय है? कौन-कौन मित्र है? कौन-सा देश है? आय कितनी और व्यय कितना है? मैं कौन हूँ और मेरी आत्मा में कितनी शक्तियाँ हैं?
विवेक
अतिरूपवती होने से सीता का अपहरण हुआ, अतिगर्वी होने से रावण मारा गया, मधुर पदार्थ भी अधिक खा लेने से अजीर्ण कर देता है अतः अति सर्वत्र त्यागना चाहिए।
विवेक
आयु, धन, घर का भेद, मंत्र, मैथुन, औषधि, अपमान, तपस्या और दान इन नौ को प्रयत्न पूर्वक गुप्त रखना चाहिए।
विवेक
धन के नाश को, मन के संताप को, घर की बुराइयों को, किसी ठग द्वारा ठगे जाने को और नीचों द्वारा अपमान को बुद्धिमान कभी किसी से न कहे।
विवेक
सावधानी बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी पहचान है।
विवेक
किसी आदमी की आकृति से ही घृणा नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे आदमी भी हैं जो भरी गाड़ी में धुरा की कील के समान हैं।
विवेक
जो लोग किसी व्यक्ति की आकृति देखकर ही उसके अभिप्राय को ताड़ जाते हैं, ऐसे लोगों को चाहे जैसे बने वैसे अपना सलाहकार बनाओ।
विवेक
सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्न की, निष्कलंक जवानी बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्त्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं।
विवेक
अपने वश किए शत्रु से दूसरे शत्रु को नष्ट करा दें, पैर में लगे काँटे को हाथ में स्थित काँटे से ही निकालते हैं।
विवेक
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूह को छोड़कर एक व्यक्ति का ग्रहण करने की इच्छा न करें परन्तु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्यों की अपेक्षा गुणों में श्रेष्ठ है और इन दोनों में से एक को ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी स्थिति में कल्याण चाहने वाले पुरुष को उस एक के लिए समूह को त्याग देना चाहिए।
विवेक
किसी महान् कार्य को करने के प्रसंग में शत्रुओं से भी सन्धि कर लेना चाहिए।
विवेक
सर्वनाश के उपस्थित होने पर पण्डित आधे को छोड़ देता है, आधे से कार्य करता है, सर्वनाश असहनीय होता है।
विवेक
ऊँचाई पर पहुँचे हुए मनुष्यों को यत्नपूर्वक आत्मा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि दूर तक चढ़ जाने के बाद नीचे गिरना दुःसह होता है।
विवेक
राग, लोभ, भय, द्वेष और एकान्त वादियों की बातें सुनना निर्णायक को इन पाँच दोषों से बचना चाहिए।
विवेक
गुण-दोष का विचार किए बिना किसी को ग्रहण करना या त्यागना मानो अपना नाश करने के लिए सर्प के मुख में हाथ डालना है।
विवेक
जिसकी लाखों मूर्ख प्रशंसा करें और दूसरी ओर एक सदाचारी धर्मात्मा का ज्ञान उसके आचार को दूषित समझें तो तत्त्वज्ञानी धर्मात्मा की सम्मति ही ठीक है।
विवेक
समय-समय पर अवसरानुकूल कभी कोमल-कभी तीक्ष्ण स्वभाव वाला बन जाना चाहिए। अचल निष्ठा ही महान् कार्य की जननी है।
विवेक
संदिग्ध कार्यों में प्रवृत्त होना बुद्धिमानी का काम नहीं है।
विवेक
बुद्धिमान पुरुष को अल्प सुख एवं अधिक क्लेश वाला कार्य न ही करना चाहिए, बुद्धिमानी इसी में है कि थोड़ा व्यय करके बहुत की रक्षा करें।
विवेक
बुद्धिमान को चाहिए कि वह अपना काम बनाने के लिए शत्रुओं को भी कन्धे पर बिठाकर ढोये।
विवेक
भय से डरने वाले विवेकहीन हुआ करते हैं।
विवेक
मंत्रणा छह कान में पड़ते ही रहस्य खुल जाता है तथा चार कान में स्थिर रहता है इसलिए सभी प्रयत्नों से बुद्धिमान मंत्रणा में छह कान न होने दें।
विवेक
अधर्म में धर्म बुद्धि, धर्म में अधर्म बुद्धि रखने वाला मूर्ख होता है।
विवेक
अकेले स्वादिष्ट भोजन न करें, अकेले किसी विषय का निश्चय न करें, अकेले रास्ता न चलें और बहुत से लोग सोये हों तो अकेले जागते न रहें।
विवेक
अपना अवसर पहचानो, योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को पहचानो।
विवेक
नीतिज्ञ व्यक्ति अशुभ का समय मुहूर्त भर भी टालना बहुत मानते हैं।
विवेक
आधुनिकता के विषय में बिना घृणा के बोलना और प्राचीनता के विषय में बिना अन्ध श्रद्धा के बोलना चाहिए।
विवेक
जिस आपदा में अच्छी क्रिया से किसी प्रकार आत्मा की रक्षा न हो सके उसमें निषिद्ध कर्म भी करना चाहिए क्योंकि जब सड़क पर वर्षा से कीचड़ हो जाती है तब पंडित लोग भी कभी-कभी कुमार्ग से जाते हैं, उनका कुमार्ग में जाने का लक्ष्य नहीं होता बल्कि सड़क के कीचड़ से बचने का लक्ष्य होता है।
विवेक
सर्वत्र उदारता से काम नहीं करना चाहिए।
विवेक
जो काम उपाय से हो सकता है, वह पराक्रम से नहीं हो पाता है।
विवेक
कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जिसमें दोष ही दोष या गुण ही गुण होते हों।
विवेक
धर्म, अर्थ, काम सम्बन्धी कार्यों को करने से पहले न बतायें, करके ही दिखायें, ऐसा करने से अपनी मंत्रणा दूसरों पर प्रकट नहीं होती।
विवेक
जिस क्षण हमें अपनी भूल मालूम हो, उसी क्षण हमारा पुनर्जन्म हुआ मानो।
विवेक
जो व्यक्ति अपना रहस्य अपने सेवक को बताता है वह सेवक को अपना स्वामी बना लेता है।
विवेक
काँटों पर चलने वाले नंगे पाँव नहीं चला करते हैं।
विवेक
विवेकशील पुरुष दूसरों की गलतियों से अपनी गलती सुधारते हैं।
विवेक
तुम जिन बातों के रसिक हो, उनका पता यदि तुम शत्रुओं को न चलने दोगे; तो तुम्हारे शत्रुओं की योजनायें निष्फल सिद्ध होंगी।
विवेक
यदि समुचित रणभूमि को चुन लें और सावधानी के साथ युद्ध करें, तो दुर्बल भी अपनी रक्षा करके शक्तिशाली शत्रु को जीत सकते हैं।
विवेक
लोग एक हाथी को दूसरे हाथी का माध्यम बनाकर पकड़ते हैं, ठीक इसी प्रकार एक काम को दूसरे काम का साधन बना लेना चाहिए।
विवेक
दुर्बलों को सदा संकट की स्थिति में नहीं रहना चाहिए, बल्कि जब अवसर मिले, तब उन्हें बलवान् के साथ संधि कर लेना चाहिए।
विवेक
यदि तुमको बिना किसी सहायक के अकेले दो शत्रुओं से लड़ने का अवसर आए तो उनमें से किसी एक को अपनी ओर मिला लेने की चेष्टा करो।
विवेक
अपनी कठिनाइयों का हाल उन लोगों में प्रकट न करो, जो अभी तक उनसे अनजान हैं और अपनी दुर्बलताएँ बैरियों को ज्ञात न होने दो।
विवेक
यह मत सोचो की लोग क्या कहेंगे? क्योंकि उनको जो कहना है वे तो कहेंगे ही। एक बार चंदू दादा जी अपने पप्पू को घोड़े पर बिठाकर जा रहे थे, तो कुछ लोगों ने देखकर कहा–बेटा आपको शर्म नहीं आती दादाजी पैदल चल रहे और आप घोड़े पर बैठे हो। तो पप्पू घोड़े से उतरकर चलने लगा और दादाजी को घोड़े पर बिठा दिया, आगे कुछ लोगों ने कहा–अरे दादाजी जरा विचार करो छोटा-सा बच्चा पैदल चल रहा और आप घोड़े पर बैठे हो तो अब वे दोनों घोड़े पर बैठकर आगे बढ़े परन्तु पुनः किसी ने कहा–क्या आपके पास दया नाम की कोई चीज नहीं है, जो एक घोड़े पर दोनों बैठे हो, अतः अब वे दोनों पैदल घोड़े को लेकर चलने लगे लेकिन एक व्यक्ति ने कहा–दुनिया में बहुत मूर्ख देखे हैं पर आप जैसे नहीं, जो घोड़े को साथ लिए हो और फिर भी पैदल चल रहे हो।
विवेक
प्रत्येक कि निंदा सुनो किन्तु अपना फैसला गुप्त रखो।
विवेक
काम करने से पूर्व सोचना बुद्धिमत्ता है, काम करते समय सोचना सतर्कता है, काम कर चुकने के बाद सोचना मूर्खता है।
विवेक
बुद्धिमान को ऋण, घाव, अग्नि और शत्रु की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये समय पाकर असाध्य हो जाते हैं।
विवेक
कान से जल्दी आँख ग्रहण करती है और कान की बात तो भूल सकते हैं परन्तु आँखों की देखी बात भूलते नहीं है इसलिए अच्छे निमित्तों का देखना और बुरे निमित्तों को नहीं देखना महत्वपूर्ण है।
विवेक
जो देता है वह छीन भी सकता है इसलिए प्रतिपल सावधान रहें।
विवेक
इतना ऊँचा उड़ने की कोशिश मत करो कि अंत में थककर पाताल में गिरना पड़े, उतना ही उड़ो, जितनी तुम्हारे अंदर शक्ति है।
विवेक
व्यस्त होना ही पर्याप्त नहीं है सवाल यह है कि हम किस चीज में व्यस्त हैं।
विवेक
प्रत्येक कर्म करने से पहले यह अवश्य देखना चाहिए कि हमारा कर्म व्यर्थ तो नहीं, जिसमें समय नष्ट हो रहा हो।
विवेक
जो हर परिस्थिति में ढलना जानता है उसे ही जीने की कला आती है।
विवेक
जीवन में घटने वाली दुर्घटनाओं को हमेशा याद करते रहना चाहिए जिससे नई दुर्घटनाएँ न होने पाएँ।
विवेक
प्रत्येक व्यक्ति के अभिप्राय को सुनो परन्तु सुनकर एकदम से बहक न जाओ उस पर विचार करो, जिससे आत्मा सहमत हो वही करो, बातें सुनने में जितनी कर्णप्रिय होती हैं; उनके अंदर उतना रहस्य नहीं होता, रहस्य वस्तु की प्राप्ति में है, दर्शन में नहीं, मिश्री का स्वाद चखने से आता है, देखने से नहीं।
विवेक