Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 36

देवप्रिय

56 सूत्र

काम करने से पूर्व सोचना बुद्धिमत्ता है, कर्म करते समय सोचना सतर्कता है, काम कर चुकने पर सोचना मूर्खता है।
विवेक
संसार में बुद्धि-बल बहुत बड़ा बल है, जिसमें बुद्धि नहीं उसमें बल नहीं होता है।
ज्ञान
बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
ज्ञान
बुद्धिमान व्यक्ति मूर्खों से जितनी शिक्षा लेता है, मूर्ख बुद्धिमानों से उतनी शिक्षा नहीं लेता है।
ज्ञान
दूसरों का बुरा करने वाले का स्वयं बुरा होता है।
कर्म
हर बुराई का अन्त बुरा होता है।
कर्म
संसार में मूर्ख मनुष्य को छोड़कर दूसरा कोई पशु नहीं है।
ज्ञान
मूर्ख की बुद्धि दूसरे के ज्ञान से ही प्रभावित रहती है।
ज्ञान
जो यह जानता है कि इस संसार में सुख है, वह महामूर्ख है।
ज्ञान
मूर्ख का हृदय उसके मुख में रहता है जबकि ज्ञानी की जिह्वा उसके हृदय में होती है।
ज्ञान
एक ही पत्थर से दो बार टकराना मूर्खता है।
विवेक
अधिक बोलना मूर्खों का गुण होता है।
वाणी
दूसरों में सुख खोजना ही सबसे बड़ी मूर्खता है।
ज्ञान
यदि आप अच्छे अवसर गँवा देते हैं तो समझना आप महान् मूर्ख हैं।
विवेक
मूर्ख कभी भी प्रिय नहीं बोलता और स्पष्ट वक्ता कभी धूर्त नहीं होता है।
वाणी
वह व्यक्ति संसार का सबसे बड़ा मूर्ख है जो किसी की देह से प्यार करता है।
अनासक्ति
मूर्खों से बहस करके कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता है मूर्ख पर विजय पाने का एकमात्र उपाय यही है कि उसका अहसास न करें।
ज्ञान
मूर्ख लोग सुख में हँसते और दुःख में बिलखते हैं, ज्ञानी दोनों दशाओं में समभाव धारण करते हैं।
ज्ञान
सौ मूर्खों का गुरु बनने कि अपेक्षा एक ज्ञानी का शिष्य बनना श्रेष्ठ होता है।
ज्ञान
वे मूर्ख हैं जो शठता से धर्म उपार्जन, कपट से मित्र प्राप्ति, दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर स्थायी धन संग्रह, आलसी बने रहकर विद्या तथा क्रूर व्यवहार से जो स्त्री को वश में करना चाहते हैं।
ज्ञान
मूर्ख अपनी गलतियों से भी सबक नहीं लेते हैं, जबकि बुद्धिमान दूसरों की गलतियों से भी सीख ले लेते हैं।
ज्ञान
मूर्ख से पाला पड़ जाए तो बुद्धिमान मनुष्य को चुप रहना चाहिए।
ज्ञान
जो न चाहने वालों को चाहता है और चाहने वालों को त्याग देता है तथा जो अपने से बलवान वालों के साथ वैर बांधता है, उसे मूर्ख कहते हैं।
विवेक
विज्ञापन मूर्ख बनाने का सबसे अच्छा और सरल उपाय है।
विवेक
आज के बुद्धिमान व्यक्ति 'श्रद्धा-विश्वास' को मूर्खता की श्रेणी में रखते हैं।
भक्ति
भ्रम ही भ्रमण का कारण है।
विवेक
बड़े समूह में मूर्खों की शक्ति को कभी कम नहीं आँकना चाहिए।
संगति
अगर सेवक सुख चाहें, भिखारी मान चाहें, व्यसनी धन की इच्छा करें, व्यभिचारी शुभ गति चाहें, लोभी यश चाहें तो समझो कि ये लोग आकाश से दूध दुहना चाह रहे हैं।
विवेक
नाशवान में अपनापन अशान्ति और बन्धन देने वाला है।
अनासक्ति
लोग साधुओं को छोड़ने पैदल नहीं जाते पर कर्मोदय में या डॉक्टर के कहने पर सब पैदल चलने को मजबूर होते हैं।
कर्म
पैसा कमाने के लिए स्वास्थ्य खोता है और पैसा खोकर स्वास्थ्य प्राप्त करना चाहता है पर खोया स्वास्थ्य प्राप्त नहीं होता है।
स्वास्थ्य
जो हर पल हर घड़ी किसी न किसी छोटी बात से परेशान रहते हैं और सुन्दर जिन्दगी को शान्ति और आनंद में नहीं जीते हैं वे सिर्फ शिकायत करते हैं।
मन
अधिकांश समय हम नकारात्मक भावनाओं से ग्रसित रहते हैं, गुस्सा, चिड़चिड़ाहट, भय, खौफ आदि।
मन
संसार में रुचि रखना और सुख चाहना विष खाकर जीने की कल्पना है।
अनासक्ति
पर का विचार करना और सत्य शान्ति पाना खून से वस्त्र धोकर स्वच्छ करने का व्यामोह है।
ध्यान
अपनी पर्याय पर भी दृष्टि रखकर निर्विकल्पता के स्वप्न देखना बबूल और नीम के बीज बोकर आम और सेव खाने की प्रतीक्षा करने जैसा है।
ध्यान
परिग्रह की मूर्छा रखकर अपनी यात्रा सफल करने का संतोष लाना सर्प आदि जन्तुओं को पालकर सुरक्षित रहने की कल्पना है।
अनासक्ति
पर पदार्थ से अपने को सशरण मानना, अपने को अशरण करना है।
अनासक्ति
वाद-विवाद में हठ और गर्मी ये मूर्खता के पक्के प्रमाण हैं।
वाणी
जो आगम को जानकर पाप, दुराचार और दुर्मार्ग का आचरण नहीं करते, वे विद्वान् हैं जो जानकर भी विषयासक्ति नहीं छोड़ते वे मूर्ख हैं।
ज्ञान
परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतराना मनुष्य की सबसे बड़ी कायरता है।
पुरुषार्थ
गरीब मंदिर के बाहर अमीर मंदिर के भीतर भीख माँगता है।
संतोष
कोई मुझे एक बार धोखा दे तो उसे धिक्कार है कोई मुझे दो बार धोखा दे तो मुझे धिक्कार है क्योंकि मैं सचेत नहीं हुआ।
विवेक
मनुष्य से ये ही भूलें होती हैं कि वह दुनिया को सुधारना चाहता है, पर स्वयं सुधरना नहीं चाहता है।
विवेक
मूर्ख आदमी बिना बुलाए भीतर घुस आता है और बिना पूछे बोलने लगता है, जिस पर विश्वास नहीं करना चाहिए उसका विश्वास करता है।
विवेक
मूर्ख व्यक्ति परस्पर बातचीत करने वाले दूसरे लोगों की भली बुरी बातें सुनकर उनसे बुरी बातों को ही ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही जैसे सुअर अन्य अच्छी खाद्य वस्तुओं को छोड़कर विष्ठा को ही अपना भोजन बनाता है।
संगति
मूर्ख लोग जो कुछ पढ़ते हैं, उससे वे अपना अहित करते हैं और जो कुछ वे लिखते हैं, उससे दूसरों का अहित करते हैं।
ज्ञान
यदि निर्धनता सभी अपराधों की माता है तो बुद्धि हीनता (मूर्खता) सभी अपराधों का पिता है।
ज्ञान
विद्वानों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत होता है और मूर्खों का व्यसनों में, निद्रा में तथा लड़ाई-झगड़े में बीतता है।
ज्ञान
विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं, मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच में धर्म ग्रन्थ की होती है।
ज्ञान
मूर्ख मनुष्य को सम्मान देना मानों सुअर के आगे मोती डालना है।
विवेक
जो व्यक्ति स्वयं अयोग्य है और अपने पुरखों के पराक्रम और सम्मान पर गर्व करता है, वह उस चोर के समान है, जो बचाव के लिए मंदिर में छिप जाता है।
विनम्रता
मूर्खों की संगति में रहने वाला मनुष्य चिरकाल तक शोक निमग्न रहता है, मूर्खों की संगति शत्रुओं की तरह सदा ही दुःखदायक होती है और धीर पुरुषों का सहवास अपने बंधु-बांधवों के समागम के समान सुखदाई होता है।
संगति
अनपढ़ व्यक्ति चाहे जितना बुद्धिमान हो, विज्ञजन उसकी सलाह को कोई महत्त्व नहीं देते हैं। अज्ञानी आदमी स्वयं अपने सिर पर जैसी आपत्तियाँ लाता है, वैसी आपत्ति शत्रु भी नहीं पहुँचा सकते हैं।
ज्ञान
क्या तुम जानना चाहते हो कि बुद्धि का उथलापन किसे कहते हैं? बस उसी अहंकार को जिससे मनुष्य मन में समझता है कि ''मैं बड़ा सयाना हूँ''।
विनम्रता
जो मूढ़ अज्ञात विषयों के ज्ञान का दिखावा करता है वह ज्ञात विषयों के प्रति भी सन्देह उत्पन्न कर देता है।
ज्ञान