Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 3 / 9

यह दुनिया एक सुसज्जित नवयुवती के समान है जो प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अनासक्ति
जो व्यक्ति दरिद्र होकर भी इन्द्रियजन्य सुखों की कामना करता है वह निन्द्य या पशु तुल्य है।
अनासक्ति
भोगों में लिप्त रहने वाला कभी सचेत नहीं होता है।
अनासक्ति
योगी के द्वारा सबको सुख मिलता है और भोगी के द्वारा सबको दुःख मिलता है।
अनासक्ति
नाग के द्वारा आधा निगले जाने पर भी मेंढ़क मक्खियों को खाता रहता है, उसी तरह तृष्णांध पुरुष अवस्था के ढल जाने पर भी विषय-सेवन करता रहता है।
अनासक्ति
विषयभोग में रमने वाला आत्मसुख माँगेगा भी तो नहीं मिलेगा।
अनासक्ति
विषय भोग दिखते तो सरल हैं परन्तु पड़ते बहुत मँहगे हैं।
अनासक्ति
यदि आपको शान्ति चाहिए हो तो वासना से मुक्त होना चाहिए।
अनासक्ति
किसी भी भोग को भोगों, अन्त में उस भोग से अरुचि अवश्य होती है यह नियम है, परन्तु मनुष्य भूल यह करता है कि वह उस अरुचि को महत्त्व देकर उसको स्थायी नहीं बनाता है।
अनासक्ति
लोगों में भोग और संग्रह की वृत्ति अधिक होने से ही अकाल पड़ता है।
अनासक्ति
हम जिससे सुख लेंगे उसका दास होना ही पड़ेगा, सुख का भोगी कभी स्वाधीन नहीं हो सकता है। सोचो! इतनी धन सामग्री भोग पाओगे या नहीं क्योंकि साथ ले जाने की व्यवस्था नहीं है।
अनासक्ति
साधना में जीने वाला नहीं अपितु साधन में जीने वाला अन्तिम समय में सोचता है अब क्या होगा? जीभ के स्वाद के लिए ही व्यक्ति सारे पाप करता है।
अनासक्ति
सुख भोग की लालसा आत्म सम्मान का सर्वनाश कर देती है।
अनासक्ति
भोगों को नहीं भोगा हम ही भोगे गये, तप नहीं तपा गया हम ही तप्त हो गये, काल नहीं बीता हम ही बीत गये तृष्णा जीर्ण नहीं हुई हम ही जीर्ण हो गये।
अनासक्ति
विषय तो विष्ठाभोगी सूकर-कूकर को भी मिल जाते हैं अतः आत्महित में लगें।
अनासक्ति
इस जीव ने नरकों में महादुःख भोगे हैं, यदि उनका स्मरण हो जाये तो कौन भोगों की इच्छा करेगा?
अनासक्ति
व्याघ्र, चोर, शत्रु, सर्प, अग्नि, तीव्र रोग और विष एक ही भव में दुःख देते हैं परन्तु भोग असंख्यात भवों में दुःख देते हैं।
अनासक्ति
उत्पत्ति और विनाशशील वस्तुओं के वश में न होना अर्थात् उनके लिए दुःखी न होना ही मनुष्य की वास्तविक विजय है।
अनासक्ति
वियुक्त वस्तु के संयोग होने का नियम नहीं है, परन्तु संयुक्त वस्तु का वियोग नियम से होता है। सदा अपने ज्ञायक स्वभाव की रक्षा करें।
अनासक्ति
तुम्हारे नाम से यदि कोई सामाजिक संस्था खोली जाये, तब वहाँ कभी डेरा नहीं डाल देना क्योंकि वह राग का साधन हो सकता है।
अनासक्ति
थोड़ा-सा तो जीवन है, उसका भी विश्वास नहीं और विकल्प साधन कितने बना रखे हैं क्या यह शान्ति का मार्ग है?
अनासक्ति
जहाँ कुछ दिन ठहरना है वहाँ मकान बना रहा है, जहाँ अनंत काल रहना वहाँ के बारे में सोच नहीं रहा है। ''सज्जन को शान्ति अमृत है।''
अनासक्ति
तोता पिंजड़े को नहीं सजाता, आप तन पिंजड़े को कैसे सजाने में लगे हो, तोता मुक्त होना चाहता आप क्यों नहीं, तोता पराधीनता के कारण दुःखी, आप स्वतंत्र होकर क्यों दुःखी जीवन जी रहे हो। धर्म का ह्रास पापियों से नहीं ढोंगी/पाखण्डी धर्मात्माओं से होता है।
अनासक्ति
आप खाली हाथ आये और खाली हाथ जाओगे, जो आज आपका है वह कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा, आप इसे अपना समझकर प्रसन्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता आपके दुःखों का कारण है।
अनासक्ति
श्री के राग में श्रीजी को मत भूलो। राग सत्य पर आवरण कर देता है।
अनासक्ति
विवेकी वैरागी मनुष्य स्त्री को शृंखला के समान मानता है।
अनासक्ति
जब आपका तन भी आपका साथ नहीं देगा तो फिर तन के सम्बन्धी कैसे आपका साथ दे सकते हैं, जिसके लिए कमाया वह तन भी आपके साथ नहीं जायेगा। पाप कर्म के उदय से घर में भी बहुत दुःख होता है।
अनासक्ति
जिन वस्तुओं के बिना भी हम रह सकते हैं, फिर उनके हम गुलाम क्यों बनें?
अनासक्ति
पेट और पेटी रुपया और रोटी के लिए, गृहत्याग करने वाला महात्मा नहीं होता है।
अनासक्ति
ग्रन्थ पढ़ने से नहीं निर्ग्रन्थ बनने से मोक्ष मिलता है।
अनासक्ति
जब तक परिग्रह और परिचय के प्रति राग है तब तक सत्संग और संन्यास बकवास है।
अनासक्ति
जिस किसी भी क्रिया से वैराग्य की जागृति होती हो उसका पूर्ण श्रद्धा के साथ आचरण करना चाहिए।
अनासक्ति
आप संसार में रहें लेकिन आपके भीतर संसार न रहे।
अनासक्ति
नाशवान की दासता ही अविनाशी के सम्मुख नहीं होने देती है।
अनासक्ति
प्रायः समस्त प्रकार की उपाधि का मूल यह शरीर है, यह ही संसार में भटकाने वाला है, सभी को सबसे अधिक ममत्व अपने शरीर से होता है, साधु बनकर शरीर का गुलाम बनने वाले जीव के लिए नरक व पशु ये ही दो गतियाँ हैं।
अनासक्ति
यदि आप सुख से जीना चाहते हो तो निर्ममत्व होकर जीना सीखो।
अनासक्ति
ममत्व के वशीभूत जीव स्वयं के द्वारा स्वयं का ही पतन करता है।
अनासक्ति
सबसे मिलकर रहना पर किसी से भी बंधकर नहीं रहना चाहिए।
अनासक्ति
राग आग के समान है अतः राख होने से पहले राग छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
भोगासक्त मनुष्य सप्तम नरक के नारकी से भी पतित है क्योंकि नारकी तो सम्यक्त्व उत्पन्न कर सकता है, परन्तु भोगासक्त मनुष्य नहीं।
अनासक्ति
निर्मोही तो स्वयं ही पुण्यात्मा है धन, संतान, परिवार के कारण नहीं।
अनासक्ति
यदि शान्ति चाहते हो तो किसी कार्य के मुखिया मत बनो, जो कार्य उचित लगे तो उसके बारे में बतलाकर विरक्त बने रहो।
अनासक्ति
जीवन जीना है तो दर्पण की तरह जियो जिसमें स्वागत सभी का हो लेकिन संग्रह किसी का न हो।
अनासक्ति
सबसे कठिन बंधन स्नेह का है, परतन्त्रता भी मात्र इतनी है कि पर से स्नेह है, अपने को स्वतन्त्र, स्वतः सिद्ध, अविनाशी, अखण्ड, सत् जानकर बन्धन से दूर रहो और प्रसन्न रहो।
अनासक्ति
परिचय बढ़ाना शान्ति का मार्ग नहीं है अतः किसी से विशेष परिचय मत पूछो और न अधिक समय तक एक स्थान पर रहो, परिस्थिति वश यदि एक स्थान पर रहने का प्रसंग आवे तो अपने ध्यान, अध्ययन, व्रताचरण से विशेष प्रयोजन रखो हाँ! सार्वजनिक शास्त्र प्रवचन एक बार करते रहें, जिससे स्व दृष्टि निर्मल हो और अन्य को भी लाभ हो सके।
अनासक्ति
रागी जीव ने शरीर के राग में न जाने कितनों को शरीर रहित कर दिया, एक पर्याय को सजाने में कितनों की पर्यायों को नष्ट कर दिया। सही चेहरा तो चारित्र से चमकता है किन्तु आपने परजीवों की हिंसक सामग्री से चमकाना चाहा है। चर्म सुन्दर नहीं सुन्दर तो आत्मा का धर्म है।
अनासक्ति
शरीर के स्वभाव का चिन्तन करने से वैराग्य में वृद्धि होती है।
अनासक्ति
दुनिया में मेहमान बनकर जियो मालिक बनकर नहीं।
अनासक्ति
लोक में उदासीन वृत्ति से जीने वाले कभी दुःखी नहीं होते।
अनासक्ति
अपरिग्रही अनगार को जो आनंद होता है वह अहमिन्द्र को भी नहीं होता। चक्रवर्ती को उसके अनंतवें भाग भी नहीं होता।
अनासक्ति
वैराग्य के बिना चारित्र विधवा स्त्री के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
किसी दिन अखबार नहीं मिले और चाय नहीं मिले तो पेट साफ नहीं होगा मतलब हम किसी वस्तु के नियंत्रण में हैं।
अनासक्ति
अन्त में अकेला ही जाना पड़ेगा इसलिए पहले से ही अकेले हो जायें अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रिया से असंग हो जायें, इनका आश्रय न लें।
अनासक्ति
महात्मा पुरुष सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी खिन्न नहीं होते हैं।
अनासक्ति
अन्त में अकेला ही जाना पड़ेगा इसलिए पहले से ही अकेले हो जायें अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रिया से असंग हो जायें, इनका आश्रय न लें।
अनासक्ति
जो कुछ आपके पास है अतिशीघ्र प्रभु को समर्पित कर दो क्योंकि पता नहीं किस क्षण सब छोड़कर जाना पड़ जाये।
अनासक्ति
'शोक' धर्म, बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, शरीर, जप, तप, संयम और शान्ति को नष्ट करता है। शोक से मुक्त होना है तो शौक करना छोड़ दो।
अनासक्ति
धैर्यवान और बुद्धिमान मनुष्य को बहुविध शोक, विलाप और रुदन सभी अवस्थाओं में त्याग देने योग्य है।
अनासक्ति
कामान्ध को कुछ नहीं दिखता, जो नशा करके मदोन्मत्त हो जाए उसे भी कुछ नहीं दिखता और जो किसी स्वार्थ के लोभ से अन्धा हो जाता है उसे भी किसी काम में कोई दोष दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
हमें यह याद रखना चाहिए कि अपरिग्रह का सिद्धान्त, विचार-नियंत्रण के बिना अमल में नहीं आता है।
अनासक्ति
जिसके पास भीतर कुछ होता है, वही बाहर सब कुछ छोड़ सकता है।
अनासक्ति
जिसके पास सब कुछ होता है उसे राजा कहते हैं किन्तु जिसके पास कुछ भी नहीं होता उसे महाराजा कहते हैं।
अनासक्ति
वासनाओं में लिपटे लोग इस योग्य नहीं कि हम उनके सामने भक्ति से सर झुकाये, वैराग्य और परमात्मा से दिल लगाना ही वे महान् गुण हैं जिनकी चौखट पर बड़े-बड़े वैभवशाली और प्रतापी लोगों के सिर भी झुक जाते हैं।
अनासक्ति
पदासीन और तिजोरी के निकट जिसका मरण होता है, वे नरक जाते हैं।
अनासक्ति
हिंसा और परिग्रह विश्व अशान्ति के दो मूल कारण हैं इसलिए अहिंसा और अपरिग्रह से ही विश्व में सर्वत्र शान्ति सम्भव है।
अनासक्ति
नंगे (भिखारी) के पास कुछ भी न हो लेकिन मूर्छा (ममत्व) हो तो परिग्रह है ऐसा समझना चाहिए।
अनासक्ति
यदि नदी में नहाते हो तो सैंकड़ों टन पानी सिर पर होने पर भी वजन मालूम नहीं होता किन्तु जब उस पानी को घड़े में भरकर सिर पर रखते हो तो पानी भार लगता है, कारण पानी को अपना मान लिया, ठीक उसी प्रकार संसार में, परिवार में, पदार्थों में रहना परिग्रह नहीं है किन्तु उन्हें अपना मानना परिग्रह है।
अनासक्ति
अधिक मिलने पर भी संग्रह न करें, परिग्रह वृत्ति से अपने को दूर रखें।
अनासक्ति
दुनिया में सबसे बड़ा ग्रह परिग्रह है, जिसके पास परिग्रह है उसे ही नवग्रह परेशान करते हैं। आश्चर्य है, लोग जीने के लिए धन कमाते हैं और धन की सेवा करते-करते मर जाते हैं। भोजन को पचाना आसान है, पर दूसरों के धन को पचाना आसान नहीं है।
अनासक्ति
जीवन का सर्वश्रेष्ठ कार्य संन्यास है।
अनासक्ति
यदि संसार बन्धन से मुक्त होना हो तो प्राप्त वस्तुओं में ममता का और अप्राप्त वस्तुओं की कामना का त्याग कर दो।
अनासक्ति
प्रेम और वासना में उतना ही अंतर है, जितना कंचन और काँच में।
अनासक्ति
वह व्यक्ति संसार का सबसे बड़ा मूर्ख है जो किसी की देह से प्यार करता है।
अनासक्ति
नाशवान में अपनापन अशान्ति और बन्धन देने वाला है।
अनासक्ति
संसार में रुचि रखना और सुख चाहना विष खाकर जीने की कल्पना है।
अनासक्ति