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जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 2 / 7

जब दोस्त प्रगति करे तो गर्व से कहना वो मेरा दोस्त है और जब दोस्त मुसीबत में हो तब कहना मैं उसका दोस्त हूँ।
संगति
दीपक मिट्टी का है या सोने का यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह रोशनी कितनी दे रहा है यह महत्त्वपूर्ण है, इसी तरह दोस्त अमीर है या गरीब यह महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि मुसीबत में वह हमारे साथ रहा या नहीं ये महत्त्वपूर्ण है।
संगति
स्वार्थ दोस्त को दुश्मन बना देता है, दोस्ती समर्पण व त्याग माँगती है।
संगति
राजा, ब्राह्मण, वैद्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ कभी विवाद नहीं करना चाहिए। लोग इहलोक-परलोक में मित्र को कभी दुःखी नहीं देखना चाहते हैं।
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जो बात माता-पिता, गुरु अथवा भाई से नहीं कही जा सकती वह गुप्त बात मित्र से कही जा सकती है।
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पवित्रता, त्यागशीलता, शूरवीरता, सुख-दुःख में समानता, सरलता, अनुराग और सत्य व्यवहार ये मित्र के गुण हैं।
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मत भिन्नताएँ अनेक हो सकती हैं, पर मन भिन्नताएँ नहीं होना चाहिए।
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सारे साथी काम के सबका अपना मोल। जो संकट में साथ दे वो सबसे अनमोल॥
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शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे मित्र बनाये रखना चाहिए।
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दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—पहले जो मौका आने पर साथ छोड़ देते हैं? दूसरे वो जो साथ देने के लिए मौका ढूढ़ते हैं।
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प्यार से विष भी पिला सकते हैं, लेकिन बल पूर्वक दूध पिलाना भी मुश्किल है।
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शुद्ध कमाई का धन और सत्य शिक्षक मित्र संसार में दुर्लभ हैं।
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जिसका कोई साथी होता है, वह बलवान होता है।
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मित्र दुःख में हो या सुख में वह अपने मित्र की सदा सहायता करता है।
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साथ में यात्रा करने वाला साथी ही प्रवासी के मित्र हैं, पत्नी गृह-वासी का मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है और दान मरते हुए मनुष्य का मित्र है।
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विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और धैर्य ये मनुष्य के स्वाभाविक मित्र हैं।
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शोक और भय से रक्षा करने वाला तथा प्रीति और विश्वास का पात्र ऐसे दो अक्षर वाले मित्र रूपी रत्न को किसने बनाया है?
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सन्तों ने कहा है कि अच्छे मित्र का यही लक्षण है कि वह पाप से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, उसकी गुप्त बात अन्य से छिपाता है, उसके गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति काल में उसका साथ नहीं छोड़ता और समय आने पर धन देता है। उसी प्रकार मित्र को प्रिय व्यवहार करना चाहिए, जिस प्रकार हाथ शरीर का हित करते हैं, पलकें आँखों को प्रिय लगे वैसा करती हैं।
संगति
मित्र के शत्रु बन जाने पर भी पहले कही गयी बातों को तथा उसके दोषों को जानकर भी कहीं भी कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए।
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वे ही वंदनीय हैं, वे ही पुण्यात्मा हैं और उन्हीं का इस संसार में जन्म लेना प्रशंसनीय है जो अपना काम छोड़कर अपने मित्रों का कार्य सिद्ध करते हैं।
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विवाद करना, लेन-देन करना, माँगना, मित्र के घर की स्त्रियों से मिलना-जुलना, हर काम में स्वयं आगे रहना; इन सबसे मित्रता टूट जाती है।
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सत्पुरुष से जो मित्रता होती है, उस मित्रता से बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
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कुलीन व्यक्तियों के साथ संपर्क, विद्वानों के साथ मित्रता और जाति-बंधुओं के साथ मेल करने वाला मनुष्य नष्ट नहीं होता है।
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प्रेम की शक्ति दंड की शक्ति से हजार गुनी प्रभावशाली और स्थायी होती है।
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किसी के साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं, अतः मध्यम स्थिति पर ही दृष्टि करो।
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घृणा लड़ाई-झगड़ों को जन्म देती है, पर प्रेम सब अपराधों को क्षमा कर देता है।
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जो प्रेम से नहीं सुधर सकता वह कभी नहीं सुधर सकता।
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प्रेम कभी दावा नहीं करता वह सदा देता है, प्रेम तकलीफ उठाता है, न क्रोध करता है, न बदला लेता है।
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जो व्यक्ति अकेले में तुम्हें तुम्हारा दोष बताए, उसे अपना मित्र समझो।
संगति
तुम जिन कठिनाइयों में फँसे हुए हो, उनको जो लोग दूर कर सकते हैं और आने वाली बुराइयों से जो लोग तुम्हें बचा सकते हैं, तुम उत्साहपूर्वक उनके साथ मित्रता करने की चेष्टा करो। जिस आदमी को ऐसे लोगों की मित्रता का गौरव प्राप्त है जो उसे डाँट फटकार सकते हैं तो उसे हानि पहुँचाने वाला कौन है?
संगति
बहुत से लोगों को शत्रु बना लेना मूर्खता है किन्तु सज्जन पुरुषों की मित्रता को छोड़ना उससे भी कहीं अधिक मूर्खता है।
संगति
जगत् में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसको प्राप्त करना इतना कठिन है जितना कि मित्रता को और शत्रुओं से रक्षा करने के लिए मित्रता के समान अन्य कौन-सा कवच है?
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मित्रता का उद्देश्य हँसी-विनोद करना नहीं है, बल्कि जब कोई बहक कर कुमार्ग में जाने लगे तो उसे रोकना और उसकी भर्त्सना करना ही मित्रता का लक्ष्य है।
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उस आदमी का हाथ देखो जिसके कपड़े हवा में उड़ गये हैं, कितनी तेजी के साथ फिर से अपने अंग को ढकने के लिए फुर्ती करता है? यही सच्चे मित्र का आदर्श है, जो विपत्ति में पड़े हुए मित्र की सहायता के लिए दौड़कर आता है।
संगति
जिस मित्रता में हिसाब लगाया जाता है, उसमें एक प्रकार का कंगलापन होता है, वह चाहे कितने ही गर्वपूर्वक कहें कि ''मैं उसको इतना प्यार करता हूँ और वह मुझे इतना चाहता है।''
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जिस मनुष्य को तुम अपना मित्र बनाना चाहते हो, उसके कुल का उसके गुण-दोषों का, कौन-कौन लोग उसके साथी हैं और किन-किनके साथ उसका सम्बन्ध है, इन बातों का अच्छी तरह से विचार कर लो और इसके पश्चात् यदि वह योग्य है तो मित्र बना लो।
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आपत्ति में एक गुण है, वह एक मापदण्ड है, जिससे तुम अपने मित्रों को नाप सकते हो।
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निःसन्देह मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि मूर्खों से मित्रता न करें।
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जो लोग संकट के समय धोखा दे सकते हैं, उनकी मित्रता की स्मृति मृत्यु के समय भी हृदय में दाह पैदा करती है।
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पवित्र लोगों के साथ बड़े चाव से मित्रता करो; लेकिन जो अयोग्य हैं उनका साथ छोड़ दो, इसके लिए चाहे तुम्हें कुछ भेंट भी देना पड़े।
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वही मैत्री घनिष्ठ है, जिसमें अपने प्रीति-पात्र की इच्छा के अनुकूल व्यक्ति अपने को समर्पित कर दे।
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सच्ची मित्रता वही है, जिसमें मित्र आपस में स्वतंत्र रहें और एक-दूसरे पर दबाव न डालें। विज्ञजन ऐसी मित्रता का कभी भी विरोध नहीं करते हैं।
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जो व्यक्ति यह सोचते हैं कि हमें उस मित्र से कितना मिलेगा, वे उस श्रेणी के लोग हैं, जिन की चोरों और बाजारू औरतों में गिनती होती है।
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जिस समय तुम कोई ऐसा काम करने में लगे हो, जिसे तुम पूरा कर सकते हो; उस समय यदि कोई तुम्हारे मार्ग में रोड़े अटकाता है तो उससे तुम एक शब्द भी न कहो, बल्कि धीरे-धीरे उससे सम्बन्ध छोड़ दो।
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मित्र सिर्फ साथी ही नहीं सारथी भी होता है।
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बड़े समूह में मूर्खों की शक्ति को कभी कम नहीं आँकना चाहिए।
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मूर्ख व्यक्ति परस्पर बातचीत करने वाले दूसरे लोगों की भली बुरी बातें सुनकर उनसे बुरी बातों को ही ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही जैसे सुअर अन्य अच्छी खाद्य वस्तुओं को छोड़कर विष्ठा को ही अपना भोजन बनाता है।
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मूर्खों की संगति में रहने वाला मनुष्य चिरकाल तक शोक निमग्न रहता है, मूर्खों की संगति शत्रुओं की तरह सदा ही दुःखदायक होती है और धीर पुरुषों का सहवास अपने बंधु-बांधवों के समागम के समान सुखदाई होता है।
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आदमी अपराध तीन कारणों से करता है–पेट, समाज और संगति के कारण।
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बहुत खाने वाले, सब लोगों से वैर रखने वाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश काल का ज्ञान न रखने वाले और निन्दित वेष धारण करने वाले मनुष्य को कभी अपने घर में न ठहरने दें।
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अकेले कभी किसी पथ पर नहीं चलना चाहिए यदि कोई गंभीर और पराक्रमी न भी हो तो किसी डरपोक या तुच्छ का ही साथ कर लेना चाहिए।
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सोने को कसौटी पर कसने से और व्यक्ति के पास में रहने से मालूम पड़ता है कि वह कैसा है?
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विश्व में व्यक्ति को जाति भाई ही तैराते हैं और जाति भाई ही डुबोते भी हैं, जो सदाचारी हैं, वे तैराते हैं और जो दुराचारी हैं, वे डुबो देते हैं।
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साहस, कायरता और हँसी छूत की बीमारी के समान हैं।
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अत्यधिक संसर्ग से किसका अनादर नहीं होता? 'अतिपरिचयादवज्ञाः'।
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अपने दुश्मन को हजार मौके दो कि वो आपका दोस्त बन जाये, लेकिन अपने दोस्त को एक भी ऐसा मौका न दो कि वो आपका दुश्मन बन जायें।
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आप किसी व्यक्ति की गहराई का अंदाजा उसके परिवेश से आसानी से लगा सकते हैं निवास का पता बताते ही व्यक्ति का मूल्य समझ में आता है।
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अगर आपका घर अमीरों के बीच है तो आपकी सोच अमीरों जैसी होगी।
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बहुतों के साथ विरोध करना ठीक नहीं क्योंकि चींटियों का समुदाय विशाल हाथी को भी खा जाता है।
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सरल स्वभाव वाले विद्वान् के पास जाते-आते रहना चाहिए। सरल स्वभाव वाले मूर्ख पर अनुग्रह करना चाहिए। दुष्ट स्वभाव वाले विद्वान् से सदा सावधान रहना चाहिए।
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दूर स्थित भाई से समीप स्थित पड़ोसी अधिक अच्छा है।
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जिसके कुल और शील का ज्ञान न हो, ऐसे किसी व्यक्ति को आश्रय नहीं देना चाहिए।
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मुख से मीठा बोलते हैं पर हृदय से बुराई करते रहते हैं, ऐसे लोगों से कभी संपर्क नहीं रखना चाहिए।
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मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से, दुष्ट स्त्री के पालन-पोषण से अथवा दीन-दुखियों के संपर्क में रहने से बुद्धिमान भी दुःख पाते हैं।
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योग्य पुरुषों की सभा में किसी मूर्ख मनुष्य का जाना ठीक वैसा है जैसा कि साफ-सुथरे पलंग के ऊपर मैला पैर रख देना है।
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परस्पर फूट वाले लोगों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
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जब बुरे व्यक्ति संगठित हो जाते हैं, तब अच्छे लोगों को भी मिल जाना चाहिए, अन्यथा एक-एक करके पराजित हो जायेंगे।
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अत्यधिक परिचय से अवज्ञा उत्पन्न होती है और किसी के पास लगातार जाने से निरादर होता है।
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मित्रों के झगड़े शत्रुओं के सुअवसर होते हैं।
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दुर्जन, शिल्पी, दास, दुष्ट, ढोल तथा स्त्रियाँ ताड़ित होने पर मृदु होते हैं, ये सत्कार योग्य नहीं है, ये ज्यादा सम्मान करने पर सिर पर चढ़ते हैं।
संगति
भलाई करने वाला पराया भी भाई के समान होता है और भाई भी यदि अहित चाहे तो वह शत्रु ही है।
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लँगड़े की संगति में रहोगे तो तुम भी लगड़ा कर चलने लगोगे।
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उन्हें स्वामिभक्त न समझें, जो आपकी हर कथनी व करनी की प्रशंसा करते हैं अपितु उन्हें स्वामिभक्त समझें जो आपके दोषों की मृदुल आलोचना करते हैं।
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ना समझ लोगों द्वारा की गयी तारीफ की अपेक्षा समझदार की आलोचना अच्छी होती है।
संगति
जो मनुष्य सहधर्मी भाई के साथ राग-द्वेष करते हैं, उन्हें दुष्ट अभिप्राय वाले महा निन्दनीय, मिथ्यादृष्टि अधम जानना चाहिए।
संगति