Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 56

कामना की भावना रोकती प्रभावना

78 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है क्योंकि वह सभी गुणों की जिम्मेदारी लेता है।
पुरुषार्थ
जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है, दूसरों को लूटने में नहीं है।
दान
सुख बाँटने से बढ़ता है दु:ख बाँटने से घटता है।
दान
जो सच्ची सेवा करने वाला है उसका प्रचार तो अपने आप होने वाला है।
दान
हम अतिथि सेवा के माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकते कि उसमें कितना पुण्य है क्योंकि अतिथि सेवा का महत्त्व तो अतिथि की योग्यता पर निर्भर है।
दान
सेवा भाव को प्रदर्शित करने वाला विनम्र वचन बोलता है, मित्र बनाता है तथा बहुतों को लाभ पहुँचाता है।
दान
अवसर पर जो उपकार किया जाता है, वह देखने में छोटा भले ही हो परन्तु जगत् में सबसे महान् है।
दान
उस सद्व्यवहारी पुरुष को देखो जो दूसरे के कामों को भी अपने विशेष कार्यों के समान ही देखता–भालता है, उसके उद्योग–धन्धे अवश्य उन्नति करेंगे।
दान
हार्दिक उपकार से बढ़कर न कोई चीज इस भूतल पर मिल सकती है और न स्वर्ग में।
दान
जिन लोगों को उचित और योग्य बातों का ज्ञान है, वे बुरे दिन आने पर भी दूसरों का उपकार करने से नहीं चूकते हैं।
दान
परोपकारी जीव उसी समय अपने को गरीब समझता है जबकि वह सहायता माँगने वालों की इच्छा पूर्ण करने में असमर्थ होता है।
दान
याचक के ओठों पर संतोषजनित हँसी की रेखा देखे बिना दानी का मन प्रसन्न नहीं होता है।
दान
आत्मजयी की विजयों में श्रेष्ठजय है 'भूख को जीतना' पर उससे भी बढ़कर उस मनुष्य की विजय है जो दूसरों की क्षुधा को शान्त करता है।
दान
मंदिर जी में देव दर्शन को जाएँ तो हाथ भरा एवं मन खाली करके जायें।
भक्ति
परिचय, परिणय और परिग्रह परमात्मा प्राप्ति में सबसे अधिक बाधक हैं।
अनासक्ति
किसी रोते हुए को हँसाना और मरते हुए को बचाना ईश्वर की सबसे बड़ी प्रार्थना है।
दान
स्त्री का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है, वैराग्य का फल दीक्षा है, दीक्षा का फल तपस्या है, तपस्या का फल कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करना है और सद्गृहस्थ होने का फल प्रतिदिन श्री जिनेन्द्र देव के चरण कमल की भाव सहित पूजा करना तथा सत्पात्र को दान देना है।
धर्म
बुद्धि की शुद्धि के लिए भगवान् की भक्ति से बढ़कर कोई भी साधन आज तक अनुभव में नहीं आया है।
भक्ति
भक्ति में एक अद्भुत शक्ति है, भक्ति से शक्ति, शक्ति से युक्ति और युक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है अत: जीवन की नैया को भक्ति रूपी डोरी से जोड़ दो क्योंकि भक्ति ही भगवान् बनने की सच्ची राह है।
भक्ति
भगवान् से रागी और विषयों से वीतरागी बनो।
भक्ति
मंदिर बनता है धन से, लेकिन पूजा होती है मन से।
भक्ति
जो जिन प्रतिमा, जिन मन्दिर तथा सिद्धान्त ग्रन्थों का निर्माण कराते हैं उनको अपने परिणामों में विशुद्धि के कारण अविनाशी फल प्राप्त होता है।
भक्ति
जो भी परिस्थति सामने आ जाये, उसी में प्रसन्न रहना 'भजन' है।
भक्ति
भगवान् का भजन करते समय संसार को याद नहीं करना चाहिए और संसार का काम करते समय भगवान् को भूलना नहीं चाहिए।
भक्ति
जो व्यक्ति देव, गुरु और धर्म की उपासना के उद्देश्य से स्नान नहीं करता उसका स्नान मत्स्य, मगर आदि जलचर जीवों के स्नान की तरह व्यर्थ है।
भक्ति
शास्त्र के अनुसार मन्दिर समवसरण का प्रतीक है लेकिन व्यवहार से मन्दिर एक विद्यालय, न्यायालय, चिकित्सालय, जलाशय, उद्यान का प्रतीक भी है।
भक्ति
जिस प्रकार समवसरण में नरकगति के जीव नहीं जाते, उसी प्रकार मन्दिर जी में भावी नारकी जीव भी नहीं जाते हैं।
भक्ति
जिन–जिन वस्तुओं को हम अपनी मानते हैं, उन–उन वस्तुओं के हम पराधीन हो जाते हैं, पराधीन व्यक्ति को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है–''पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।''
अनासक्ति
संसार का आश्रय लेने से पराधीनता और भगवान् का आश्रय लेने से स्वाधीनता प्राप्त होती है।
भक्ति
जब तक मनुष्य भगवान् का सहारा नहीं लेगा, तब तक कोई भी सहारा टिकेगा नहीं, अत: जन प्रिय नहीं जिनेन्द्र प्रिय बनो।
भक्ति
स्वच्छ हृदय में ही प्रभु का वास होता है।
भक्ति
भगवान् से विमुख होते ही जीव अनाथ हो जाता है।
भक्ति
आत्म समर्पण के बिना प्रभु अनुभूति संभव नहीं है।
भक्ति
परमात्मा को देखने के लिए चर्म चक्षु नहीं, श्रद्धा की आँख चाहिए।
भक्ति
दूरदर्शन से नहीं देवदर्शन से आत्मरंजन होता है।
भक्ति
हमारे कर्म ही हमें प्रभु की कृपा के योग्य बनाते हैं, न कि हमारे वचन।
भक्ति
कामना की धूल भक्ति के दर्पण को गन्दा कर देती है।
भक्ति
प्रभु का चिन्तन करो, तुम्हारी चिन्ता प्रभु स्वयं करेंगे।
भक्ति
तीर्थ हमारी साधना और उपासना के केन्द्र हैं, तीर्थ हमारी आस्था और भक्ति के केन्द्र हैं।
भक्ति
तीर्थयात्रा वही सार्थक या सफल है, जिसमें मानव दुष्कृत्य का परित्याग कर देवे।
भक्ति
दूसरों का आदर–सत्कार करना ही सज्जनों की सम्पत्ति होती है।
विनम्रता
भौतिक धन तो किसका नश्वर नहीं है? अर्थात् सभी का नश्वर होता है।
अनासक्ति
जो व्यक्ति दूसरों का आदर सत्कार नहीं जानता है वह क्या पूजा के महत्त्व को कभी जान सकता है?
विनम्रता
मानसिक उद्वेग पर प्रभु नाम वही काम करता है, जो आग पर पानी करता है।
भक्ति
निराधारों के लिए परमात्मा का सबसे बड़ा आधार है।
भक्ति
जैसे मन्दिर के बाहर अपने पदत्राण उतार देते हो वैसे ही अपनी मान्यताओं, परम्पराओं को बाहर छोड़ देना चाहिए।
भक्ति
जो जिनपूजा अनेक जन्म सम्बन्धी पापों को नष्ट कर देती है वह क्या प्राणियों के पूजा सम्बन्धी विधि से होने वाले पाप को नष्ट नहीं करेगी?
भक्ति
पवित्र मन से पूजा करने वाला आज का पुजारी ही कल का परमात्मा है।
भक्ति
प्रार्थना वाणी से नहीं हृदय से करने की चीज है।
भक्ति
प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है तथा प्रार्थना में असीम शक्ति है।
भक्ति
प्रार्थना पदार्थ के लिए नहीं अपितु परमार्थ के लिए होना चाहिए।
भक्ति
असहाय अवस्था में प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
भक्ति
सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना प्रभु स्वीकार करता है।
भक्ति
प्रार्थना और उपवास आत्मशुद्धि की एक अत्यन्त शक्तिशाली प्रक्रिया है।
भक्ति
यदि आपकी प्रभु–प्रार्थना, याचना से युक्त हो तो कर्ममुक्त नहीं कर सकती है।
भक्ति
प्रार्थना के साथ कामना और साधना के साथ वासना हो तो साधक का पतन हो जाता है।
भक्ति
जो बिना प्रार्थना किए सोता है, वह हर दिवस को दो रात बनाता है।
भक्ति
हृदय की सच्ची प्रार्थना से हमें सच्चे कर्त्तव्य का पता चलता है, अन्त में तो कर्त्तव्य करना ही प्रार्थना बन जाती है।
भक्ति
प्रार्थना जीभ से नहीं हृदय से होती है इसी से गूँगे, तोतले और मूढ़ भी प्रार्थना कर सकते हैं।
भक्ति
प्रार्थना चिन्ता को ठण्डा और पत्थर को मोम कर सकती है।
भक्ति