Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 188

अहङ्कार को जीतने के उपाय।

43 सूत्र

जीवन के विकास के लिये अहं का विसर्जन अनिवार्य है, यदि अहं करना है तो अपने स्वरूप का करो, तो अहं से अर्हं बन जाओगे, अहं के साथ कार जुड़ा तो दुःखी रहोगे एवं उत्तम मार्दव धर्म को पालने वाला व्यक्ति महान होता है।
विनम्रता
जो कोमल होता है वह स्थायी होता है जैसे जीभ, और जो कठोर होता है वह जल्दी नष्ट हो जाता है जैसे दाँत।
विनम्रता
लोक में उन्हीं का धन आदि पाना सार्थक है जिनके पास मार्दव गुण हैं।
विनम्रता
मद नष्ट होने से विनय, मिष्ट वचन, पूज्यों का सत्कार, दान, सम्मान आदिगुण प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
धर्म सबसे पहले झुकने का पाठ सिखाता हैं, फल से लदे वृक्ष की तरह गुणवान व्यक्ति नम्र होता है।
विनम्रता
मान भङ्ग होने पर मूर्ख आत्म घात कर लेता है और ज्ञानी वैराग्य धारण कर लेता है।
विनम्रता
नम्रता का प्रभाव दूर तक जाता है और कुछ खर्च भी नहीं होता है।
विनम्रता
महानता के तीन कारण- अभिप्राय में उदारता, कार्य सम्पादन में मानवता, सफलता में संयम।
चरित्र
विनम्रता से सम्यग्दर्शन उज्ज्वल होता है व यश बढ़ता है और बैर का अभाव होता है।
विनम्रता
मार्दव भावना से युक्त शिष्य पर गुरुओं की कृपा रहती है, साधु भी उसे साधु मानते हैं, जिससे वह सम्यग्ज्ञान आदि का पात्र होता है, सम्यग्ज्ञान आदि का पात्र होने से स्वर्ग और मोक्ष रुपी फल की प्राप्ति होती है।
विनम्रता
अहङ्कार से अनेक कुबुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं और मार्दव से अनेक विद्यायें प्राप्त होती हैं।
विनम्रता
अभिमानी पिता से पुत्र, पुत्र से पिता, गुरू से शिष्य, शिष्य से गुरू, स्वामी से सेवक, सेवक से स्वामी दूर हो जाते हैं, एवं विनयवान, पुत्र, शिष्य और सेवक को देख कर पिता, गुरू और स्वामी प्रसन्न होते हैं, जिनके मस्तक पर गुरु का हाथ होता है वे धन्य होते हैं।
विनम्रता
श्रमणों के पास आने में श्रम तो करना पड़ता है, किन्तु भ्रम दूर हो जाता है।
संगति
भक्त को मूर्ति में पत्थर नहीं दिखता, अहङ्कारी को भगवान् नहीं दिखते हैं।
भक्ति
कलिकाल में कामदेव का साम्राज्य रहता है, कब कहाँ किसका मन विकृत होकर ब्रह्मचर्य को दूषित कर दे इसका कोई ठिकाना नहीं है, अतः जाति कुल का अभिमान व्यर्थ है।
विनम्रता
ऊँट को अपनी ऊँचाई का भान पहाड़ के नीचे आने पर होता है, अहङ्कारी को अपने से बड़े के पास आने पर अपनी औकात का भान होता है।
विनम्रता
कोयल मेंढक- कोयल आम्र मञ्जरी का आस्वादन करके भी घमण्ड नहीं करती, मेंढक कीचड़ के पानी को पीकर भी टर्राने लगता है।
विनम्रता
सारी दुनिया को पानी पिलाने वाला भी प्यासा मर सकता है (जैसे श्री कृष्ण जी) फिर अहङ्कार किस बात का?
विनम्रता
विनय गुण- जैसे व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को छाती से लगाकर रखता है, उसी प्रकार विनीत पुरुष त्रियोग से आत्मा में विनय गुण को छाती से लगाकर रखता है, विनय को अपनी मूल सम्पत्ति समझकर गुरूजनों के प्रति आदर करता है।
विनम्रता
मान पत्र को सब हर्ष से लेते हैं और क्रोध पत्र को कोई नहीं लेना चाहता है जबकि दोनों कषायों के भेद ही हैं।
क्षमा
प्राणी कर्मों से कम कषायों से ज्यादा दुःखी होता है, अतः सुखी होने के लिए कषाय नहीं करनी चाहिए।
क्षमा
जिस मस्तक को पैसों में तो क्या फ्री में भी कोई अपने घर में नहीं रखना चाहता है, वह मस्तक अगर पूज्य जनों के चरणों में झुक जाए तो क्या कम होने वाला है।
विनम्रता
कुएँ में जब बर्तन झुकता है, तब पानी भरता है अन्यथा नहीं, अतः कुछ पाने के लिए झुकना आवश्यक है।
विनम्रता
छोटे-बड़े का भाव मान है और समानता का भाव मार्दव है।
विनम्रता
जीवन का विकास आसन से नहीं आचरण से होता है, आसन-शासन दोनों अस्थायी होते हैं।
चरित्र
विनय के विमान में बैठोगे तो कल्याण होगा और अहङ्कार की कार में बैठोगे तो अधो गमन होगा।
विनम्रता
स्वयं के शरीर व इन्द्रियों को उनके प्रतिकूल परिणमा नहीं सकता, तो भी पर का कर्ता बनना चाहता है।
विनम्रता
मानी असफलता में क्रोध व सफलता में मान करता है, असफलता में दूसरों को दोष देता है, और सफलता में स्वयं श्रेय लेता तथा घमण्ड करता है।
विनम्रता
ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और रूप इन आठों चीजों से सम्पन्न व्यक्तियों को भी मान हो सकता है, एवं आठों से रहित को भी मान हो सकता है।
विनम्रता
उत्तम पुरूष बालक में, वृद्ध में, निर्धन में और जाति, कुल आदि से हीन में भी यथायोग्य, प्रियवचन, आदर, सत्कार, स्थान दानादि देने में कभी नहीं चूकते हैं।
विनम्रता
उत्तम पुरूष अहङ्कार पूर्ण वस्त्र आभरणादि नहीं पहनते दूसरों के अपमान का कारण लेन-देन विवाह आदि व्यवहार भी नहीं करते हैं।
विनम्रता
उत्तम पुरुष अहङ्कार युक्त होकर चलना, बोलना, बैठना, झाँकना आदि कार्य नहीं करते हैं।
विनम्रता
अभिमान द्रव्य का नहीं पर्याय का होता है, किन्तु पर्याय तो नश्वर होती है।
अनासक्ति
माईक वाले ने कहा हम माईक न लगाते तो सभा न होती, पर उसे ध्यान नहीं कि मेरे अलावा परोक्ष में कितने लोगो का हाथ है, जैसे बिजली, पॉवर हाउस एवं जहाँ पर बिजली बनती है इत्यादि, इसी प्रकार वह अन्य कार्यों के बारे में भी नहीं सोचता है।
विनम्रता
दृष्टि द्रव्य की तरफ हो, तो पर्याय का अहङ्कार नहीं होता है।
विवेक
दो हाथ, दो पैर, सिर, सीना, पीठ, पुट्ठा, इन आठों अङ्गों को पाने की सार्थकता मृदुता से हो सकती है, अन्याय से नहीं।
विनम्रता
कठोर वृक्ष नदी की बाढ़ में उखड़ जाते हैं, किन्तु कोमल बेंत झुक जाते हैं और पुनः लहराने लगते हैं, इसीप्रकार अहङ्कारी नष्ट हो जाते हैं और विनम्र व्यक्ति उन्नति करते हैं।
विनम्रता
गिरते पेड़ के पत्ते से भी हम पुण्य क्षीण होने पर अपने पतन की शिक्षा ले सकते हैं।
कर्म
समस्त शक्तियों में मन्त्र शक्ति और समस्त बलों में पूर्वोपार्जित पुण्य प्रबल होता है।
णमोकार
छहों द्रव्य परस्पर उपकार करते हैं किन्तु अहङ्कारी अपने को पर का कर्ता मानता है।
विनम्रता
पद में राजी होने वाला भूत पूर्व बन जाता है, और प्रभु मे राजी होने वाला अभूतपूर्व बन जाता है।
भक्ति
गामा पहलवान एक हाथ से भरी बस रोक देता था, पर अन्त समय में चेहरे की मक्खी भी उड़ाने में असमर्थ था।
विनम्रता
जब देव मरकर एकेंद्रिय और चक्रवर्ती मरकर सप्तम नरक का नारकी हो सकता है, तब किसका गर्व किया जाए।
विनम्रता