Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 4 / 9

परिग्रह की मूर्छा रखकर अपनी यात्रा सफल करने का संतोष लाना सर्प आदि जन्तुओं को पालकर सुरक्षित रहने की कल्पना है।
अनासक्ति
पर पदार्थ से अपने को सशरण मानना, अपने को अशरण करना है।
अनासक्ति
प्रत्येक मनुष्य प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर अग्रसर होता है जैसे राग के बाद विराग, लोभ के बाद शौच, संग्रह के बाद त्याग, काम के बाद निष्काम, श्रम के बाद विश्राम, भोग के बाद योग।
अनासक्ति
धन से भी बड़ा पाप है अधिकार का लोभ, इसी के कारण मनुष्य स्वयं को खो बैठता है।
अनासक्ति
जो सदा हमारे साथ नहीं रहेगा और हम सदा जिसके साथ नहीं रहेंगे, उसको प्राप्त करने की इच्छा करना अथवा उससे सुख लेना मूर्खता है, पतन का कारण है।
अनासक्ति
प्रशंसा मुक्ति नहीं बंधन है।
अनासक्ति
ख्याति की चाह न करने वाला ही सच्चा अध्यात्म योगी व सुखी होता है।
अनासक्ति
इनका मुझ पर बड़ा स्नेह है, यह सोचना भ्रम है यदि परीक्षा करनी हो तो उनके प्रतिकूल होकर देख लीजिए।
अनासक्ति
आदत कभी भी अच्छी या बुरी नहीं होती, आदत सर्व बुद्धिमान इंसान को वश में कर लेती है। किसी चीज को पकड़ के बैठे रहना अपनी साँस रोकने के समान है।
अनासक्ति
वियोग संयोग का फल है अतः दुःख का मूल संयोग ही है इसलिए वियोग में दुःख न चाहने वाले संयोग में सुख न मानें।
अनासक्ति
किसी के गुजर जाने से किसी का गुजारा नहीं रुकता है।
अनासक्ति
राग में अवगुण दिखाई नहीं देते हैं, द्वेष में गुण दिखाई नहीं देते हैं।
अनासक्ति
यदि दुःख नहि चाहते तो संसार से सुख मत चाहो।
अनासक्ति
स्नेह रहित मनुष्य सुखी होता है और स्नेह सहित दुःखी होता है क्योंकि जैसे बालू को कोई नहीं पेलता परन्तु तेल सहित तिल को घानी में पेला जाता है।
अनासक्ति
संसार असत्य हो या सत्य पर उससे हमारा सम्बन्ध निःसंदेह असत्य है।
अनासक्ति
लोभ से बुद्धि नष्ट होती है, बुद्धि नष्ट होने से लज्जा नष्ट होती है लज्जा नष्ट होने से धर्म तथा धर्म नष्ट होने से धन और सुख नष्ट हो जाता है।
अनासक्ति
इस भीषण संसार में एक प्रेम करने वाले हृदय को खो देना सबसे बड़ी हानि है।
अनासक्ति
स्नेह को खोकर वस्तु को पा लेना, पाना नहीं गँवाना है।
अनासक्ति
संसार, शरीर, भोगों से उदासीनता ही संन्यास कहलाता है।
अनासक्ति
रावण जैसे महाज्ञानी भी स्त्री के रूप आदि से मोहित होकर अपना विवेक खो गये थे।
अनासक्ति
मुमुक्षु विषयों की अभिलाषा को दावानल से भी अधिक कष्टप्रद मानता है।
अनासक्ति
तुम किसी भी जगह होओ, किसी भी स्थिति में होओ, सदा अपना अकेलापन दृष्टि में रखो, इससे बड़ा बल प्रकट होगा।
अनासक्ति
आसक्ति से किए हुए शुद्ध काम में भी दाँव-पेंच आते ही हैं।
अनासक्ति
जिस पद्धति में अब तक रहते आए उस पद्धति में शान्त तो हो नहीं सके, फिर इन संस्कारों को छोड़ो अलौकिक वृत्ति धारण करो, दुनिया से अपरिचित रहो, अकेलापन अनुभव करने वाला शान्त और सुखी रहता है।
अनासक्ति
वैराग्य भावनाएँ माँ के समान जीव की रक्षा करती हैं।
अनासक्ति
त्याग वेष की ओर तुम्हारा पुरुषार्थ शान्ति के लिए था। इस समय कहाँ हो? विचार करो और सर्व पुरुषार्थ से अपने उद्देश्य पर पहुँचो।
अनासक्ति
आप किस-किस को हटाओगे? किस-किस को घर से निकालोगे? इसलिए स्वयं निकल जाओ।
अनासक्ति
स्वयं हटना बहुत सरल है इसलिए साधु संसार को नहीं हटाता स्वयं हट जाता है।
अनासक्ति
तरह-तरह की अभिलाषाएँ करते-करते ही सारी आयु बीत गई पर हाय! अब तक वह कुछ नहीं कर सका जो सत्पुरुषों के द्वारा स्मरण करने योग्य शेष रहता।
अनासक्ति
सैकड़ों आज्ञाओं से मनुष्य उतनी तत्परता से प्रवृत्त नहीं होता जितना लोभ से कार्य करता है।
अनासक्ति
विषयों की उम्र होती है कषायों की उम्र नहीं होती है अर्थात् विषय थोड़ी देर भोगे जाते, कषाय लम्बे समय तक माँगती रहती।
अनासक्ति
स्वार्थ ही नर्क बनाता है।
अनासक्ति
परिचय, परिणय और परिग्रह परमात्मा प्राप्ति में सबसे अधिक बाधक हैं।
अनासक्ति
जिन–जिन वस्तुओं को हम अपनी मानते हैं, उन–उन वस्तुओं के हम पराधीन हो जाते हैं, पराधीन व्यक्ति को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है–''पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।''
अनासक्ति
भौतिक धन तो किसका नश्वर नहीं है? अर्थात् सभी का नश्वर होता है।
अनासक्ति
परमात्मा प्राप्ति की उत्कृष्ट अभिलाषा न होने में खास कारण है–सांसारिक सुख की इच्छा, आशा और भोग।
अनासक्ति
आज का आदमी घर में टीवी सेट, सोफा सेट, डायमण्ड सेट, डिनरसेट आदि रखने के कारण इनके मेनेजमेन्ट में स्वयं अपसेट हो गया है।
अनासक्ति
जो वीतरागी होते हैं उन्हें शरीर और जो रागी होते हैं उन्हें आत्मा नहीं दिखती है।
अनासक्ति
स्वार्थ जितना सांसारिक होगा, उतना ही वह दुःख, संताप, शोक, विषाद तथा भय उत्पन्न करेगा।
अनासक्ति
जैसे धनी पुरुष पास में रखे हुए स्वर्ण में बढ़ा भाव सुनने के बाद घटता भाव सुनने पर, कुछ खर्च खराबी न होने पर भी दुःखी होता है, इसी प्रकार वास्तविक वैराग्य शून्य, ज्ञानी व त्यागी पुरुष प्राप्त ज्ञान व त्याग में बढ़े सम्मान की स्वीकारता कर चुकने के बाद सम्मान न होने पर, किसी के द्वारा कुछ हानि वा क्लेश नहीं दिये जाने पर भी दुःखी होता है अस्तु, उसके दुःख में उसकी ही तो मूल में भूल है।
अनासक्ति
जीवन ऐसा कुछ नहीं है जिसके प्रति गंभीर रहा जाए जीवन तुम्हारे हाथों में खेलने के लिए एक गेंद है। गेंद पकड़े मत रहें।
अनासक्ति
द्वन्द, दुःख संताप, विभाव, विपदा आदि सभी अनिष्ट बातें संयोग में है, अकेले रहने से तो उन सब अनिष्टों का सर्वथा अभाव हो जाता है, परन्तु मोही जीव संयोग को इष्ट मानता है।
अनासक्ति
संयोग आत्महित का नियत साधक नहीं है क्योंकि कर्म के संयोग से संसार के दुःख मिलते हैं, शरीर के संयोग से भूख-प्यास आदि के दुःख मिलते हैं, परिवार के संयोग से चिन्ता परिश्रम के दुःख मिलते हैं। संयोग सुख की चीज नहीं है, बल्कि क्लेशों का पिता है।
अनासक्ति
केवल उन्हीं का कार्य धन्य है, जो अहंकार-ममकार से दूर हैं बाकी सब समय बिता रहे हैं।
अनासक्ति
रागादि की हीनता से ही कल्याण है।
अनासक्ति
सदा किसी के साथ रहने या किसी को साथ रखने का नियमबद्ध वचन नहीं देना क्योंकि परिणाम परिवर्तनशील होते हैं।
अनासक्ति
जो भोगी होता है उसी की दृष्टि में परिस्थिति सुखदायी और दुःखदायी होती है, योगी की दृष्टि में परिस्थिति दो तरह की नहीं होती है।
अनासक्ति
कामी को माँ से नहीं स्त्री से और मिथ्यादृष्टि को धर्म से नहीं धन से प्रेम होता है।
अनासक्ति
चेहरा आपके अन्तःकरण के भावों को बता देता है। वैरागी का चेहरा अलग, कामी का अलग और रागी का चेहरा अलग दिखता है जन्म लेना और देना पशु भी जानते हैं, पर इनके चक्र से छूटना केवल मनुष्य ही जानता है।
अनासक्ति
यदि आपने ख्याति चाही तो नामकर्म की प्रकृति को ही माँगा अतः आप मुमुक्षु नहीं हैं।
अनासक्ति
जैसे मधुर दूध को नींबू की बूँद खराब कर देती है, वैसे ही भगवान् आत्मा को भोगों की बूँद विकृत कर देती है।
अनासक्ति
जो दारिद्र से पीड़ित होकर भी कभी विषयासक्ति को छोड़ने में समर्थ नहीं हैं, वे अधम हैं।
अनासक्ति
प्रसिद्धि चाहने वाले की आत्मसिद्धि नहीं हो सकती है।
अनासक्ति
प्रशंसा का रस परमात्मा के रसपान में साधक नहीं बाधक है।
अनासक्ति
इतिहास साक्षी है कि आज तक जितने महापुरुष उपहास को प्राप्त हुए हैं, वे सब धन, धरती और स्त्री के कारण पवित्र यश पताका को नष्ट करके गये हैं।
अनासक्ति
वैराग्य तपस्वी का आभूषण है।
अनासक्ति
जमीन, स्त्री, स्वर्ण, सम्पत्ति आदि के लोभ रूपी सर्प को ज्ञान वैराग्य रूपी औषधि और मंत्र से वश में किया जा सकता है।
अनासक्ति
हर रिश्ते की हकीकत दिखाकर खुदा बन्दे से पूछता है बता मेरे सिवा कौन है तेरा।
अनासक्ति
अनादर के अत्यधिक स्थानभूत पुरुषों के बालों की सफेदी को देखकर तरुण स्त्रियाँ शीघ्र ही दूर चली जाती हैं।
अनासक्ति
विषयी जीव पहले प्राप्ति की आकांक्षा में दुःखी होता है फिर सेवन करने के बाद तृप्ति न होने से दुःखी फिर विषयों के अन्तरंग से छूट न पाने से दुःखी, फिर विषयों के सेवन के पाप के पश्चाताप में दुःखी होता है।
अनासक्ति
यह आयु 'वायु' के समान है, भोग मेघ के समान हैं, इष्टजनों का संयोग नष्ट हो जाने वाला है, शरीर पापों का घर है और विभूतियाँ बिजलीवत् चंचल हैं।
अनासक्ति
जीव तब तक ही सुखी रहता है जब तक स्नेह नहीं करता, स्नेह रूपी बंधन से बद्ध जीव को तो पद-पद पर दुःख ही होता है।
अनासक्ति
जहाँ स्नेह है वहाँ दुःख है, जीव मन को प्रिय लगने वाले जितने सम्बन्ध बनाता है उसके हृदय में उतनी ही शोक रूपी कीले गड़ जाती हैं।
अनासक्ति
जैसे नदी बांधों से बँध जाती है तो सागर से नहीं मिल पाती है, वैसे ही नर किसी नारी से बंध जाता है तो सिद्धों से नहीं मिल पाता है। संयोग बाँध देता है और बँधा जीव परतंत्र होता है और परतंत्रता ही सबसे बड़ा दुःख है, अतः निर्बन्ध हो, स्वतंत्र हो, समुद्र बनो, सिद्धों से मिलो।
अनासक्ति
संसार स्वार्थ का है। जब तक पुण्य है, तब तक सब आपके साथ हैं, जैसे ही पुण्य क्षीण हुआ कि क्षणभर में सब छोड़कर चले जायेंगे। नारायण श्रीकृष्ण के वंश को देखो, जिसके यहाँ एक भाई तीर्थंकर हो, एक भाई बलभद्र हो, कामदेव हो, क्या वैभव होगा? क्या आनंद होगा? फिर भी उस क्षण को देखो जब द्वारिका जल रही होगी, वह क्षण कैसा होगा? कौन किसे बचा पाया?
अनासक्ति
इस संसार में मोह के समान कोई शत्रु नहीं, क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं, ज्ञान के समान कोई सुख नहीं और काम के समान कोई व्याधि नहीं है।
अनासक्ति
इन चार संज्ञाओं की तो सीमा है ये तो शरीर के कमजोर होने पर शान्त हो जायेंगी, पर नाम की संज्ञा इतनी खोटी है कि अंतिम श्वासों तक सताती है कि मेरा नाम हो जाये। इस जीव ने नाम के लिए जितना किया, उसका सौवाँ अंश भी धर्म के लिए किया होता तो नाम हो ही जाता और कर्मातीत हो जाता।
अनासक्ति
सम्बन्ध व्यक्ति को छोटा बना देते हैं, जबकि स्वभाव विराट बनाता है।
अनासक्ति
'मैं' में आनंद है 'मेरे' में दुःख और तनाव है।
अनासक्ति
संयोग के वियोग में आँसू गिराने पड़ते हैं।
अनासक्ति
संसार में कोई भी द्रव्य नया नहीं है, प्रत्येक को अनंतों बार अपना शरीर बनाया है, प्रत्येक का अनंतों बार भोग उपभोग किया है।
अनासक्ति
जो जीते जी छोड़ देते हैं वे साधु और जो जोड़-जोड़ कर मर जाते हैं, वे संसारी होते हैं।
अनासक्ति
चारों गतियों में भ्रमण कराने वाली आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चारों संज्ञाएँ हैं।
अनासक्ति
जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी नाराज होता है, वह हड्डी-मांस का भक्त है भगवान् का नहीं।
अनासक्ति
जहाँ व्यक्ति की आहार, मैथुन, परिग्रह संज्ञा की पूर्ति होती है वह स्थान व्यक्ति को प्रिय लगता है।
अनासक्ति