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जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 3 / 7

सत्संग व निरन्तर ज्ञानोपयोग के बिना कल्याण पथ पर अविचल चलना अत्यन्त दुष्कर है।
संगति
संघर्ष की भावना को प्रश्रय न देकर मनुष्य के उदान्त गुणों को जगाना ही समाज के कल्याण का मार्ग है।
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हँसी बाँट लेने से अनन्त हो जाती है। दुःख बँटता है तो हल्का हो जाता है और सुख बँटता है तो कई गुना हो जाता है।
संगति
भ्रातृत्व, मानवता तथा आध्यात्मिकता को स्थान दो, अद्वैत भावना की मलिन दृष्टि को त्याग दो, तुम भी रहो, मैं भी रहूँ इस प्रकार की भावना हो।
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सज्जन लोग ही सत्पुरुषों के गुण समूह को विख्यात करते हैं।
संगति
शिक्षाएँ उनकी ग्रहण करें जो विद्वान् हों, श्रेष्ठ कर्म करते हों, खोटे स्वभाव के व्यक्तियों को सदैव दूर ही रखना चाहिए इसी में मनुष्य का कल्याण निहित है।
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किसी भी दिल में आग नहीं बाग लगाओ जिससे उसकी खुशबू आपको भी मिल सके।
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माना कि आपके पास वो आँखें नहीं है, जो आकाश में बैठे भगवान् को पहचान सकें, पर आपके पास वो आँखें तो हैं, जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान सकें क्योंकि जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान लेता है वो भगवान् को पहचान लेता है और फिर आज का इंसान ही भविष्य का भगवान् होता है।
संगति
दो प्रकार के इंसान होते हैं, एक वह जो साधु की दृष्टि से गिर जाते हैं, दूसरे वह जो साधु की दृष्टि में छा जाते हैं।
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हमें तख्त पर ही नहीं वक्त पर भी एक होना चाहिए।
संगति
वह निन्द्य बन्धु है जो आपत्तिकाल में अपने भाई की सहायता नहीं करता है।
संगति
यदि किसी के बीच में खुशबू बनकर नहीं महक सकते तो काँटे भी मत बनो।
संगति
सहयोग के बिना समाज की शृंखला टूट जाती है।
संगति
सहयोग से कठिन से कठिन कार्य आसानी से सम्पन्न हो जाता है।
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सहयोगी व्यक्ति का कभी कोई शत्रु नहीं बनता है।
संगति
सहयोग मित्रता की ओर बढ़ाया हाथ है जो हमेशा साथ देता है।
संगति
सहमति से ज्यादा सहयोग से एक–दूसरे के दिल में आत्मीयता का संचार होता है।
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सहयोग का परस्पर आदान व प्रदान प्रगति के लिए दोनों अपेक्षित होते हैं, जो औरों की प्रगति में सहयोगी बनना जानता है, वह औरों को भी अपनी प्रगति में सहयोगी बनाना जानता है।
संगति
मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करने वाली या अनिष्ट करने वाली, जो भी बात हो बता दें।
संगति
कठिनाइयों वाले लक्ष्य को सहायकों वाला व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है।
संगति
अपने कल्याण के साधन के इच्छुक सुयोग्य व्यक्ति भी सहायक के बिना उसे सिद्ध करने में कुशल नहीं हो पाते हैं।
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संतों के द्वारा दिया गया संताप भी भला होता है और दुष्टों के द्वारा दिया गया सम्मान भी बुरा होता है। सूर्य तपता है तो जल की वर्षा भी करता है परन्तु दुष्टों के द्वारा दिया गया भक्ष्य भी मछली के प्राण ले लेता है।
संगति
न तो कोई इतना धनाढ्य है कि उसे दूसरे की सहायता की आवश्यकता न हो और न ही कोई इतना दरिद्र है कि किसी भी रूप में अपने साथियों के लिए उपयोगी सिद्ध न हो सके।
संगति
गुण का जानकार ही गुणी मनुष्य से प्रेम करता है, गुणरहित मनुष्य को गुणी मनुष्य में सन्तोष नहीं होता हैं। भ्रमर वन से कमल के पास आता है, परन्तु मेंढक एक तालाब में निवास करने पर भी कमल के पास नहीं जाता है।
संगति
पात्र और कुपात्र में बहुत अन्तर है गाय सूखी घास खाकर भी दूध देती है और साँप मीठा दूध पीकर भी जहर उगलता है।
संगति
यह समाज शब्द का अर्थ है। जिसमें लोग मिलकर, एक साथ एक गति से, एक से चलें वही समाज है।
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वास्तविक एकता उन्हीं लोगों की हो सकती है जो कि समान आचार-विचार वाले, समान परम्परा वाले, समान संस्कृति वाले और समान ध्येय युक्त होते हैं।
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संगठन शक्ति है और उसका रहस्य आज्ञा पालन है।
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संसार रूपी कटु वृक्ष के ये दो फल अमृत के समान हैं–एक तो सुभाषित का रसास्वादन और दूसरा सज्जनों का समागम।
संगति
दुष्ट व्यक्ति का साथ किसी भी हालत में अच्छा नहीं होता है, दुष्ट व्यक्ति और साँप इन दोनों में साँप फिर भी अच्छा है क्योंकि साँप तो काल वश सिर्फ एक बार ही काटता है पर दुष्ट तो पग-पग पर हानि पहुँचाता है।
संगति
विद्या से अलंकृत होने पर भी दुष्ट त्याज्य है, जैसे मणि से भूषित भयंकर सर्प।
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मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों से प्यार करने में जो मुझे पसंद करते हैं।
संगति
संत और सूर्य अंधकार मिटाते रोशनी फैलाते, पानी हवा फूल की तरह होते हैं।
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नजदीकी भावनात्मक अशान्ति पैदा करती है और अनादर को जन्म देती है।
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कितने ही सवाल हल हो जाएँ गर मैं और तुम 'हम' हो जाएँ।
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मोतियों को बिखर जाने की आदत होती है, धागे की जिद पिरोये रखने की होती है।
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मैं जिन्दगी में हर किसी को अहमियत देता हूँ क्योंकि जो अच्छे होंगे वो साथ देंगे और जो बुरे होंगे वो सबक देंगे।
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लोगों के लिए आप तब तक अच्छे हो जब तक आप उनकी उम्मीदों को पूरा करते हो और आपके लिए लोग तब-तक अच्छे हैं जब तक आप उनसे कोई उम्मीद न रखें।
संगति
रिश्ते खून के नहीं एहसास के होते हैं, अगर अहसास हो तो अजनबी भी अपने और अगर अहसास न हो तो अपने भी अजनबी होते हैं।
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विषय वासना, बुरे विचार शत्रु हैं तथा दया, दान, दीक्षा, धर्म कार्य का निषेध करने वाले लोग शत्रु हैं।
संगति
जब एक के विरोध से भी मनुष्य विपत्ति को प्राप्त होता है तो बहुतों के साथ विरोध होने पर क्या कहना? देखो चींटियाँ बड़े बलशाली सर्प को खा जाती हैं। निर्बल लोगों का समुदाय भी शक्ति शाली होता है, जैसे सार हीन तृणों से बनाई गयी रस्सी से हाथी भी बाँधा जाता है।
संगति
दुर्जनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि अग्नि मलयगिरि चन्दन को भी जलाती है।
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ये अत्यन्त स्नेही है, ऐसा समझकर क्षुद्र मनुष्यों में विश्वास मत करो क्योंकि सरसों का स्नेह तेल भी आँसू गिरा देता है।
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संसार रूपी कटु वृक्ष के केवल दो फल ही अमृत के समान हैं, पहला सुभाषितों का रसास्वाद और दूसरा अच्छे लोगों की संगति।
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इंसान जीवन में दो चेहरे कभी नहीं भूलता—१. जो कष्ट के समय साथ दे, २. जो कष्ट के समय पर साथ छोड़ दे।
संगति
तीन को कभी नहीं भूलना—१. मुसीबत में मदद करने वाले को २. मुसीबत में साथ छोड़ने वाले को, ३. मुसीबत में डालने वाले को।
संगति
एक बनो, नेक बनो, जुड़ गये तो शेर भी घबरायेगा, टूट गये तो गीदड़ भी डरायेगा।
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पानी का रस शीतलता है, भोजन का रस आदर पूर्वक भोजन कराने में है, बन्धु का रस अनुकूलता है और मित्र का रस निश्छल प्रवृत्ति करना है।
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स्वार्थ, निद्रा और बुरी संगत से बचो।
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कुमार्गगामी गुरु का त्याग करना चाहिए।
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सौ वर्ष जीने के लिए अपने चारों ओर जवान और हँसमुख मित्र रखो।
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एक सम्राट् की संगति से एक संत की संगति अच्छी है पता नहीं सम्राट् कब रुला दे और संत कब हँसना सिखा कर मुक्ति दिला दे।
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झूठे की संगति करोगे तो ठगे जाओगे, मूर्ख हित का इच्छुक होने पर भी अहितकर ही होगा, कृपण अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को अवश्य हानि पहुँचाएगा, नीच आपत्ति के समय दूसरे का नाश करेगा अतः कुसंगति छोड़कर सुसंगति करना चाहिए।
संगति
गंगा पाप को, चन्द्रमा संताप को और कल्पवृक्ष दीनता को नष्ट करता है परन्तु साधु समागम पाप, संताप और दीनता तीनों को नष्ट करता है।
संगति
यदि सत्समागम न मिले तब एकान्त में रहना ही श्रेष्ठ है, परन्तु असभ्य पुरुषों का समागम ठीक नहीं है।
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वयोवृद्ध, संयम वृद्ध, ज्ञान वृद्ध का समागम गुण विकास का कारण है।
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रावण राम से उम्र में, बुद्धि में, बल में, कुटुम्ब में, राज्य में, सेना में, बड़ा था फिर भी हार गया क्योंकि राम का भाई राम के साथ था और रावण का भाई रावण के खिलाफ था।
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समय, सत्ता, सम्पत्ति और शरीर सदा साथ नहीं देते, परन्तु स्वभाव, समझदारी, सत्संग और सच्चे सम्बन्ध सदा साथ देते हैं।
संगति
चार जगह अवश्य जायें–धर्मसभा, राजसभा, स्वजनों के बीच और तत्त्वचर्चा में।
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चार चीजें मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलती हैं–प्रभु नाम की लगन, संतों की संगति, चरित्र की निर्मलता और उदारता।
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सत्य, संतोष, सौजन्य, समता, साधु संगति सद्गति कराते हैं।
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काँच भी कंचन का संग पा जाने से मरकत मणि की शोभा प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार सज्जनों का साथ करने से मूर्ख भी विद्वान् बन जाता है।
संगति
वार्तालाप से, शरीर के स्पर्श से, संसर्ग से, साथ भोजन करने से, आसन से, शयन से और यान से मनुष्यों के पाप संक्रमित होते हैं अतः कुसंगति से बचें।
संगति
जब मैं अल्पज्ञ था तो हाथी के समान मदांध था। तब मेरा मन अपने को सर्वज्ञ समझकर दंभ से भर गया, लेकिन जब मुझे पंडितों के संपर्क से कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि मैं मूर्ख हूँ और मेरा दंभ, ज्वर की तरह उतर गया।
संगति
सज्जनों के सम्पर्क से आधी अविद्या नष्ट हो जाती है, उस का चतुर्थांश शास्त्र के विचार से नष्ट हो जाता है और शेष चतुर्थांश अपने यत्न से नष्ट होता है।
संगति
गंगा के जल का प्रवाह भी समुद्र को प्राप्त कर खारा हो जाता है, इसलिए विद्वान् को अशुभ मन वाले व्यक्तियों का साथ नहीं करना चाहिए।
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दुष्ट की संगति कीर्ति नष्ट कर देती है, क्लेश उत्पन्न करती है, अशुभ गति प्रदान करती है, मनुष्यों में उद्वेग और खिन्नता उत्पन्न करती है, उपहास का पात्र बनाती है, बुद्धि को भ्रम में डाल देती है, प्रतिष्ठा का नाश कर देती है, प्राण शक्ति क्षीण कर देती है, इस प्रकार कुसंगति सकल मंगलों को नष्ट कर देती है।
संगति
अगर तुम जानना चाहते हो कि नरक क्या है तो जान लो कि अज्ञानी की संगति ही नरक है।
संगति
जो व्यक्ति उच्च विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी भी एकाकी नहीं हो सकते हैं।
संगति
मन की पवित्रता और कर्मों की पवित्रता, आदमी की संगति की पवित्रता पर निर्भर है।
संगति
पवित्र हृदय वालों की संगति उत्तम होगी और जिनकी संगति अच्छी है, वे हर प्रकार से फलते फूलते हैं।
संगति
संसार में चन्दन शीतल होता है, चन्दन से ज्यादा शीतल चन्द्रमा है, चन्दन और चन्द्रमा से शीतल साधु-सज्जनों की संगति है, चन्दन व चन्द्रमा तो बाहरी त्वचा को शीतल कर सकते हैं परन्तु सन्तों की संगति मन और आत्मा को शान्ति प्रदान करती है।
संगति
आलसी के साथ रहने वाला मानव भी बर्बाद हो जाता है।
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जेल होने के तीन कारण–भूख, मजबूरी व संगति।
संगति
जैसे ही लगे कि आप जहाँ हैं वहाँ का वातावरण उत्तेजित या दूषित हो रहा है आप वहाँ से हट जाइये।
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