Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 80

जीवन सुधरे जीभ से

32 सूत्र

वाणी को सँभल कर बोलना चाहिए क्योंकि इस पंचमकाल में काँच का बर्तन टूटने में तो समय लगता है पर लोगों की श्रद्धा टूटने में समय नहीं लगता अत: देव-शास्त्र-गुरु पर अश्रद्धा न हो ऐसी ही चर्चा और चर्या करनी चाहिए।
भक्ति
आपके द्वारा किसी को श्रद्धा न हो तो कोई बात नहीं पर किसी की भी श्रद्धा न टूटे यह ध्यान रखें।
भक्ति
वाणी का सर्वोत्तम गुण संक्षिप्तता है।
वाणी
प्रेम युक्त मीठी वाणी चुम्बक के समान अपनी ओर खींचती है।
वाणी
वाणी वह है, जो सुनने वाले को वशीभूत कर ले और नहीं सुनने वाले को भी सुनने के लिए विवश कर दे।
वाणी
प्रश्न उल्टा-सीधा कैसा भी हो उत्तर सरस, सरल, विनम्रता पूर्वक ही देना चाहिए।
वाणी
व्यर्थ बोलने की अपेक्षा मौन रहना वाणी की प्रथम विशेषता है, सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, प्रिय बोलना वाणी की तीसरी विशेषता है, धर्म बोलना चौथी विशेषता है, इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है।
वाणी
जगत् में सब भाषाओं को जन्म देने वाली कौन है? चमकती हुई संस्कृत। कहो वेद की जननी कौन है? ओजमयी संस्कृत। अनुपम व सरस साहित्य से सम्पन्न कौन हैं? श्रेष्ठ संस्कृत। कहो भारत के अनुरूप भाषा कौन है? सुरभारती संस्कृत।
ज्ञान
भाव बिगड़ने से स्वयं का नुकसान तथा भाषा बिगड़ने से परिवार का नुकसान होता है
वाणी
क्रोध की भाषा ही महाभारत की परिभाषा है।
क्षमा
कुलीन व्यक्ति क्रोधित होने पर भी असभ्य नहीं बोलता है, निश्चय ही गन्ना निचोड़े जाने पर भी मीठा ही उगलता है। नीच व्यक्ति सैंकड़ों गुणों से सहित होने पर भी जो हँसी में कहता है, वह झगड़े में भी कथनीय नहीं होता है।
क्षमा
मूर्खों की बात का उत्तर मौन है–''एक चुप सौ को हरावे''।
वाणी
दो चीजें निंदनीय हैं–बोलने के समय चुप रहना और चुप रहने के समय बोलना। जो लोग विद्वानों की सभा में अपने सिद्धान्त श्रोताओं के हृदय में नहीं रख सकते है, उनका अध्ययन चाहे कितना ही विस्तृत हो, फिर भी वह निरुपयोगी है।
वाणी
भली प्रकार प्रयुक्त की गई गौ (वाणी) विद्वानों ने कामनापूर्ण करने वाली कामधेनु कहा है किन्तु वही वाणी दुष्प्रयुक्त होने पर वक्ता में गोत्व (मूर्खता) को सूचित करती है।
वाणी
दूसरों से मधुर वचन बोलना जप है एक मात्र तप है।
वाणी
दुर्जनों की गालियों की परवाह करने की कोई आवश्यकता नहीं उनके कुवचनों से कुछ नहीं बिगड़ता किन्तु सज्जनों के मुख से निकलने वाले कुवाक्य अभिशाप बन कर लोगों को कष्ट पहुँचाते हैं, अत: उनके हृदय को दु:खाना ठीक नहीं है।
वाणी
जितना दिखाते हो उससे अधिक तुम्हारे पास होना चाहिए, जितना जानते हो उससे कम तुम्हें बोलना चाहिए।
वाणी
हे जीभ! भोजन और भाषण दोनों में ही संयत होओ क्योंकि अति भोजन और अतिभाषण दोनों ही प्राणों को शीघ्र ही नाश करते हैं।
वाणी
सच्ची शिक्षा का लक्ष्य बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र का विकास करना है।
ज्ञान
स्पष्टवादिता सर्वोच्च बुद्धिमत्ता है। अल्पभाषी व्यक्ति सर्वोत्तम होते हैं।
वाणी
व्यक्ति के स्वभाव को स्पष्ट करने वाली उसकी वाणी होती है उसका रूप नहीं।
वाणी
बादल समुद्र का खारा जल पीता है और उसको मीठा बना कर बरसा देता है इसी प्रकार सज्जन भी दुर्वचन सुन कर और सहकर उत्तर में सुवचन ही बोलते हैं।
वाणी
यदि आप एक ही कार्य से सारे जगत् को वश में करना चाहते हो तो अपनी वाणी रूपी गाय को पर की निंदा रूपी धान मत चरने दो।
वाणी
प्रवाद चाहे सत्य हो या असत्य, फिर भी लोकापवाद उच्च पदस्थ व्यक्तियों की महिमा का नाश करता ही है।
वाणी
दोषों को भूलकर भाइयों पर स्नेह एवं बन्धुओं पर प्रेम स्थापित करना चाहिए, पत्नि-पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले, मातापिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो, माता-पिता और बहन का दु:ख प्राण देकर भी दूर करना चाहिए।
परिवार
''मधुरतम शब्द प्रशंसा है।'' जीवन का सत्य प्रसन्नता है।
वाणी
ऐसी कोई बात किसी आदमी के बारे में मत कहो, जो उस मनुष्य के मुँह पर नहीं कह सकते हैं। जो अभिमानी हैं, आदर के योग्य नहीं है, उचित अनुचित के विवेक से रहित हैं, अप्रिय वक्ता हैं, दु:ख और अपमान से संकुचित हो रहे हैं ऐसे व्यक्तियों से अत्यन्त गुणी मनुष्य संभाषण नहीं करते हैं।
वाणी
वह सर्वाधिक सुखकर बातचीत है जहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, कोई दंभ नहीं अपितु भावों का शांत और आडंबर हीन आदान-प्रदान होता है।
वाणी
विवेक रहित लोगों को सज्जनों की वाणी अर्थहीन लगती है।
विवेक
मुखरता छोटा बनाती है और मौन उन्नति करने वाला होता है, मुखर नूपूर को पैर में और मौन हार को कण्ठ में पहना जाता है।
वाणी
अज्ञानी के लिए मौन से श्रेष्ठ कुछ नहीं है और यदि वह यह युक्ति समझ ले तो अज्ञानी न रहे।
वाणी
दरिद्रों में दरिद्र वह है जो अतिथि सत्कार न करें।
दान