Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 60

शिष्य और शीशी को डाँट चाहिए

32 सूत्र

अच्छा कार्य, तभी सरल हो पाता है जब इच्छा आत्मानुशासन सीख लेती है।
संयम
अकुलीन हो या कुलीन जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, धर्म में तत्पर रहता है, मृदु है, जितेन्द्रिय है, वह सैकड़ों कुलीनों से बढ़कर है।
चरित्र
गर्भपात, शराबी, चोर तथा व्रत तोड़ने वाले के लिए शास्त्र में प्रायश्चित्त का विधान है परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया गया है।
चरित्र
उपकारों को भूलना मनुष्य का स्वभाव है, अतः यदि हम दूसरों से कृतज्ञता की आशा करेंगे तो हमें व्यर्थ ही सरदर्द मोल लेना पड़ेगा।
विविध
सुसंस्कृत स्वभाव इस बात को जानकर परेशान होता है कि कोई उसके प्रति आभार मानता है किन्तु विकृत स्वभाव यह जानकर परेशान होता है कि वह स्वयं किसी के प्रति आभारी है।
चरित्र
कृत्रिमता को हमने इतना अधिक अपना लिया है कि अब वह स्वयं ही प्राकृतिक हो गयी है।
विविध
'उग्रता' के साथ 'निष्ठुरता' या 'निर्दयता' के मेल से 'क्रूरता' का आविर्भाव होता है।
क्षमा
आयु का एक क्षण भी करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, उसे यदि निरर्थक बिता दिया तो उससे बड़ी हानि क्या है?
समय
गुणज्ञों को शत्रुओं के भी गुणों से आनन्द होता है।
चरित्र
अपने श्रेष्ठ गुणों से अलंकृत होकर कुरुप मनुष्य भी दर्शनीय हो जाता है, जैसे अष्टावक्र किन्तु गंदे दोषों से व्याप्त होकर रूपवान भी कुरूप हो जाता है जैसे रावण।
चरित्र
तुम्हारा घर जहाज का लंगर न बने, बल्कि मस्तूल बने।
परिवार
अपने द्वारा की गयी अनियंत्रित चंचलता दुःख देती है।
संयम
छोटी अवस्था में यात्रा शिक्षा का एक अंग है, बड़ी अवस्था में यात्रा अनुभव प्राप्त करने का विषय हैं।
ज्ञान
मुझसे कोई पूछे कि जीवन किसे कहते हैं तो मैं उसकी व्याख्या करूँगा, संस्कार संचय को। जीवन की छोटी अवधि हमें लम्बी-चौड़ी आशाएँ करने से मना करती है।
चरित्र
परमात्मा को हृदय और जीभ की कठोरता पसंद नहीं है इसलिए हृदय और जीभ में हड्डी नहीं रखी गयी है इसके बाद भी लोग जीभ के द्वारा दूसरों के हृदय तोड़ते हैं यह आश्चर्य है।
वाणी
लोग सारभूत पदार्थ की अपेक्षा छिलके पर ज्यादा झगड़ते हैं यह अविवेक है।
विवेक
झगड़ा होने पर जो पहले चुप हो जाये, वह उत्तम वंश में जन्मा व्यक्ति है।
क्षमा
जीवन में शुद्ध दृष्टिकोण का अभाव ही हमारी प्रमुख समस्या है, जिसके रहते शेष समस्यायें लाख यत्न करने पर भी नहीं सुलझ पाती हैं।
विवेक
विद्वान् अज्ञानी पुरुषों से निन्दा या स्तुति पाकर भी स्वयं न तो निंदा करता है, न ही स्तुति अपितु उनको जैसे ज्ञान प्राप्त हो वैसा ही आचरण करता है।
ज्ञान
जो अपूर्ण है वह आवाज करता है और जो पूर्ण है वह शांत रहता है मूर्ख अधभरे जल घट के समान है और पंडित लबालब भरे तालाब के समान है।
ज्ञान
किसी के कहे बिना हृदय की बात को समझ लेने वाले से दूसरे व्यक्ति सम्पत्ति में समान होने पर भी, बुद्धि के कारण भिन्न होते हैं।
ज्ञान
बालकों को लाड़ करने में दोष हैं और ताड़ना करने में बहुत गुण हैं अतः पुत्र और शिष्य की ताड़ना करते रहना चाहिए।
परिवार
दुष्ट लोग भय दिखाकर वश में किए जाते हैं, क्षमा दिखाकर नहीं।
क्षमा
दुष्ट व्यक्ति का साथ किसी भी हालत में अच्छा नहीं होता है, दुष्ट व्यक्ति और साँप इन दोनों में साँप फिर भी अच्छा है क्योंकि साँप तो काल वश सिर्फ एक बार ही काटता है पर दुष्ट तो पग-पग पर हानि पहुँचाता है।
संगति
जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाये, वह दुष्ट है।
चरित्र
दूसरों के दुर्भाग्य से बुद्धिमान व्यक्ति यह शिक्षा ग्रहण करते हैं कि उन्हें पाप से बचना चाहिए।
विवेक
बुरी पुस्तकें पढ़ना जहर पीने के समान है।
ज्ञान
लज्जा का आकर्षण सौन्दर्य से भी बढ़कर है।
चरित्र
लज्जा शीलता मानव का अलंकार है, बुद्धिमान में यह न हो तो मान सहित चलना भी एक व्याधि है।
चरित्र
महान् पुरुष अपनी महानता का परिचय छोटे मनुष्यों के साथ किए अपने व्यवहार से देते हैं।
विनम्रता
पाँच वर्ष तक पुत्र को प्यार करना चाहिए, उसके बाद दस वर्ष तक पुत्र को दंड आदि देकर अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करना चाहिए और सोलह वर्ष के बाद पुत्र को मित्र की भाँति व्यवहार करना चाहिए।
परिवार
महापुरुष घोर विपत्ति के समय भी धैर्य नहीं छोड़ते हैं, अधिक उन्नति होने पर क्षमाशील बने रहते हैं, सभा में बोलते हुए वाक पटु दिखते हैं, युद्ध के समय पराक्रम धारण किए रहते हैं, यश प्राप्त करने में अभिरुचि होती है, शास्त्रों के अध्ययन का उन्हें बड़ा चस्का होता है ये सभी गुण सज्जन पुरुषों में स्वभाव से ही पाए जाते हैं।
चरित्र