Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 29

विनम्रता का द्वार, करे जग से उद्धार

145 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

सत्य का पालन करने वाले के लिए विनम्र होना आवश्यक होता है।
विनम्रता
नम्रता से देवता भी मनुष्य के वश में हो जाते हैं।
विनम्रता
ज्ञानियों का विश्वास है कि वास्तव में महान् व्यक्ति का लक्षण उसकी नम्रता है।
विनम्रता
नम्रता को बहुत से विद्वानों ने एक व्रत कहा है।
विनम्रता
नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
विनम्रता
नम्रता तो सबके साथ हो, पर निकटता कुछ लोगों के ही साथ होना चाहिए।
विनम्रता
नम्रता सभी के प्रति रखी जा सकती है किन्तु विनय पूज्यों के प्रति होना चाहिए।
विनम्रता
जिसे दूसरे की सुविधा व दूसरे को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता है वह जिंदगी में कुछ भी नहीं कमा पाता है यहाँ तक कि संतोष भी नहीं मिलता है।
विनम्रता
मनुष्य का स्वभाव होता है कि जब वह दूसरे पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे, अगर याचक दान लेने में कहीं भी स्वाभिमान दिखलाता है तो आदमी अपनी दानव वृत्ति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है।
दान
बुढ़ापा रूप (सुन्दरता) को, आशा धीरता को, मृत्यु प्राणों को, दोष देखने की आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरुषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को और अभिमान सर्वस्व को नष्ट कर देता है।
चरित्र
मुनियों को नमस्कार करने से उच्च गोत्र, दान देने से भोग, उपासना से पूजा प्रतिष्ठा, भक्ति से सुन्दर रूप की और स्तवन से कीर्ति की प्राप्ति होती है।
भक्ति
आश्चर्य है, आदमी मान-सम्मान पत्र चाहता है जबकि चार प्रकार की कषायों में मान भी एक कषाय है।
विनम्रता
नम्रता सारे सद्गुणों का दृढ़ स्तंभ है।
विनम्रता
विनम्रता के मार्ग से ही विपत्तियों के दलदल को पार किया जा सकता है।
विनम्रता
विनम्रता और श्रद्धा के सामने सभी तर्क बेअसर हो जाते हैं।
विनम्रता
जिस घर में बड़े-छोटे की मर्यादा है वह घर स्वर्ग है।
परिवार
पाँव का जूता सिर पर आये, इससे पहले सिर चरणों में रख दो, इज्जत बच जायेगी।
विनम्रता
जो झुकना जानता है, दुनिया उसे उठाती है, जो केवल अकड़ना ही जानता है, दुनिया उसे उखाड़कर फेंकती है।
विनम्रता
मान-सम्मान से दूर रहकर ही सच्ची विरक्ति प्राप्त हो सकती है।
विनम्रता
अपने से बड़ों के खड़े रहने पर स्वयं न बैठे रहो। जो गुरु के आने पर खड़े नहीं होते वह मरने के बाद अजगर बनते हैं।
विनम्रता
विनयशील, कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति को परमात्मा भी अपनी गोद में बैठा लेना चाहता है।
विनम्रता
अनुशासित शिष्य शिक्षा को सुगमता से प्राप्त कर लेता है।
विनम्रता
सत्ता जिसके हाथ में आती है वही मदांध होकर बेईमान, दुश्चरित्र और बदनीयत हो जाता है।
चरित्र
एक बार सत्ता मिलने पर उसे किसी मूल्य पर बनाये रखने की आकांक्षा सत्ताधारियों में उत्पन्न हो जाती है।
चरित्र
भाग्य से ज्यादा, समय से पहले वही पाता है जो सन्त के चरणों में माथा झुकाता है।
विनम्रता
सम्मान की आकांक्षा में ही अपमान छुपा है।
विनम्रता
सत्कारपूर्वक स्वीकार किया गया सत्कार ही संतोष उत्पन्न करता है।
विनम्रता
सम्मान उसे ही देना चाहिए जो सम्मान को पचा सके और उतना ही देना चाहिए जिससे उसका अभिमान न जागे और अपना भी सम्मान बना रहे।
विनम्रता
जो अपने गुरुजनों का आदर नहीं करता वह अपना ही अपमान करता है।
विनम्रता
जब गृह पर शत्रु के भी आने पर उसका सम्मान किया जाता है तो फिर महापुरुषों के आने पर उनका सम्मान क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
विनम्रता
आपका अपमान आपके सम्मान की आकांक्षा है।
विनम्रता
जिन लोगों को परामर्श का ज्ञान होता है उनका अपमान मत करो।
विनम्रता
स्वार्थ और अभिमान-इन दो चीजों से स्वभाव बिगड़ता है अतः साधक को स्वार्थ और अभिमान का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
विनम्रता
झुको उनके चरणों में जिन्होंने स्वयं की इन्द्रियों को झुका दिया है।
विनम्रता
उसके आगे हमेशा सिर झुकाओ जिसने तुम्हें सिर उठाना सिखाया है।
विनम्रता
हमारी संस्कृति हाथ मिलाने और हाथ हिलाने की नहीं, अपितु हाथ जोड़ने की है।
विनम्रता
नम्रता की परीक्षा अधिक गुणी या अधिक यश वाले पुरुषों के समागम में होती है।
विनम्रता
सम्मान सुख का साधन नहीं आत्मज्ञान सुख का साधन है।
विनम्रता
जितना प्रयत्न व परिश्रम परद्रव्य के उपार्जन या रक्षण में किया जाता है, उससे भी कम प्रयत्न यदि समता भाव के सम्भालने में किया जावे तो सांसारिक वैभव तो अनायास व अनाकुल सुख की प्राप्ति भी अविलम्ब होगी।
संयम
जो आत्मा जिस भाव रूप परिणमन करता है, वह उस भाव के साथ तन्मय हो जाता है, अतः अर्हन्त के ध्यान में तन्मय आत्मा स्वयं भाव अर्हन्त हो जाता है।
ध्यान
पर द्रव्य का आश्रय कर कुछ भी विचार कर दुःखी हो लो और आगे के लिए कर्म बाँध लो किन्तु परद्रव्य कभी सहायक नहीं होगा, मात्र अपने समता परिणाम का ही विश्वास रखो और समता सुधा का पान कर अमर बनो।
संयम
निरभिमानता की परीक्षा अभिमान या अपमान का निमित्त मिलने पर होती है प्रशंसा के काल में तो सभी नम्र बन जाते हैं।
विनम्रता
जिसने मान का मर्दन कर दिया हो, वही बड़भागी वैय्यावृत्य कर सकता है।
विनम्रता
विनम्रता से हर उम्र में, हर जगह, हर क्षेत्र में इंसान की पहचान बनती है।
विनम्रता
जैसे पृथ्वी समस्त जीवों का आधार है वैसे ही 'विनय' समस्त सद्गुणों का आधार है।
विनम्रता
हे वीतराग! तुम्हारी पूजा करने की अपेक्षा तुम्हारी आज्ञा का पालन करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भक्ति
जिसके पास विनय है, कल्पवृक्ष उसका सेवक है, चिन्तामणि रत्न उसके हाथ में है तथा यश उसके निकट है।
विनम्रता
शोक से बचना है तो शौक करना छोड़ दो। लघुता से प्रभुता प्राप्त होती है।
विनम्रता
महानता अहंकार में नहीं विनय में हुआ करती है। अहं से मौजूद गुण नष्ट हो जाते हैं।
विनम्रता
जीवन में सरलता से बढ़कर सुख नहीं, यदि पलकें झुकाकर जियोगे तो दुनिया पलकें बिछा देगी। दूसरों के प्रति उदारता, अपने प्रति कृपणता रखना ही दयालुता है।
विनम्रता
विनय के बिना विद्या, विज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि गुण भी आदर को प्राप्त नहीं होते हैं।
विनम्रता
जो प्रभु के सामने झुकता है वह सबको अच्छा लगता है लेकिन जो सबके सामने झुकता है, वह प्रभु को अच्छा लगता है।
विनम्रता
जो उलझनें कभी न सुलझें, वे माध्यस्थ भाव से क्षणमात्र में सुलझ जाती हैं।
संयम
जो व्यक्ति जितना गुणवान होता है, वह उतना ही विनय से भरा होता है।
विनम्रता
अहंकार दिखाकर किसी रिश्ते को तोड़ने से अच्छा है कि माफी माँगकर उस रिश्ते को निभाया जाये।
विनम्रता
विनम्रता इंसान को सर्वत्र लोक प्रिय बनाती है शत्रु को मित्र बनाती है।
विनम्रता
विनम्रता वह चीज है जो पहाड़ को भी झुका सकती है, चट्टान को भी रुला सकती है।
विनम्रता
जहाँ से विनम्रता हटती है, वहाँ से सहज ही प्रभु की अनुकम्पा समाप्त हो जाती है।
विनम्रता
विनम्रता संसार सागर से तरने का श्रेष्ठ साधन है।
विनम्रता
विनय से गुरु, सर्व संघ, राजा, परिवार, शत्रु आदि सभी वश में हो जाते हैं।
विनम्रता