Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 19

दान

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जितना विशुद्ध संयम होता जाता है, उतना ज्ञान का क्षयोपशम होता जाता है।
संयम
वैद्य और वक्ता दोनों ही धीरता से काम लेते हैं। ''चिंता सब सुखों को नष्ट करती है।''
मन
कल की चिंता करने वाले, आने वाले जन्म की चिंता नहीं कर पाते हैं।
मन
जब तक मन में विकल्प चलता है तब तक गुरु प्रभु कुछ भी नहीं दिखता है, विकल्प संसार बढ़ाने वाला है।
मन
वृद्धाश्रम में माँ बाप की दुर्दशा को देखकर सब बेटों को कोसते हैं परन्तु सब भूल जाते हैं कि दुर्दशा करने में किसी की 'बेटी' का अहम् रोल होता है।
परिवार
क्या बताऊँ बहन जब बहू थी, तो अच्छी सास नहीं मिली और अब सास बनी तो अच्छी बहू नहीं मिली अर्थात् महिलाएँ प्रायः अपनी गलती न स्वीकार करना चाहती हैं और न सुधरना चाहती हैं।
परिवार
बचपन की यादों को अगर ठीक से सँजोकर रखा जाये तो वे बुढ़ापे का अच्छा सहारा बन सकती हैं।
परिवार
आम आदमी को अपनी विचारधारा बदलनी होगी और ऐसे संगठनों से कारोबार करना होगा जहाँ भ्रष्टाचार और अनैतिकता न हो। यही समस्या का समाधान है।
चरित्र
दान के लिए वर्तमान ही सबसे उचित समय होता है।
दान
जब आपने किसी वस्तु का दान कर दिया तो फिर वह आपकी रही ही नहीं, तब उस पर आपके नाम की क्या जरूरत है?
दान
दान हमारे समाज में बनाई गई एक सुन्दर व्यवस्था है, जो आर्थिक स्तर पर असमानता को पाटने में मदद करती है।
दान
जीवन में पहले दिन से कुछ न कुछ दान करने की आदत डालें, अगर आप दस हजार की आमदनी में दान नहीं कर सकते तो दस लाख होने पर भी नहीं कर पायेंगे। गुप्त दान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दान
दान की प्राथमिकता हमेशा हमारे नजदीकी परिजन, मित्र, कर्मचारी के प्रति पहले होनी चाहिए। देश में बहुत मात्रा में लोग आँखों की रोशनी से वंचित हैं।
दान
हर साल हजारों लोगों की मृत्यु जलने से होती है, जिन्हें नई त्वचा लगाकर बचाया जा सकता है। यह बहुत ही दूर-दृष्टि भरा साहसिक निर्णय है।
दान
प्रतिभा को तलाशना और प्रतिमा को तराशना अन्यथा जिंदगी 'लाश' से ज्यादा कुछ नहीं है।
चरित्र
दान बंधी मुट्ठी, ध्यान बंद दृष्टि करें।
दान
जिस प्रकार स्वाति नक्षत्र में उत्पन्न नीर यदि सीप में जाता है तो वह मोती बन जाता है और सर्प के मुख में जाता है तो विष बन जाता है, उसी प्रकार पात्र-अपात्र में दिया दान भी जानना चाहिए।
दान
हमें जो मिलता है, उससे हमारी जिन्दगी चलती है, जो देते हैं उससे जिन्दगी बनती है। दान देने से पहले अपने कमजोर भाई को सहारा दो क्योंकि भगवान् से ज्यादा आपके भाई को आवश्यकता है। स्वयं जाकर दिया गया दान उत्तम, अपने यहाँ बुलाकर दिया गया दान मध्यम और माँगने पर दिया गया दान अधम व सेवा के बदले दान देना निष्फल है।
दान
पूर्वाभिमुख होकर देना उत्तराभिमुख होकर लेने से दोनों की आयु बढ़ती है।
दान
जिसने कभी दान-पूजा नहीं की वह साधु बनकर भी दुःखी रहता है।
दान
जब हम किसी को कुछ भी देते हैं तो हमारे पास सच्चा और अच्छा है वह देना चाहिए।
दान
जिस मनुष्य ने सर्प की आयु का बंध कर लिया है, तो वह न स्वयं दान देता है और न किसी को दान देने देता है।
दान
यदि कोई दरवाजे पर माँगने आ जाए तो अपना सौभाग्य समझना चाहिए कि उसने आप को इस योग्य समझा।
दान
धर्म से धन आता है, धन से धर्म नहीं होता।
धर्म
बिना कुछ दिये कुछ पाने की कोशिश न करें।
दान
वस्त्रों का साफ होना जरूरी है, बहुमूल्य होना नहीं।
संतोष
खुद कमाना और खुद खाना प्रकृति है, दूसरों से छीनकर खाना विकृति है और स्वयं कमाना तथा दूसरों को खिलाना संस्कृति है।
दान
यदि आप लक्ष्मीपति हो तो दान करोगे लक्ष्मीदास हो तो धन की सेवा करोगे।
दान
एक व्यक्ति दिखने में सुन्दर है, पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान है, निरोग है लेकिन दरिद्री है क्योंकि उसने पूर्व में आहारदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति जिसके पूर्वज बहुत ही सम्पत्ति छोड़ गये थे और वर्तमान में भी अच्छा व्यवसाय है, निरोग है, पढ़ा-लिखा है लेकिन प्रतिसमय खाते-पीते, सोते-जागते भय बना रहता है क्योंकि उसने पूर्व में अभयदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति के पास बहुत पैसा है, लक्ष्मी सम्भाले नहीं सम्भल रही, किसी प्रकार का भय भी नहीं है, वह विद्वान् है लेकिन हमेशा रोगी ही बना रहता है, मूँग की दाल भी नहीं पचती क्योंकि उसने पूर्व में औषधिदान नहीं दिया था।
दान
एक व्यक्ति वैभव सम्पन्न है, निरोग है, पर दिन-रात अध्ययन करने पर भी कुछ याद नहीं होता क्योंकि उसने पूर्व में ज्ञानदान नहीं दिया था।
दान
अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान निष्फल हो जाता है।
विनम्रता
दानशीलता हृदय का गुण है, हाथों का नहीं।
दान
लेकर देने की अपेक्षा न लेने का बड़ा भारी पुण्य है।
दान
जो दान कर दिया वह सोना है और जो बचा लिया वह मिट्टी है।
दान
दान यदि धर्म की प्रभावना और आत्मा के उत्थान के लिए दिया जाता है तो सम्यग्दर्शन आदि में कारण होता है।
दान
दान देने वाले का उद्देश्य सम्मान प्राप्त करने का नहीं होना चाहिए।
दान
उदार दिलवाला दे देकर धनवान बनता है, लोभी जोड़-जोड़कर निर्धन बनता है।
दान
जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वास्तव में वह सब हम अपने-आपको दे रहे हैं, अगर इस तथ्य को पहचान लिया तो फिर ऐसा कौन होगा जो दूसरों को दान न दे।
दान
दान से सम्पत्ति घटती नहीं, बढ़ती है, अँगूरों की शाखाएँ काटने से और अधिक अँगूर आते हैं। दानी के चरित्र का पता दान की अपेक्षा देने की विधि से अधिक लगता है।
दान
जो देता है वह देवता होता है और जो रखता है वह राक्षस होता है।
दान
यदि आप किसी को कुछ देना चाहते हो तो बस उसका चेहरा मुस्कुराहट से भर दो।
दान
अपना किया और अपना दिया ही काम आता है, दूसरे का किया और दिया हुआ अपने काम नहीं आता है।
दान
प्राप्त करने की अपेक्षा दान करना कहीं अधिक सौभाग्य का द्योतक है।
दान
माँगने पर देना अच्छा है, लेकिन जरूरत को समझकर बिना माँगे देना और भी अच्छा है।
दान
न्यायपूर्वक उपार्जित हुए धन के दो ही दुरुपयोग समझने चाहिए, अपात्र को देना और सत्पात्र को न देना।
दान
तुम्हारे द्वार पर कोई कुछ माँगने आया और तुमने नहीं दिया बस यही तुम्हारा दुर्भाग्य है।
दान
अतिथियों को आहार दान दिये बिना भोजन करने वाले गृहस्थ को दो पैर वाला बिना सींग-पूँछ का पशु कहा है।
दान
जिसके पास आकर याचक लोग सन्तुष्ट नहीं होते वह गृहस्थ निन्द्य है।
दान
प्रकृति वही लौटाकर देती है जो आप अपनी ओर से औरों को देते हैं।
दान
अन्त में अकेला ही जाना पड़ेगा इसलिए पहले से ही अकेले हो जायें अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रिया से असंग हो जायें, इनका आश्रय न लें।
अनासक्ति
दूसरे की प्रसन्नता से मिली हुई वस्तु दूध के समान है, माँगकर ली हुई वस्तु पानी के समान है और दूसरे का दिल दुःखाकर ली हुई वस्तु रक्त के समान है।
दान
लोक में वीतराग को छोड़कर दूसरा कोई देव, ब्रह्मचर्य को छोड़कर दूसरा कोई तप, अभयदान को छोड़कर दूसरा कोई दान और मुनिराज को छोड़कर दूसरा कोई पवित्र प्राणी नहीं है।
दान
खाली पेट कोई व्यक्ति बुद्धिमान नहीं हो सकता है।
दान
मनुष्य को अतिथियों और आश्रितों के लिए आहार दान देकर ही भोजन करना चाहिए।
दान
जो कुछ आपके पास है अतिशीघ्र प्रभु को समर्पित कर दो क्योंकि पता नहीं किस क्षण सब छोड़कर जाना पड़ जाये।
अनासक्ति
संसार एक प्रतिध्वनि है। जो बोलोगे वही आपके पास वापस लौटकर आएगा प्रेम दोगे तो प्रेम पाओगे घृणा दोगे तो घृणा पाओगे।
चरित्र
हाथों का सदुपयोग सुपात्रों को दान देने में ही है।
दान
सार्वजनिक संस्थाओं का काम उधार के रुपयों से नहीं चलना चाहिए।
दान