Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Time

समय

176 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

आलसी सोचता है कर लेंगे कर लेंगे कर लेंगे, इस चिन्ता में मर जाएंगे, मर जाएंगे, मर जाएंगे यह भूल ही जाता हैं।
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घड़ी न राव को जाने, घड़ी न रङ्क गिनती है। घड़ी के सामने चलती किसी की भी न विनती है। करोडों में नहीं चूके, घड़ी का वो निशाना है। घड़ी तो हर घड़ी बदले, घड़ी का क्या ठिकाना है।
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बीतने वाली घड़ी को कौन लौटा पायेगा, इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जायेगा। जिन्दगी भर का कमाया साथ में क्या जायेगा, यह सुअवसर खो दिया तो अन्त में पछतायेगा।।
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काका घड़ी न खोइए गई घड़ी नही आय, यह सोने की है घड़ी सोने में नहीं जाय। सोने में नहीं जाय घड़ी का नहीं ठिकाना, घड़ी-घड़ी में घड़ी बदलती किसने जाना। कह काका समझाए घड़ी मत छोड़ो खाली, घड़ी-घड़ी में घड़ी आ रही जाने वाली।। घड़ी नहीं ठहरात घड़ी मत व्यर्थ निकारो, घड़ी-घड़ी में घड़ी आ रही ये ही विचारो। कह काका कवि जैन घड़ी का सही निशाना, किसकी कब आ जाए घड़ी का कौन ठिकाना।।
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बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणी रत रह्यो। अर्ध मृतक सम बूढ़ा पनो, कैसे रूप लखे आपनो।।
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तप करते यौवन गयो, द्रव्यगयो मुनि दान। प्राण गये सन्यास में, तीनो गये न जान॥
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मनुष्य की उम्र चालीस वर्ष (बाल कहानी)- ब्रह्माजी ने मनुष्य, कुत्ता, गधा और उल्लू इनको चालीस-चालीस वर्ष की उम्र दी, मनुष्य ने अपना काम पूछा, कि हमें क्या करना है? ब्रह्माजी ने बताया तो मनुष्य ने कहा, बहुत कम उम्र है, गधे ने कहा हम कब तक भार ढ़ोते रहेंगे। कुत्ते ने कहा हम कब तक द्वारे-द्वारे जाकर अपमानित होकर टुकड़े खाते रहेंगे, उल्लू ने कहा हम कब तक अन्धे बनकर जियेंगे, तब इन जीवों की आधी-आधी उम्र लेकर मनुष्य को दे दी, इसलिए मनुष्य चालीस वर्ष के बाद गधे की तरह भार ढ़ोता रहता है, साठ वर्ष के बाद कुत्ते की तरह द्वार पर बैठा रहता है और अस्सी के बाद उल्लू की तरह अन्धा बनकर बैठा रहता है।
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तीनों अवस्था व्यर्थ खो दीं- एकगरीब व्यक्ति पर प्रसन्न होकर राजा ने उसे तीन घण्टे के लिए रत्नों के कोठे में प्रवेश दे दिया, इतने समय में तुम जितने रत्न ले जाना चाहो ले जाओ, इसके बाद उस कोठे से एक भी रत्न नहीं ले सकते, उस मूढ़ ने रत्नमयी गोरख धन्धे का खिलौना देखा, हाँथ लगाते ही वह बिखर गया, द्वारपाल ने कहा इसको ठीक करो, तभी आगे जा सकते हो, उसने उसे ठीक करने में ही सारा समय निकाल दिया, एक भी रत्न नहीं ले पाया, द्वारपाल ने पकड़कर बाहर कर दिया। कृपालु राजा ने दुबारा उसे तीनघण्टे के लिए सोने, चाँदी, के कोठे में भेजा वहाँ पर स्त्रियाँ स्वागत के लिए खड़ीं थी, उनके स्वागत में वह भूल गया और सोने-चाँदी का कुछ भी सामान नहीं ले पाया, अन्त में राजा ने पीतल-ताम्बे के कोठे में भेजा, वहाँ पर भोजन-पानी रखा था, वह खा पीकर सो गया और सारा समय खत्म कर दिया और खाली हाथ घर गया, इसी तरह मानव बाल अवस्था खेल-खिलौनों में, जवानी भोगों में, बुढापा खा-पी कर सोने में गुजार देता है और मानव पर्याय में कुछ भी आत्महित नहीं करता है।
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भीम ने नगाड़ा पीटा- एक याचक ने धर्मराज से कुछ याचना की, धर्मराज ने कल के लिये कहा भीम ने सुना भैया ने काल को जीत लिया,तो नगाड़ा पीट दिया, इसलिये अच्छे कार्य आज ही करना चाहिये।
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जो दिन कटे सोई, आयु में अवश घटे। बूँद बूँद बीते जैसे, अञ्जुलि को जल है। देह नित छीन होत, नैन तेज हीन होत। जोवन मलीन होत, छीन होत बल है।। आवे जरा नेरी तवे, आतङ्क अहेरी आवे। परभव नजीक जात, नरभव विफल है। मिल के मिलापी जन, पूँछत कुशल मेरी। ऐसी दशा माहीं मित्र, काहे की कुशल है।।
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उक्त आठ अन्तर मार्गणाओं का उत्कृष्ट काल क्रम से सात दिन, छ: महिना, पृथक्त्व वर्ष, पृथक्त्व वर्ष, बारह मुहूर्त और अन्त की तीनमार्गणाओं का काल पल्य के असंख्यातवें भाग है और जघन्य काल सबका एक समय है।
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द्रव्यपरावर्तन- लवणसमुद्र का विस्तार दो लाख योजन है, उसमें पूर्व दिशा से जुँआरी और पश्चिम से सेल डाला जाए, लहराते-लहराते जब सेल जुँआरी के छेद में घुस जाये, उतने काल को द्रव्य परावर्तन कहते हैं।
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वृक्ष की राख उड़ जाये, पुन: उसी स्थान पर वृक्ष बनने में जितना समय लगे, वह एक द्रव्यपरावर्तन कहलाता है।
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सत्तर लाख छप्पन हजार वर्षों का एक पूर्व होता है।
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सुमेरु पर्वत को चिड़िया चोंच से घिसकर जाय, सौ-सौ वर्ष बाद पुन: आवे, जितने समय में पूरा सुमेरु पर्वत घिस जाय उतना बड़ा एक सागर कहलाता है।
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दुषमादुषमा काल के अन्त में ज्येष्ठ कृष्ण पञ्चमी से आषाण शुक्ल पूर्णिमा तक कुवृष्टि होती है तथा सुषमासुषमा काल के प्रारम्भ में श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी तक शुभ वर्षा होती है।
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जिनसेनाचार्य के मत से एक सौ अड़तालीस कल्पकाल के बाद हुण्डावसर्पिणी काल आता है, अन्य आचार्यों के मत से असंख्यात कल्पकाल के बाद हुण्डावसर्पिणी काल आता है।
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अवसर्पिणी में समुद्र नीचे जाता है, उत्सर्पिणी में समुद्र ऊपर बढ़ता है, इससे सिद्ध है कि क्षेत्र की भी हानि वृद्धि होती है।
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पञ्चमकाल के तीन वर्ष, साढ़े आठ माह शेष रहने पर कार्तिक वदी अमावस्या को प्रातः स्वाति नक्षत्र में मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका चारों एक साथ स्वर्ग जायेंगे।
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चैत्र मास- ना हो दीक्षा प्रयास-चैत्र में दीक्षा स्वीकार करना बहुत दुःख रूप फल को देने वाला है, वैशाख में रत्नलाभ, ज्येष्ठ में मरण, आषाढ़ में बन्धुनाश, श्रावण में शुभदायक, भाद्रपद में प्रजाहानि, आश्विन में सर्वत्र सुख, कार्तिक में धनवृद्धि, मार्गशीर्ष में शुभदायक, पौष में ज्ञानहानि, माघ में बुद्धि की वृद्धि और फाल्गुन में सर्वत्र सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मासों में दीक्षा लेने का शुभ-अशुभ फल कहा है।
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विशुद्ध परिणाम वाले क्षपक की आलोचना आदि प्रशस्त क्षेत्र में दिन के पूर्व या उत्तरभाग में शुभतिथि शुभ नक्षत्र और शुभ समय में होती है।
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मन, विवेक, आचार, कुलीनता, दृष्टि, लज्जा आदि समस्त गुण वृद्धावस्था में नष्ट हो जाते हैं।
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जिसमें हड्डियों के टुकड़े पड़े हैं ऐसे चाण्डाल के कुंए को छोड़कर स्त्रियाँ जैसे दूर चली जाती हैं वैसे ही अनादर के अत्यधिक स्थानभूत पुरुषों के बालों की सफेदी को देख तरुण स्त्रियाँ शीघ्र ही दूर चली जाती हैं।
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शरीर सिकुड़ गया, गति नष्ट हो गई, दाँत गिर गये, दृष्टि चली गई, अन्धेरी बढ़ने लगी, मुख लार से भर गया, बाँधव जन कहा नहीं मानते और स्त्री सेवा नहीं करना चाहती, हाय बड़े कष्ट की बात है कि बुढ़ापे के कारण वृद्ध मनुष्य का पुत्र भी उसके शत्रु के समान हो जाता है।
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बुढ़ापा राजा, मन्त्री, वैद्य और तपस्वी साधुओं को अलङ्कृत करता है और वेश्या, पहलवान तथा गायक की प्रभुता को समाप्त कर देता है।
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चार पहर-शाम छः बजे से नौ बजे तक रौद्र पहर, नौ बजे से बारह बजे तक राक्षस पहर, बारह बजे से तीन बजे तक गन्धर्व पहर, तीन बजे से छः बजे तक मनोहर पहर कहलाता है।
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