Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 377

समवशरण में छत्तीस द्वार। चार अभाव।

24 सूत्र

पुद्गल द्रव्य की कोई अपूर्व शक्ति है, जिसने जीव के केवलज्ञान स्वभाव का नाश कर दिया है।
कर्म
आत्माधीनता, विषयविरक्ति, तत्त्व तल्लीनता, गुप्ति, स्वहित में लीनता, पूर्ण आत्मानन्द, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, समता, आजीवन नियम, तप व ध्यान करना 'केवलज्ञान प्राप्ति के कारण' हैं।
ध्यान
गाय मोह से बँधी है रस्सी से नहीं, इसीलिये जङ्गल में बहुत दूर जाकर भी वापस आ जाती है।
अनासक्ति
जब तक तिली में तैल रहता है, तब तक पेली जाती है, गन्ने में जब तक रस रहता है, तब तक पेला जाता है, उसी तरह प्राणी में जब तक स्नेह रहता है तब तक संसार में भटकता है।
अनासक्ति
मुनीम, धाय या तोता की वृत्ति होना चाहिए, ये हमेशा विरक्त रहते हैं।
अनासक्ति
हे आत्मन्! हमेशा ऐसी भावना हो कि मैं आत्म गुणों की दीवाली मनाना चाहता हूँ, और कर्मों की होली जलाना चाहता हूँ, अर्थात् गुणों को ग्रहण करने की और दोषों को छोड़ने की भावना होना चाहिए।
पुरुषार्थ
पुरूषार्थ दस प्रतिशत भी नहीं करते हैं और फल सौ प्रतिशत का मोक्ष चाहते हैं।
पुरुषार्थ
पुण्य-पाप को धूप-छांव की तरह मानकर मध्यस्थ रहना चाहिये।
कर्म
आठ प्रकार की मुक्ति- 1.मिथ्यात्व, 2.अंसयम, 3.प्रमाद, 4.स्थूल कषाय, 5.सूक्ष्मकषाय, 6.अज्ञान, 7.योग, 8.शरीर।
धर्म
दान-पूजा श्रावक के लिए मुख्य हैं, ध्यान-अध्ययन साधु के लिए मुख्य हैं, दान से सारभूत चक्रवर्ती के भोग प्राप्त होते हैं, पूजा से देवों द्वारा पूज्य तीर्थंकर पद की प्राप्ति होती है।
दान
समवसरण में छत्तीस द्वार होते हैं उसमें एक-एक द्वार पर नौ-नौ निधियाँ होती हैं कुल तीन सौ चौबीस निधियाँ होती हैं।
विविध
बँधे हुये बछड़े को छूटने का सुख, बच्चों को विद्यालय से छुट्टी का सुख, कैदी को जैल से मुक्ति का सुख और सिद्धों को शरीर से छूटने का सुख प्राप्त होता है।
अनासक्ति
गीले कपड़ों को फ़ैलाने से जल्दी सूखता है उसी प्रकार समुद्घात से कर्मों की निर्जरा शीघ्र होती है।
कर्म
त्रेपन भावों में से मोक्ष में तेतालीस भावों का अभाव एवं दस भावों का सद्भाव रहता है।
धर्म
तीनों कालों के समस्त संसारी जीवों के सुखों से अनन्तगुणा सुख सिद्धों को एक समय में होता है।
धर्म
सिद्ध परमात्मा द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म मल से बाहर हैं, इस अपेक्षा से बहिरात्मा हैं और संसारी जीव अन्तरात्मा है।
धर्म
छः महीने आठ समय में छः सौ आठ जीव मोक्ष जाते हैं, अतः सुखियों की वृद्धि हो रही है एवं दुखियों की हानि हो रही है।
धर्म
पवनञ्जय के पास रावण का पत्र आया, वरूण से युद्ध हो रहा है, पवनञ्जय ने हनुमान से कहा, बेटा तुम राज्य सम्भालो, मैं युद्ध को जा रहा हूँ, हनुमान ने कहा पिता जी, आप घर पर रहो मैं युद्ध को जाऊँगा, पिता ने कहा बेटा, तुमने कभी युद्ध देखा नहीं, तुम मत जाओ, तब हनुमान ने कहा! पिताजी क्या कोई पहले मोक्ष को देखकर आता है बाद में मोक्ष जाता है?
पुरुषार्थ
जहाँ तक पटरी है वहीं तक ट्रेन जाती है, जहाँ तक पानी है वहीं तक मछली जाती है, इसी तरह जहाँ तक 'धर्मास्तिकाय' है वहीं तक सिद्ध परमात्मा जाते हैं।
धर्म
जिस प्रकार बर्तन में पटका पड़ने पर अन्दर से चोट लगाना पड़ती हैं, इसी तरह आत्मविशुद्धि के लिए अन्दर चोट लगाना पड़ती है।
संयम
अन्य दर्शनकार आत्मा को वट के बीज बराबर मानते हैं, जैन दर्शन मानता है कि जितना शरीर होता है उतनी आत्मा होती है, चाहे चींटी का शरीर हो या हाथी का।
ज्ञान
तेरहवें गुणस्थान वाले जीव उत्कृष्ट आराधना के स्वामी हैं, ये उसी भव से मोक्ष जाते हैं, मध्यम आराधना वाले सात-आठ भव में मोक्ष जाते हैं, परिषहों से डरने वाले, सङ्क्लेश परिणाम वाले सम्यग्दृष्टि जघन्य आराधना वाले संख्यात-असंख्यात भव में मोक्ष जाते हैं।
पुरुषार्थ
पुष्पडाल मुनि ने दीक्षा लेकर बारह वर्ष तक साधना की, लेकिन स्त्री का मोह नहीं छूटा, किन्तु वे ही बाद में घोर तप कर जम्बूस्वामी बने, महावैरागी बने और केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष चले गए।
अनासक्ति
वृषभसेन महाराज आठ वर्ष की उम्र में मुनि बन गये, किसी बैरी ने शिला को ऊष्ण कर दिया, महाराज ने नियम लिया था कि इसी शिला पर बैठेंगे, आहार के बाद आये शिला पर पैर रखते ही जलने लगे, ध्यान में लीन हो गये और केवलज्ञान प्राप्त हो गया था।
ध्यान