Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 50

परोपकारी स्तुत्य

48 सूत्र

इन्द्र, मनुष्य, विद्याधर, चक्रवर्ती और धरणेन्द्रों ने भूत भविष्य और वर्तमान में जो सुख भोगा है उस सबको इकट्ठा किया जाये उस सुख से अनन्त गुणित सुख सिद्ध परमेष्ठी एक समय में भोगते हैं इसलिए हे भाई! यदि तुझे इष्ट हो तो एकाग्रचित्त होकर उस समीचीन सुख का उपाय कर।
समाधि
नदी, वृक्ष, बादल, समुद्र, विन्ध्याचल, मलयाचल, गाय, सूर्य, सज्जन सभी निःस्वार्थ परोपकार करते हैं।
दान
जिनका मुख प्रसन्नता का घर है, हृदय दया से परिपूर्ण हैं, वाणी अमृत की वर्षा करती है और कार्य परोपकार हैं, वे किसके द्वारा वंदनीय नहीं होते हैं?
दान
जो नेत्र, मन, वाणी और कर्म इन चारों से संसार को प्रसन्न करता है, उसी से संसार प्रसन्न रहता है।
चरित्र
उपकार करने का साहसी स्वभाव होने के कारण गुणी लोग अपनी हानि की भी चिन्ता नहीं करते हैं, दीपक की लौ अपना अंग जलाकर ही प्रकाश उत्पन्न करती है।
दान
जो अपनी नम्रता से ही उन्नत होते जाते हैं, दूसरों के गुणों की प्रशंसा करते-करते ही अपने गुणों को विख्यात करते हैं, दूसरों के कामों को सिद्ध करने के लिए निरन्तर महान् उद्योग भी करते हुए ही अपने प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं और अपनी क्षमा के द्वारा ही निंदा के नीरस अक्षरों से मुखरित मुख वाले दुर्मुखों को दुःखित कर देते हैं- ऐसे अद्भुत आचरण वाले किसके वंदनीय नहीं होते हैं?
विनम्रता
''मुझे लोग चाहे'', यह मैं कितना चाहता हूँ परन्तु ''लोग मुझे पसंद करे'', इसके लिए मैं करता क्या हूँ। दुःख के वर्ग में जो स्थान भय का है, वही स्थान आनन्द वर्ग में उत्साह का है।
मन
मनुष्य धन के द्वारा अधिक जीता है। विद्या से सुख पूर्वक जीता है। शिल्प से थोड़ा जीता है। बिना कर्म के मनुष्य जीवित ही नहीं रहता है
पुरुषार्थ
काम करने वाला मरने से कुछ घंटे पूर्व ही बूढ़ा होता है।
पुरुषार्थ
सज्जन अपनी उपयोगिता कार्य से बताते हैं, कंठ से नहीं बताते हैं।
चरित्र
आचार्य कहते हैं तृष्णा को नष्ट कर, क्षमा को धारण कर, पाप में अनुराग मत कर, सत्य बोल, सत्पुरुषों के पीछे चल, विद्वानों की सेवा कर, माननीयों का आदर कर, शत्रुओं से भी प्रेम कर, पीड़ितों को प्रश्रय दे, कीर्ति बढ़ा और दुःखित पर दया कर ये ही सब कार्य सत् पुरुषों के होते हैं।
चरित्र
संघर्ष की भावना को प्रश्रय न देकर मनुष्य के उदान्त गुणों को जगाना ही समाज के कल्याण का मार्ग है।
संगति
हँसी बाँट लेने से अनन्त हो जाती है। दुःख बँटता है तो हल्का हो जाता है और सुख बँटता है तो कई गुना हो जाता है।
संगति
यदि तुम सच्चे सुधारक बनना चाहते हो, तो तीन बातों की आवश्यकता है प्रथम तो यह कि तुम्हारी हृदय भावना शील हो, दूसरी बात यह कि इन सबके लिए क्या तुमने कोई उपाय ढूँढ़ निकाला है या नहीं? तीसरा अटल अध्यवसाय यदि ये तीनों गुण आप में हैं तो वास्तव में आप एक सच्चे सुधारक मार्ग प्रदर्शक गुरु एवं मनुष्य जाति के लिए वरदान स्वरूप हैं।
चरित्र
सामने वाले आदमी में जिस गुण की कमी है, उस सद्गुण के प्रत्यक्ष दर्शन उसे अपने व्यवहार द्वारा करा देना ही उसकी बड़ी से बड़ी सेवा है।
चरित्र
ऐसा स्वभाव हो कि सामने वाला कहे कि तेरी याद में जो आनंद मुझे प्राप्त होता है, उसने सारे संसार के आनंद को अपने पैरों से रौंद डाला है।
चरित्र
जो जिस कार्य में निपुण हो, उसे ही उस कार्य में लगायें, शास्त्रों का ज्ञाता मनुष्य भी यदि अनजाने काम में हाथ डाले तो धोखा खा जायेगा।
विवेक
प्रत्येक व्यक्ति सब बातों में निपुण नहीं हो सकता है, पर प्रत्येक व्यक्ति की कोई विशिष्ट, उत्कृष्टता होती है।
विविध
उद्योग से दरिद्रता नहीं रहती है। आत्म चिन्तन से पाप नहीं रहता है।
पुरुषार्थ
मौन रहने से झगड़ा नहीं होता है। सावधान रहने से भय नहीं होता है।
वाणी
परिश्रम हर सफलता की कुंजी है और परिश्रम ही प्रतिभा का पिता है।
पुरुषार्थ
राम ने सुग्रीव से पूछा कि लंका कितनी दूर है? सुग्रीव ने उत्तर दिया स्वामी! आलसियों के लिए बहुत दूर है, पर उद्यमशील के हाथ के पास ही है।
पुरुषार्थ
दुःखियों का दुःख शान्त करना ही उत्तम लोगों की सम्पत्ति का एकमात्र फल है।
दान
बिना किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान दिये परोपकार करना सज्जनों का एक व्यसन ही होता है। सत्पुरुष प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं करते हैं।
दान
अमूल्य हीरे के कण से दूसरे के लिए गिराया गया रक्त कण ज्यादा कीमती है।
दान
जब-तक अन्तःकरण दिव्य और उज्ज्वल न हो तब तक, वह व्यक्ति प्रकाश का प्रतिबिम्ब दूसरों पर नहीं डाल सकता है।
चरित्र
सज्जनों का लेना भी देने के लिए होता है जैसे-बादलों का जल लेना देने के लिए होता है।
दान
हम अपने विषय में धारणा इस आधार पर बनाते हैं कि हम क्या करने के योग्य हैं, दूसरे लोग हमारा मूल्यांकन हमने जो कुछ किया है उससे करते हैं।
चरित्र
अनुभव और दण्ड ऐसी सीख देते हैं जो अन्य उपायों से सम्प्रेषित नहीं होती है।
ज्ञान
कर्त्तव्य निष्ठ पुरुष कभी निराश नहीं होता है।
चरित्र
मुझे राज्य की कामना नहीं है, न स्वर्ग की न मोक्ष की, मैं दुःखों से पीड़ित प्राणियों के कष्टों के निवारण की कामना करता हूँ।
दान
बुद्धिमान आपत्ति और कष्ट में भी उत्साह नहीं छोड़ते हैं।
ज्ञान
उत्साह बलवान होता है, उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है।
पुरुषार्थ
भ्रातृत्व, मानवता तथा आध्यात्मिकता को स्थान दो, अद्वैत भावना की मलिन दृष्टि को त्याग दो, तुम भी रहो, मैं भी रहूँ इस प्रकार की भावना हो।
संगति
आलस्य सुख रूप प्रतीत होता है परन्तु उसका अन्त दुःख है तथा कार्य दक्षता दुःख रूप प्रतीत होती है परन्तु उससे सुख का उदय होता है।
पुरुषार्थ
ऐश्वर्य, लक्ष्मी, लज्जा, धृति और कीर्ति ये कार्य दक्ष पुरुष में ही निवास करते हैं, आलसी में नहीं।
पुरुषार्थ
आलसी और अनुद्योगी के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।
पुरुषार्थ
उद्योगी के घर में ऋद्धि-सिद्धि पानी भरती हैं।
पुरुषार्थ
उचित उपाय से न किया हुआ प्रयास अन्य अनेक व्यक्तियों का आश्रय प्राप्त होने पर भी व्यर्थ ही जाता है।
विवेक
सौभाग्य न होना किसी के लिए दोष नहीं है, समझकर सत्प्रयत्न न करना ही दोष है।
पुरुषार्थ
जिसके जीवन में प्रयत्नशीलता नहीं है, वह या तो पशु है या मुक्त है।
पुरुषार्थ
हमारा महान् गौरव कभी भी न गिरने में नहीं है, अपितु जब भी गिरें तो हर बार उठने में है।
पुरुषार्थ
शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक पुकार-पुकार कर उपदेश देते हैं।
चरित्र
यह जगत् का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक भर आचरण का जितना फल होता है उतना मन भर भाषणों अथवा लेखों का नहीं होता है।
चरित्र
जिसे करना उचित नहीं है उसे प्राणों के कंठ में आ जाने पर भी नहीं करना चाहिए और जो करणीय है उसे प्राण संकट उपस्थित होने पर भी करना चाहिए।
चरित्र
प्रत्येक व्यक्ति अपने क्षेत्र में महान् है, परन्तु एक का कर्त्तव्य दूसरे का कर्त्तव्य नहीं हो सकता है।
चरित्र
कर्म वही है जो बंध कारक न हो। विद्या वही है जो मुक्ति कारक हो। इसके अतिरिक्त अन्य कर्म प्रयास मात्र है और अन्य विद्या शिल्प निपुणता मात्र है।
ज्ञान
गुणशीलता, तात्कालिक परिस्थिति तथा भविष्य का विचार करके शीघ्रता तथा दीर्घ सूत्रता दोनों दोषों को छोड़कर देश-काल के अनुकूल अपना कार्य करना चाहिए।
विवेक