Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 242

उत्तम संयमधर्म- संयम धारण भव दुःख वारण।

17 सूत्र

व्रतों का धारण करना, समितियों का पालन करना, कषायों का निग्रह करना, मन–वचन–काय की कुचेष्टा का त्याग और इन्द्रियों का जीतना संयम कहलाता है।
संयम
जिससे यह आत्मा क्षणभर में अनन्त सुख से सहित हो जाती है, उस पवित्र चारित्र को बार–बार नमस्कार हो, चारित्र से बढ़कर उत्तम सुख को उत्पन्न करने वाला दूसरा नहीं है, ''निर्दोष क्रिया चारित्र का मूल है'', मैं निरन्तर अपना चित्त चारित्र में लगाता हूँ, हे चारित्र! तुम पूर्णता को प्राप्त होओ।
चरित्र
वस्तु का स्वभाव धर्म है, क्षमादि भाव धर्म है, चारित्र धर्म है और जीवों की रक्षा करना धर्म है।
धर्म
पञ्चेन्द्रिय को प्राणी, साधारण वनस्पति को सत्त्व, पृथ्वी–जल–अग्नि–वायु को भूत एवं विकलेन्द्रियों को जीव कहते हैं।
अहिंसा
जिस प्रकार पाषाण में सोना, दूध में घी, तिल में तैल है उसी प्रकार शरीर में आत्मा है।
ज्ञान
पाँच इन्द्रिय और मन को वश में करना इन्द्रिय संयम कहलाता है और पाँच स्थावर और त्रस जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम कहलाता है।
संयम
संयम ब्रेक, लगाम, अङ्कुश या नकेल के समान है।
संयम
घर को छोड़ना व्यवहार चारित्र है, स्व में रमना निश्चय चारित्र है।
संयम
परिणामों की निर्मलता ही चारित्र है, घर को छोड़ने के साथ कषाय छोड़ने से कल्याण होता है। कषाय नहीं छूटी तो जहाँ जायेंगे वहीं घर बस जायेगा।
संयम
फल से उदर पूर्ति सम्भव है, फूल से तृष्णा की प्यास बढ़ती है, संसारिक सुख फूल की गंध के समान तृष्णा बढ़ाता है और मोक्ष का सुख फल की तरह तृप्ति कारक है।
संतोष
यद्यपि इन्द्रिय विजय कटुक है तत्काल में दुःखदायक मालूम होता है, तथापि नित्य सुख की इच्छा करने वाले सत्पुरुषों के द्वारा वह औषध के समान सेवन किया जाता है।
संयम
दृष्टि को अन्तर्मुखी करने का मतलब अपनी बुराईयों को देखना और दूर करना है।
विवेक
लता को बन्धन देते है तो ऊँचाइयों को प्राप्त होती है उसी प्रकार संयम का बन्धन आत्मा को ऊँचाई प्राप्त कराता हैं।
संयम
व्रत रहित दयालु पुरुष को देवगति सुलभ होती है और दया रहित व्रती पुरुष को नरकगति सुलभ होती है, निर्दय मनुष्य चिरकाल तक तपस्या करे, खूब व्रत करे, दान देवे किन्तु उस तप, व्रत और दान के फल से वह दरिद्र ही रहता है, उसे उनका किञ्चित भी फल प्राप्त नहीं होता और केवल दया को पालने वाला उसके फल से पुष्ट होता है, हे मोक्ष के इच्छुक! यदि तेरा मन दया से भरा है, तो उपवास आदि के द्वारा व्यर्थ ही कष्ट उठाता है, तुझे दयाभाव से ही सिद्धि मिल जायेगी, यदि तेरा मन दया से शून्य है, तो तु मुक्ति के लिए व्यर्थ ही क्लेश उठाता है क्योंकि कोरे कायक्लेश से मुक्ति नहीं मिलती, जैसे मठा से सींचे गये प्रदेश में घास नहीं उगती वैसे ही दयालुपुरुष पर किसी असहिष्णु व्यक्ति के द्वारा लगाया गया हिंसा–चोरी आदि का दोष न उसकी अपकीर्ति का कारण होता है न दुर्गति का, बल्कि उल्टे गुणों को ही लाने में कारण होता है।
अहिंसा
यदि बाह्य हिंसा का त्याग एवं इन्द्रियों के विषयों में मात्र प्रवृत्ति न होने का नाम संयम है, तो फिर देव गति में भी संयम होना चाहिए, क्योंकि सर्वार्थ सिद्धि में तेतीस सागर तक विषय सेवन का विकल्प भी नहीं आता, रसना इन्द्रिय के विषय में भी उन्हे तैंतीस सागर तक जिव्हा जूठी नहीं करनी पड़ती, अतः सङ्कल्प पूर्वक त्याग करने का नाम ही संयम है।
संयम
''अन्तरङ्ग में कषाय से आत्मा को मलिन नहीं होने देना, बहिरङ्ग में यत्नाचार पूर्वक प्रवृति करना संयम हैं।''
संयम
जिस प्रकार गंगा का जल सेव्य है, गंदा जल असेव्य है, नल का जल सेव्य है, नाली का जल असेव्य है, उसी प्रकार संयम सेव्य है और असंयम असेव्य है।
संयम