Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 56

कामना की भावना रोकती प्रभावना

78 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

प्रार्थना तूफान को रोक सकती है और डूबती नैया को किनारे लगा सकती है।
भक्ति
जैसे आप बीमारी में साँस लेना नहीं छोड़ते वैसे ही कष्टों में भजन करना नहीं छोड़ना चाहिए।
भक्ति
मनुष्य का शरीर भारत की लोकसभा जैसा है, इस शरीर में सभी मंत्रालय हैं–प्राण प्रधानमंत्री है, सिर शिक्षामंत्री है, कान दूरसंचार मंत्री, जुबान सूचना व प्रसारण मंत्री है, पेट खाद्य मंत्री है, हाथ श्रम मंत्री है, पैर यातायात मंत्री, नाक स्वास्थ्य मंत्री है, आँख कानून मंत्री, दिल वित्तमंत्री है, फेफड़े गृह मंत्री और आत्मा राष्ट्रपति है। इतना सब कुछ तो आपके पास है फिर क्यों आप लाल–पीली बत्ती माँगते–फिरते हो? अरे! प्रभु के नाम लगाने को सिर्फ समय माँगों बस।
भक्ति
मंदिर में सिर्फ कपड़े बदलकर न जायें बल्कि अपना मन बदलकर जायें क्योंकि भगवान् आपके शुद्ध कपड़े नहीं देखता वह तो आपके मन को देखता है कि मन शुद्ध है या नहीं।
भक्ति
बुराई में रस लेना बुरी बात है किन्तु अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और बुरी बात है।
चरित्र
आप भगवान् के दास बन जाओ तो भगवान् आपको मालिक बना देंगे।
भक्ति
भगवान् का भक्त कितनी ही नीची जाति का क्यों न हो, वह भक्ति हीन विद्वान् से श्रेष्ठ है।
भक्ति
जो भगवान् का भक्त नहीं, वह करोड़पति होने पर भी कंगाल है।
भक्ति
भक्त की परीक्षा वक्त पर होती है।
भक्ति
जैसे वृक्ष के नीचे ताली बजाने से उस पर बैठे पक्षी भाग जाते हैं, वैसे प्रभु की भक्ति (भजन) स्मरण से आत्मा के पाप कर्म उड़ जाते है।
भक्ति
संसार में भगवद्भक्ति के समान मूल्यवान कोई चीज नहीं है।
भक्ति
जैसे थोड़ी सी औषधि भयंकर रोग को शांत कर देती है और जैसे थोड़ा सा अमृत मृत्यु के भय को दूर कर देता है, उसी प्रकार ईश्वर की थोड़ी–सी स्तुति बहुत से पापों को नष्ट कर देती है।
भक्ति
भक्ति में भय नहीं होता और भय से भक्ति नहीं होती।
भक्ति
भक्ति के मार्ग में सिद्धान्त नहीं श्रद्धा काम आती है।
भक्ति
जैसे आप संकट में साँस लेना और भोजन करना नहीं छोड़ते, उसी प्रकार कष्टों में भक्ति करना न छोड़ें। क्योंकि यदि आप भोजन छोड़ देंगे तो जिंदा न रह सकेंगे और भजन छोड़ देंगे तो ठीक से मर भी नहीं पायेंगे।
भक्ति
भक्ति ने संगीत को और संगीत ने भक्ति को बहुत आगे बढ़ाया है।
भक्ति
भक्त और भगवान् में मात्र इतना अन्तर है कि भक्त खदान में उस हीरे के समान है जो अभी सान पर नहीं चढ़ा है, जबकि भगवान् उस हीरे की भाँति है जो सान पर चढ़कर विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर चुका है।
भक्ति
भोगों की प्राप्ति सदा के लिए नहीं होती और सबके लिए नहीं होती। परन्तु भगवान् की प्राप्ति सदा के लिए होती है और सबके लिए होती है।
भक्ति