Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 29

विनम्रता का द्वार, करे जग से उद्धार

145 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

पाँच मिनट का क्रोध जन्म भर की मित्रता को नष्ट कर देता है।
क्षमा
क्रोधी मनुष्य उन्हें आघात पहुँचाते हैं जो उनके सर्वोत्तम हितैषी होते हैं।
क्षमा
क्रुद्ध होने का अर्थ है दूसरों की गलतियों का स्वयं को दण्ड देना। क्षमा असमर्थ मनुष्यों का गुण तथा समर्थ मनुष्यों का भूषण है।
क्षमा
क्षमा सर्व तपस्याओं का मूल है, क्षमा करना अच्छा है, भूल जाना सर्वोत्तम है।
क्षमा
क्षमा हीन व्यक्ति जो भी पुण्य करता है वह निरर्थक होता है।
क्षमा
दंड देने की शक्ति होने पर भी दंड न देना सच्ची क्षमा है।
क्षमा
क्षमा और उदारता वही सच्ची है, जहाँ स्वार्थ की भी बलि हो।
क्षमा
छोटी नदियाँ शोर करती हैं और बड़ी नदियाँ शान्त चुपचाप बहती हैं।
विनम्रता
क्षुद्र बातें क्षुद्र मन वालों को प्रभावित करती हैं।
मन
दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दें, गाली सहन करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसका पुण्य भी ले लेता है।
क्षमा
बदला लेने का आनन्द तो एक ही दिन का होता है किन्तु क्षमा करने वाले का गौरव सदा स्थिर रहता है।
क्षमा
यदि तुम में प्रहार करने की शक्ति न भी हो तब भी क्रोध से बढ़कर बुरा काम नहीं यदि तुममें शक्ति हो तब भी क्रोध करना बुरा है।
क्षमा
अग्नि उसी को जलाती है जो उसके पास जाता है, परन्तु क्रोधाग्नि सारे कुटुम्ब को जला डालती है।
क्षमा
जो पुरुष नारी को क्षमा नहीं कर सकता, उसे उसके महान् गुणों का उपयोग करने का कभी अवसर प्राप्त नहीं होता है।
क्षमा
ऊँचा उठने के लिए पंखों की जरूरत पक्षियों को होती है इंसानों को नहीं, इंसान तो जितना विनम्रता से झुकता है उतना ही ऊपर उठता जाता है।
विनम्रता
मनुष्य के आचरण से उसके कुल का अनुमान लगता है, उसकी भाषा से उसके मूल देश का परिचय मिलता है और उसके द्वारा किए गए आदर-सत्कार से उसके हृदय की उदारता या कृपणता का अनुमान लग सकता है।
चरित्र
जो मन की मानते हैं वे मानी होते हैं और जो मन को मारते हैं वे ज्ञानी होते हैं।
संयम
ज्ञान वृद्धि के साथ विनम्रता का विकास होना जरूरी है।
विनम्रता
विद्या से विनय आती, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म, धर्म से सुख अतः सुख की प्राप्ति का मूल विनय है।
विनम्रता
जिन्दगी में अपने से बड़ों को प्रणाम करना सीखिए। कहा जाता है कि प्रणाम परिणाम बदल देता है।
विनम्रता
जो दूसरों से सम्मान नहीं चाहते और स्वयं ही दूसरों को सम्मान देते हैं तथा सम्माननीय पुरुषों को नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटों से पार हो जाते हैं।
विनम्रता
नम्र व्यवहार सबके लिए अच्छा है पर धनवान की नम्रता अमूल्य धन है।
विनम्रता
दुःख और हानि सहने के बाद आदमी अधिक नम्र और ज्ञानी होता है।
विनम्रता
अधम मनुष्य धन चाहते हैं, मध्यम वर्ग के लोग धन और मान दोनों चाहते हैं किन्तु उत्तम वर्ग के लोग केवल मान चाहते हैं क्योंकि मान ही सब धन से बड़ा है।
चरित्र
जहाँ नम्रता से काम चल जाय वहाँ उग्रता नहीं दिखानी चाहिए।
विनम्रता
आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी इसलिए अच्छे बनो पर अच्छाई का अभिमान मत करो।
विनम्रता
जो व्यक्ति अभिमान में चूर रहता है, धर्म उससे उतना ही दूर रहता है।
विनम्रता
बल का घमंड करने से मनुष्य दुर्बल और धन का घमंड करने से दास बनता है।
विनम्रता
सन्तों के चरण छूने से पुण्य मिलता है और उनके आचरण को छूने से परमात्मा मिलता है।
भक्ति
विनयी व्यक्ति सर्वत्र आदर-सम्मान पाता है और मरने के बाद देवेन्द्र, चक्रवर्ती, मण्डलीक, राजा-महाराजा आदि बनकर फिर मोक्ष पाता है।
विनम्रता
प्रेम, विनम्रता व अहिंसा से किसी का भी मन जीता जा सकता है।
विनम्रता
सम्मान ही सद्गुणों का प्रेरणास्पद पुरस्कार है।
चरित्र
आत्मरक्षा के साथ दूसरों को सम्मान दीजिए और विवाद से दूर रहिये।
विनम्रता
व्यक्ति को अपने पूज्यों (माता-पिता-गुरु आदि) के लिए खड़े होकर नमस्कार करना चाहिए बैठकर नहीं।
विनम्रता
अत्यन्त क्रोध की अवस्था में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लंघन और अपमान नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
अपनी बुद्धि का अभिमान ही शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अंतःकरण में टिकने नहीं देता है।
विनम्रता
जब तक स्वार्थ और अभिमान हैं, तब तक किसी के भी साथ प्रेम नहीं हो सकता है।
विनम्रता
अहंकार की कार में बैठकर अधोलोक की यात्रा नहीं, विनय के विमान में बैठकर ऊर्ध्व लोक की यात्रा करो।
विनम्रता
अहंकार को तोड़ने का तरीका है-झुकना सीखो।
विनम्रता
अहंकार उत्थान के नहीं, पतन के मार्ग खोलता है।
विनम्रता
अहम् से बढ़कर पाप नहीं, रहम से बढ़कर धर्म नहीं।
विनम्रता
अभिमान से देव दानव बन जाता है, विनम्रता से दानव भी देव बन जाता है।
विनम्रता
दूसरों को कमजोर अपने को बड़ा समझने वाला कालांतर में खजूर का वृक्ष बनता है।
विनम्रता
आदमी बड़ा विचित्र है, पकड़ता है अहंकार को और पाना चाहता है आनन्द को।
विनम्रता
अहंकारी को आध्यात्मिक आनन्द की अनुभूति कदापि नहीं हो सकती है।
विनम्रता
अभिमान ही पराभव का द्वार है।
विनम्रता
नाश के पूर्व मनुष्य अहंकारी हो जाता है किन्तु नम्रता सदैव मनुष्य को सम्मान प्रदान करती है।
विनम्रता
अहंकार करना मूर्खों का काम है।
विनम्रता
अहंकार एक ही सुख जानता है दूसरों को नीचा दिखाने का।
विनम्रता
अहंकार चाहता है कि सब मुझे ध्यान दें और मैं सबकी उपेक्षा करूँ।
विनम्रता
अहंकारी व्यक्ति से बड़ा दीन व्यक्ति खोजना असंभव है।
विनम्रता
जिस प्रकार पत्थर पर फूलों के पौधे नहीं उगते, उसी प्रकार अहंकारी के आचरण से सदाचार का पौधा अंकुरित नहीं होता है।
विनम्रता
अहंकार का गिरना ही आत्म साक्षात्कार है।
विनम्रता
ब्राह्मणों के क्रोध को दान से, वैश्यों के क्रोध को मीठे वचनों से, क्षत्रिय के क्रोध को आदर सम्मान से, शूद्र के क्रोध को शक्ति से व गुरुजनों के क्रोध को प्रणाम करके शान्त करना चाहिए।
क्षमा
मनुष्य जितना अहंकारी होगा, उसका व्यक्तित्व उतना ही घटिया होगा।
विनम्रता
परमात्मा झगड़ने से नहीं झुकने से मिलते हैं, अकड़ने से नहीं सिकुड़ने से मिलते हैं।
विनम्रता
अहंकार को जीतने के लिए हमेशा अपने अतीत और औकात को याद रखें।
विनम्रता
अहंकारी व्यक्ति मिट सकता है, पिट सकता है, लुट सकता है लेकिन झुक नहीं सकता है जबकि झुके बिना कभी झोली भरती ही नहीं है।
विनम्रता
गुरुजनों के क्रोधित होने पर जवाब न देना और उनकी सेवा-शुश्रुषा करना उनके क्रोध शान्ति की औषधि है।
विनम्रता
नम्रता व्रतों की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है।
विनम्रता