Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 72

पुरुषार्थों का मूल कारण – आरोग्य

122 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

प्रेम करने वाला पड़ोसी दूर रहने वाले भाई से अच्छा है।
संगति
सत्संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है, जो लोग साथ-साथ उठते बैठते हैं उनकी नैतिकता तथा चारित्र का स्तर भी समान हो जाया करता है, किसी व्यक्ति का चारित्र इतना सबल नहीं होता कि वह अपने आसपास की स्थितियों से प्रभावित न हो।
संगति
जो लोग धर्म करते-करते वृद्ध हो गये हैं, उनकी तुम भक्ति करो तथा मित्रता प्राप्त करने का यत्न करो क्योंकि यह महान् सौभाग्य की बात है।
संगति
आदमी की बुद्धि का सम्बन्ध तो उसके मस्तिष्क से है परन्तु उसकी प्रतिष्ठा तो उन लोगों पर पूर्ण अवलम्बित है, जिनकी संगति में वह रहता है।
संगति
बुद्धिमान यद्यपि स्वयमेव सर्वगुण सम्पन्न होते हैं, फिर भी वे पवित्र पुरुषों के सुसंग को 'शक्ति का स्तम्भ' समझते हैं।
संगति
अच्छी संगति से बढ़कर आदमी का सहायक और कोई नहीं है और कोई वस्तु इतनी हानि नहीं पहुँचाती, जितनी की दुर्जन की संगति।
संगति
आनंद का पहला स्रोत है स्वास्थ्य।
स्वास्थ्य
आहार सन्तुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग नहीं हो सकता है।
स्वास्थ्य
रात्रि में जल्दी सोना, प्रातः जल्दी उठना, मनुष्य को स्वस्थ, धनी और बुद्धिमान बनाता है।
स्वास्थ्य
आनंद का मुख्य सिद्धान्त है तंदुरुस्ती और तंदुरुस्ती का मुख्य सिद्धान्त है कसरत।
स्वास्थ्य
भूख लगने पर भोजन करना प्रकृति है, छीनकर खाना विकृति है और मिल बाँटकर खाना भारतीय संस्कृति है।
आहार
बिना शारीरिक उन्नति के आध्यात्मिक उन्नति असंभव है।
स्वास्थ्य
सुख का पहला चरण स्वास्थ्य है और समृद्धि का पहला चरण शान्ति है।
स्वास्थ्य
सूर्य की गर्मी से संतप्त व्यक्ति यदि बिना विश्राम किए तत्काल स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और सिर में पीड़ा होती है।
स्वास्थ्य
स्वस्थ शरीर आत्मा का भवन है और अस्वस्थ शरीर आत्मा का कारागार है।
स्वास्थ्य
ढलती उम्र में वजन बढ़ाना, आत्महत्या है।
स्वास्थ्य
मोटापा और मधुमेह मौत को आमंत्रण है।
स्वास्थ्य
मोटापा ही समस्त मुसीबतों की महामारी है।
स्वास्थ्य
जितनी मोटी कमर, उतनी छोटी उमर।
स्वास्थ्य
खुराक घटाओ, परिश्रम बढ़ाओ, बुढ़ापे को दूर भगाओ।
स्वास्थ्य
हवा, हरियाली, हलचल हमें हिरण सदृश चुस्त बनाती है।
स्वास्थ्य
पुरुषों का ७० किलो, स्त्रियों का ६० किलो वजन स्वस्थ जीवन की लक्ष्मण रेखा है।
स्वास्थ्य
स्वस्थ पुरुष की दो पहचान हैं, भरपेट भूख और भरपूर नींद।
स्वास्थ्य
शरीर की नीरोगता पर उपेक्षा रखना आत्म सिद्धि की अवहेलना है।
स्वास्थ्य
पीता थोड़ी छाछ जो, करके भोजन रोज। नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर भी ओज ॥
आहार
उन्नति के ३ सूत्र–स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, सम्यक् साधना। सेहत सबसे बड़ी सम्पत्ति है, संतोष सबसे बड़ा धन है, आत्म विश्वास सबसे बड़ा खजाना व दोस्त है, अस्तित्व में न होना सबसे बड़ा आनन्द है।
स्वास्थ्य
मट्ठा सेवन करने वाला कभी पीड़ित नहीं होता, मट्ठे द्वारा शान्त किए गये रोग पुनः उत्पन्न नहीं होते, जिस प्रकार देवताओं को अमृत हितकर है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को मट्ठा हितकारी है।
आहार
व्यायाम से शारीरिक हल्कापन, कर्म सामर्थ्य, दृढ़ता, कष्ट सहिष्णुता, दोषों की क्षीणता तथा जठराग्नि की वृद्धि होती है।
स्वास्थ्य
अति व्यायाम से थकावट, क्लांति, क्षीणता, प्यास, रक्तपित्त, सांस चढ़ना, खाँसी तथा वमन, ये उपद्रव होते हैं।
स्वास्थ्य
दिन के अंत में दूध पीना चाहिए, रात्रि के अंत में जल, भोजन के अंत में मट्ठा पीना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को वैद्य की जरूरत नहीं होती है।
आहार
यदि अधिक भोजन किया जाए तो वह प्राण वायु और अपान वायु में बाधक होता है, आलस्य और नींद लाता है तथा पराक्रम को नष्ट करता है।
स्वास्थ्य
जब शराब अन्दर होती है तब बुद्धि बाहर हो जाती है।
आहार
तनाव व चिन्ता पैन क्रियाज को हानि पहुँचाते हैं।
स्वास्थ्य
शरीर स्वास्थ्य के इच्छुक व्यक्ति को समय पर मलमूत्र का क्षेपण करना चाहिए, मलमूत्रादि का वेग नहीं रोकना चाहिए, व्यायाम, शयन, स्नान, भोजन और ताजी हवा में घूमना आदि की यथासमय प्रवृत्ति नहीं रोकना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति अपने वीर्य, मल, मूत्र और अपान वायु के वेगों को रोकता है उसे पथरी, भगन्दर, गुल्म और बवासीर आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
स्वास्थ्य
निरंतर बैठे रहने से मनुष्य की जठराग्नि मन्द पड़ जाती है और शरीर स्थूल, आवाज मोटी एवं मानसिक विचार शक्ति स्थूल हो जाती है।
स्वास्थ्य
ध्यान समस्त रोगों की रामबाण औषधि है।
स्वास्थ्य
ताजा दुहा हुआ दूध जिस प्रकार शीघ्र नहीं बिगड़ता उसी प्रकार कुकर्मी का फल भी शीघ्र नहीं मालूम होता किन्तु वह राख में दबी हुई अग्नि की तरह विद्यमान रहता है।
कर्म
जो मनुष्य शोक से आतुर हो, ईर्ष्या से भरा हुआ हो, नाना प्रकार के कार्यों की चिंता कर रहा हो या किसी कामना में आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है?
स्वास्थ्य
नींद में राजा और रंक, मूर्ख और विद्वान् समान हो जाते हैं।
स्वास्थ्य
जागृत अवस्था की नींद सबसे ज्यादा हानि का कारण है।
स्वास्थ्य
ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में सोना शरीर में छिपे रोगरूपी सर्पों को जगाना है और समस्त कार्य सिद्धि में बाधक है।
स्वास्थ्य
प्रातःकाल उठकर अपना मुख घृत अथवा दर्पण में देखना चाहिए तथा परमात्मा का नाम लेकर पलंग (शय्या) से उठना चाहिए।
स्वास्थ्य
व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता है जैसे शरीर।
स्वास्थ्य
व्यायाम भी शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि हवा, पानी और भोजन।
स्वास्थ्य
प्रातःकाल स्वच्छ, सुगंधित, स्फूर्तिदायक हवा में टहलना अच्छा व्यायाम कहलाता है।
स्वास्थ्य
निश्चिन्त वनों में स्वेच्छापूर्वक ताजी वायु में विहार करने वाले हाथी आदि व्याधियों से पीड़ित नहीं होते हैं।
स्वास्थ्य
बीमारी की चिकित्सा के बजाय बचाव रखना श्रेष्ठ है।
स्वास्थ्य
बहुत बार भोजन करने से पुष्टि, कांति, उत्साह और बल में कमी आती है।
आहार
भोजन ऐसा करो जिससे शरीर स्वस्थ और मन शुद्ध रहे।
आहार
मात्र पेट भरना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है किन्तु कब, कैसे, कितना और किससे भरना यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।
आहार
भोजन स्वाद के लिए नहीं स्वास्थ्य लाभ के लिए होना चाहिए।
आहार
जो व्यक्ति अपनी जठराग्नि को वज्राग्नि अर्थात् कठोर से कठोर वस्तु को पचाने वाली करना चाहे उसे सदा भोजन से पूर्व मुद्गर आदि घुमाना चाहिए।
स्वास्थ्य
घृत पान के पश्चात् भोजन करने से मनुष्य की जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा नेत्र की ज्योति बढ़ती है।
स्वास्थ्य
जो एक बार में अत्यधिक पानी पीता है उसकी जठराग्नि मन्द पड़ती जाती है।
स्वास्थ्य
परिश्रम से थके व्यक्ति द्वारा बिना विश्राम किए तत्काल पिया हुआ पानी और भक्षण किया हुआ भोजन ज्वर या वमन पैदा कर देता है।
स्वास्थ्य
नीरोग शरीर में निर्विकार मन का वास होता है।
स्वास्थ्य
मन की बीमारी में तन का इलाज कराने से क्या लाभ? बल्कि इससे बीमारी और बढ़ती है।
स्वास्थ्य
मन को हर्ष व आनन्दमय बनाओ, इससे हजारों प्रकार की क्षतियों से बचोगे और दीर्घजीवी बनोगे।
स्वास्थ्य
भविष्य की चिन्ता से आँखों के रोग तथा ब्लडप्रेशर रोग तैयार होते हैं।
स्वास्थ्य
अपनी जिद पर अड़े रहने की आदत से पेट के रोग उत्पन्न होते हैं।
स्वास्थ्य