Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 19

दान

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जो भक्ति में तत्पर होता हुआ जिनालय में चंदोबा देता है वह निश्चित ही एक छत्र राज्य प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त करता है।
भक्ति
जो मनुष्य पुण्य के हेतु जिनालय में घण्टा देता है वह घण्टा आदि से सहित विमान को प्राप्त कर मुक्ति का वर होता है।
भक्ति
जो मनुष्य मुनियों के लिए ज्ञान दान करता है वह स्वर्ग लोक में सुख भोगकर राज्य एवं केवलज्ञान की विभूति को प्राप्त होता हुआ मोक्ष पाता है।
दान
जो मुनियों के लिए पुण्यकारी पवित्र औषध देता है वह देवलोक में सुख भोगकर कर्म रूपी रोगादिक को नष्ट करता है।
दान
प्राणी मात्र को अभयदान देने से जीव संसार सुख भोगकर निर्भय स्थान मोक्ष को पाता है।
दान
जो मनुष्य अल्प सम्पदा से युक्त होकर भी आत्मशक्ति को प्रकट कर नाना प्रकार का दान करते हैं, वे दानियों में श्रेष्ठ हैं।
दान
दुष्ट पुरुषों का बल है 'हिंसा', राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा अथवा रोना, सत्पुरुषों का बल है धन, असफल व्यक्तियों का बल है धैर्य, गुणवानों का बल है क्षमा, संतों का बल है साधना।
चरित्र
जैसे चारों ओर से जलते हुए मकान में फँसे शिशु की चिंता एक माँ को होती है, वैसी चिंता साधक को सामायिक (आत्मध्यान) की होनी चाहिए।
ध्यान
भारत के साधु यदि नशेबाजी और दुर्व्यसनों का त्याग कर देश के रचनात्मक कामों में लग जाएँ, तो वे जनता को अपने पक्ष में कर सकते हैं।
चरित्र