Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 27

दुर्लभ गुण उपकार और कृतज्ञता

34 सूत्र

मजाक चतुराई से किया गया अपमान है।
वाणी
मानव के अंदर जो कुछ सर्वोत्तम है, उसका विकास प्रशंसा तथा प्रोत्साहन के द्वारा किया जा सकता है।
चरित्र
जो व्यक्ति प्रसन्न स्वभाव का होता है वह निश्चय ही किसी भी कठिन से कठिन कार्य को सफलतापूर्वक करके संतोषप्रद परिणाम ले सकता है। एक प्रसन्न चित्त युवक जीवन के अभिशाप को वरदान में बदल सकता है।
संतोष
चित्त प्रसन्न रहने से मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं एवं बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है।
संतोष
मुस्कुराओ! गुलाब काँटों में मुस्कुराता है, आप भी प्रतिकूलता में मुस्कुराओ तो लोग आपसे गुलाब की तरह प्रेम करेंगे। जीवन में सुख आये तो हँस लेना और दुःख आये तो उसे हँसकर उड़ा देना।
संतोष
यदि आप अपने ज्ञान को बहुमूल्य तथा उपयोगी बनाना चाहते हैं तो अपनी बुद्धि का द्वार प्रसन्नता से खोल दीजिए।
ज्ञान
सौ वर्ष जीने के लिए अपने चारों और जवान और हँसमुख मित्रों का समूह रखो।
संगति
तुम हँसोगे तो संसार हँस पड़ेगा किन्तु रोते समय तुम्हें अकेले ही रोना पड़ेगा।
संतोष
उन्मुक्त अट्टहास नई प्रेरणा, स्फूर्ति और विचारों का स्रोत है। जिस प्रकार वनस्पतियों के लिए खुली धूप की जरूरत होती है उसी प्रकार मनुष्य के लिए हँसना टॉनिक का काम करता है। मुख मण्डल हृदय का दर्पण है।
स्वास्थ्य
जो समयानुसार धर्म, अर्थ, काम का सेवन करता है, वह इस लोक व परलोक में भी धर्म अर्थ और काम को प्राप्त होता है।
धर्म
ज्यादा से ज्यादा लोगों की सुनें लेकिन बात उन्हीं लोगों से करे जिनकी सोच आपकी सोच से मिलती है।
संगति
ज्ञान को अपना गुरु बनाओ गरूर अर्थात् अहंकार का कारण नहीं बनाओ।
ज्ञान
पशुओं के लिए माता दुग्धपान तक ही माता रहती है, अधम व्यक्तियों के लिए विवाह पर्यन्त तथा मध्यम व्यक्तियों को गृह कार्य देखभाल करने तक माता रहती है, उत्तम व्यक्तियों को तो माता जीवनपर्यन्त तीर्थ के समान रहती है।
परिवार
पुत्र पिता के सामने भूमि पर बैठा हुआ जैसा अच्छा लगता है वैसा सिंहासन पर नहीं। पुत्र को पिता के चरण दबाने में जो सुख मिलता है, वह राज्य पर शासन करने में नहीं। उसे पिता की जूठन खाने में जो सुख मिलता है, वह तीनों लोकों को भोगने में नहीं।
परिवार
अपने साथ की गई बुराई बालू पर और की गई भलाई पत्थर पर लिखना चाहिए।
क्षमा
सज्जन कभी उपकार भूलते नहीं और दुर्जन कभी उपकार मानते नहीं।
चरित्र
माँ का कर्ज आदमी सात जन्मों तक नहीं उतार सकता है और गुरु का कर्ज अनेक जन्मों तक नहीं उतारा जा सकता है।
परिवार
जब तक दूसरों का कर्ज चुका नहीं दिया जाता तब तक हम सदाचारी कभी नहीं कहला सकते हैं और हमें स्वर्ग में प्रवेश भी नहीं मिल सकता है।
चरित्र
भावना से कर्त्तव्य ऊँचा होता है।
चरित्र
कृतज्ञता एक कर्तव्य है जिसे लौटाना चाहिए।
चरित्र
दया और कृतज्ञता उदारता के सहायक हैं।
चरित्र
ज्ञानी पद ग्रहण करते समय रोता है और अज्ञानी पद ग्रहण करते समय हँसता है।
ज्ञान
माता-पिता का ऋण सन्तान जीवन भर नहीं चुका सकती है।
परिवार
माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़कर आप अपने घर से भगवान् को निकाल देते हैं।
परिवार
कोई भी अपराध माफ किया जा सकता है, लेकिन राष्ट्रद्रोह नहीं।
विविध
उत्तरदायित्व से महान् बल प्राप्त होता है, जहाँ कहीं उत्तरदायित्व होता है वहीं विकास होता है।
चरित्र
जिससे एक अक्षर भी सीखा हो, उसका आदर करो।
भक्ति
जिन्होंने आपको संकट काल में सहारा दिया उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहो।
चरित्र
पहली सीढ़ी से चढ़कर ही मानव अन्तिम सीढ़ी पर पहुँचता है अतः पहली सीढ़ी को कभी मत भूलो और पहली सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति का साहस बढ़ाओ, तिरस्कार मत करो।
विनम्रता
संसार में दो व्यक्ति दुर्लभ हैं, उपकारी और कृतज्ञ।
चरित्र
कृतघ्न शिष्य गुरु का उपकार नहीं मानते और संसार वृद्धि करते हैं।
चरित्र
आप प्रतिदिन कृतज्ञता की प्रवृति को विकसित करें।
चरित्र
माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है और पिता का गौरव आकाश से भी ऊँचा है।
परिवार
कृतज्ञता की सीमा किए हुए उपकार पर अवलम्बित नहीं है उसका मूल्य उपकृत व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर है।
चरित्र