Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 13

गरीब रोटी को और अमीर भूख को ढूढ़ता

41 सूत्र

चंचल मन वाली स्त्री, मद्यपान और जुआ, ये उन्हीं लोगों के लिए आनन्दवर्द्धक हैं, जिन्हें भाग्य-लक्ष्मी छोड़ देती है।
Misc.
जो विषयों में फँसा है, वही असमर्थ है।
अनासक्ति
विषय-वासनाएँ व्यक्ति को अंधा बनाती हैं।
अनासक्ति
योगी की बाहर की आँखें बंद होती हैं और अंदर की खुलती हैं किन्तु भोगी की बाहर की आँखें खुलती हैं अंदर की बंद हो जाती हैं।
अनासक्ति
विचार और वासना का कोलाहल ही अन्दर की आवाज को नहीं सुनने देता है।
मन
मनुष्य धन के अभाव में इतना कष्ट नहीं पाता, जितना अपने फिजूल खर्चों के कारण कष्ट पाता है।
धन
वासनाओं का त्याग करो, चिंताएँ स्वयं पीछा छोड़ देंगी।
अनासक्ति
संसार दुःख का कारण नहीं संसार के प्रति आसक्ति दुःख का कारण है।
अनासक्ति
यह दुनिया एक सुसज्जित नवयुवती के समान है जो प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अनासक्ति
जो व्यक्ति दरिद्र होकर भी इन्द्रियजन्य सुखों की कामना करता है वह निन्द्य या पशु तुल्य है।
अनासक्ति
आज भूखे पेट वाले ज्यादा पाप नहीं करते बल्कि भरे पेट वाले ज्यादा पाप करते हैं।
कर्म
पाप पहले तो बहुत मजा देता है, फिर जिंदगी भर सजा देता है।
कर्म
छिपकर किया गया पाप जीवन भर काँटे की तरह चुभता रहता है।
कर्म
उसी की बुद्धि ठीक अथवा स्थिर रह सकती है, जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हों। भोग भोगने से नहीं रोकने से शान्त होते हैं।
संयम
भोगों में लिप्त रहने वाला कभी सचेत नहीं होता है।
अनासक्ति
जितना भोग करना बुरा नहीं है, उतना वर्जित भोग का चिन्तन करना बुरा है।
संयम
'दूषित मस्तिष्क' जीना दूभर कर देता है।
मन
योगी के द्वारा सबको सुख मिलता है और भोगी के द्वारा सबको दुःख मिलता है।
अनासक्ति
भगवान् को अपना मानना योग है और भगवान् से कुछ चाहना भोग है।
भक्ति
विषयों को मन में घुमाना ही कुमार्ग है।
मन
भोग ही रोग के कारण हैं–अति भोग अर्थात् अति रोग।
स्वास्थ्य
नाग के द्वारा आधा निगले जाने पर भी मेंढ़क मक्खियों को खाता रहता है, उसी तरह तृष्णांध पुरुष अवस्था के ढल जाने पर भी विषय-सेवन करता रहता है।
अनासक्ति
वासनाएँ आदमी को बदसूरत और सरलता आदमी को सुन्दर बना देती है।
चरित्र
विषयभोग में रमने वाला आत्मसुख माँगेगा भी तो नहीं मिलेगा।
अनासक्ति
विषय भोग दिखते तो सरल हैं परन्तु पड़ते बहुत मँहगे हैं।
अनासक्ति
तामसिक अन्न खाने वाले व्यक्ति की सन्तान दुर्गुणों का भंडार होती है।
आहार
व्रत से विकास व वासना से विनाश होता है।
संयम
यदि आपको शान्ति चाहिए हो तो वासना से मुक्त होना चाहिए।
अनासक्ति
किसी भी भोग को भोगों, अन्त में उस भोग से अरुचि अवश्य होती है यह नियम है, परन्तु मनुष्य भूल यह करता है कि वह उस अरुचि को महत्त्व देकर उसको स्थायी नहीं बनाता है।
अनासक्ति
लोगों में भोग और संग्रह की वृत्ति अधिक होने से ही अकाल पड़ता है।
अनासक्ति
हम जिससे सुख लेंगे उसका दास होना ही पड़ेगा, सुख का भोगी कभी स्वाधीन नहीं हो सकता है। सोचो! इतनी धन सामग्री भोग पाओगे या नहीं क्योंकि साथ ले जाने की व्यवस्था नहीं है।
अनासक्ति
साधना में जीने वाला नहीं अपितु साधन में जीने वाला अन्तिम समय में सोचता है अब क्या होगा? जीभ के स्वाद के लिए ही व्यक्ति सारे पाप करता है।
अनासक्ति
सुख भोग की लालसा आत्म सम्मान का सर्वनाश कर देती है।
अनासक्ति
भोगों को नहीं भोगा हम ही भोगे गये, तप नहीं तपा गया हम ही तप्त हो गये, काल नहीं बीता हम ही बीत गये तृष्णा जीर्ण नहीं हुई हम ही जीर्ण हो गये।
अनासक्ति
विषय तो विष्ठाभोगी सूकर-कूकर को भी मिल जाते हैं अतः आत्महित में लगें।
अनासक्ति
आपके पास जो कुछ है उसका मजा उठाएँ, उसके स्वाद को यह कहकर खराब न करें कि मेरे पास वह नहीं है। आनंद निज के सुधार में है 'पर' में नहीं।
संतोष
निर्माल्य भोग करने वाला संतान हीन, सम्पत्ति हीन, सुख हीन होता है।
Misc.
इस जीव ने नरकों में महादुःख भोगे हैं, यदि उनका स्मरण हो जाये तो कौन भोगों की इच्छा करेगा?
अनासक्ति
भोगों की भट्टी में अनंत भव भस्म हो चुके हैं। ''मदन का दमन तन से नहीं मन से करें'' तिल के बराबर जमीकन्द में अनन्त जीव होते हैं, जमीकन्द खाने से मिथ्यादृष्टि जीवों द्वारा वे सब जीव खा लिए जाते हैं।
आहार
व्याघ्र, चोर, शत्रु, सर्प, अग्नि, तीव्र रोग और विष एक ही भव में दुःख देते हैं परन्तु भोग असंख्यात भवों में दुःख देते हैं।
अनासक्ति
जो भोगों को तो छोड़ता नहीं है मात्र मुनि मुद्रा को ग्रहण करता है, उसका तप और ध्यान, मौन आदिक सभी श्रम व्यर्थ हैं।
धर्म