Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 326

ब्रह्मचर्य की पाँच भावनायें। यह राग आग दहे सदा।

22 सूत्र

ब्रह्मचर्य व्रत की पाँच भावनायें- 1.स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथा सुनना, 2.स्त्रियों के अङ्गोपाङ्ग देखना, 3.पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण करना, 4.काम की उदीरणा करने वाले रसों का सेवन करना, 5.दूसरों को आकर्षित करने के लिए अपने शरीर को सजाना इन पाँचों का त्याग करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
युवा पीड़ी यदि ब्रह्मचर्य के स्वरूप को समझ लेगी तो जीवन में संयम और चेहरे पर तेज आ जायेगा।
ब्रह्मचर्य
राम के भाई भरत पूर्व भव में अचल चक्रवर्ती के पुत्र थे, अभिराम नाम था, तीन हजार रानियों के बीच रहकर चौसठ हजार वर्ष तक असिधारा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया था।
ब्रह्मचर्य
यह राग आग दहे सदा- शक्कर के पहाड़ की चींटी ने नमक के पहाड़ की चींटी का निमन्त्रण किया, मुँह में नमक की डली दबाकर शक्कर के पहाड़ पर आई, इसलिए उसे शक्कर का आनन्द नहीं आ रहा था, इसी तरह वैराग्य में राग रूपी नमक हो तो वैराग्य का आनन्द नहीं आता है, ये विषय सम्बन्धी रागादि काले नाग की तरह हैं, जैसे कमरे में सर्प हो तो नींद नहीं आती है, उसी तरह राग की आग दहे तो नींद नहीं आती है।
अनासक्ति
बाघ, सर्प, पिशाच आदि के साथ रहना श्रेष्ठ है पर स्त्रियों के साथ रहना श्रेष्ठ नहीं है।
ब्रह्मचर्य
निर्दयता, अनार्यता, मूर्खता, अतिचञ्चलता, वाचालता और कुशीलता इतने दोष प्राय स्त्रियों में स्वभाविक होते हैं।
ब्रह्मचर्य
तिलोयपण्णत्ति- सौधर्मेन्द्र विक्रिया से इक्यावन करोड़, बाईस लाख, अठ्ठासी हजार, तेरह देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करता है, लोकपाल साढ़े तीन करोड़, प्रतीन्द्र, सामानिक, तथा त्रायस्त्रिंश, देव भी इन्हीं के समान देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करते हैं, ये सभी देव देवाङ्गनाओं के साथ मनुष्यों के समान प्रवीचार करते हैं, फिर भी वासना शान्त नहीं होती है।
ब्रह्मचर्य
सुखद विवाह का रहस्य सही व्यक्ति पाने में नहीं, बल्कि खुद सही बन जाने में है।
चरित्र
हे मूढ़ ! यदि तूने नर जन्म पाया है, तो ऐसा काम कर जिससे काम-वासना हमेशा के लिए नष्ट हो जाय।
ब्रह्मचर्य
पेट और पाप से दुनिया परेशान है, हर वस्तु पर 'कर' है, पर पेट और पाप पर कोई 'कर' नहीं है, यदि 'कर' लगने लगे, तो स्वास्थ और अर्थ व्यवस्था स्वयं सुधर जायेगी।
संतोष
शील की रक्षा हेतु प्राणों की आहूति करना पड़े तो भी कोई हानि नहीं है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री का राग हटा, कि परिग्रह स्वयमेव घट जाता है।
अनासक्ति
हे भव्य ! स्त्री सुख में रागी मन रूपी मदोन्मत्त हाथी को वैराग्य भावना से रोककर रखो।
ब्रह्मचर्य
उसी पत्थर से चक्की बनती है, तो पेट भरता है, मूर्ति बनती है तो पूजा होती है और यदि संस्कारित न हो तो उसी पत्थर से सिर भी फूटता है, उसी प्रकार यदि आत्मा ब्रह्मचर्य से संस्कारित हो, तो पूज्य होती है, अन्यथा दुर्गति में भटकती है।
ब्रह्मचर्य
शरीर के चिकित्सक बहुत हैं पर आत्मा की चिकित्सा करने वाले दुर्लभ हैं।
ज्ञान
कुत्ता हड्डी को चबाता है और सोचता है हड्डी से खून आ रहा है, उसी प्रकार अज्ञानी प्राणी समझता है, कि भोगों से आनन्द आ रहा है, पर आनन्द तो आत्मा का स्वभाव है जड़ का नहीं।
विवेक
यदि मनुष्य दो साल पर्यन्त सादा भोजन और अल्प आहार करे तो उसकी कुबुद्धि नष्ट होकर एक विशेष प्रकार का तेज प्रकट होने लगेगा।
आहार
कुत्सित साहित्य, फ़िल्मी संसार और भड़कीले तथा अमर्यादित फैशन परिधान से बचना ब्रह्मचर्य के लिए अत्यावश्यक है।
ब्रह्मचर्य
विवाह केवल मनुष्यगति में असीमित इच्छाओं को एक पर केन्द्रित करने के लिए होता है।
ब्रह्मचर्य
अनावश्यक खान-पान से बचना एवं समय पर मल-मूत्र का विसर्जन करना ब्रह्मचर्य की बहुत बढ़ी शर्त है।
ब्रह्मचर्य
सद् गृहस्थ भूख को दूर करने के लिए भोजन और रोग को दूर करने के लिए दवा के समान विषय सेवन करते हैं।
ब्रह्मचर्य
पृथ्वी पर कुछ लोग हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण करने में समर्थ हैं, कुछ सिंह का वध करने में भी समर्थ हैं, किन्तु मैं बलवानों के सामने कहता हूँ कि काम के मद का मर्दन करने वाले मनुष्य बिरले ही हैं।
ब्रह्मचर्य