Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 93

रत्न विक्रय जरासंध के पास। प्रातिहार्य।

17 सूत्र

रत्नवृष्टि की बिक्री- एक वणिक अपना खरीदा हुआ माल बेचने के लिए बहुत से अमूल्य मणि लेकर जरासन्ध से मिला, उन मणियों को देखकर राजा जरासन्ध ने उससे पूँछा कि ये मणि तुम कहाँ से लाये हो? वणिक ने कहा हे स्वामिन्! ये मणि उस द्वारिका पुरी से लाये हैं जहाँ अत्यन्त पराक्रमी राजा कृष्ण जी रहते हैं, यादवों के स्वामी समुद्रविजय और उनकी रानी शिवादेवी को जब तीर्थंङ्कर श्री नेमिनाथ जी उत्पन्न हुये थे, तब पन्द्रह मास तक देवों ने रत्न वृष्टि की थी, उन्हीं रत्नों में से ये रत्न लाये हैं, तात्पर्य यह है कि दिव्य रत्नों का भी व्यापार होता है।
भक्ति
तरु अशोक के निकट में, सिंहासन छविदार, तीन छत्र सिर पर लसें, भामण्डल पिछ्वार। दिव्य ध्वनि मुखते खिरे, पुष्प वृष्टि सुर होय, ढौंरै चौसठ चमर जस, बाजे दुन्दुभि जोय।।
भक्ति
ज्ञान अनन्त, अनन्त सुख, दरश अनन्त प्रमान। बल अनन्त अरिहन्त सो, इष्ट देव पहचान।।
भक्ति
जन्म जरा तृषा क्षुधा, विस्मय आरत खेद, रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिन्ता स्वेद। राग-द्वेष अरु मरण जुत, ये अष्टादश दोष, नाहीं होत अरहन्त के सो छवि लागत मोष।।
भक्ति
समकित दर्शन ज्ञान अगुरुलघु अवगाहना। सूक्ष्म वीरजवान निराबाध गुण सिद्ध के।। सिद्धों का सुमिरण करे, पाप रहे न कोय। करम झरत क्षण एक में, निज गुण सिद्धि होय।।
भक्ति
जन्म के दस- अतिशय रूप, सुगन्ध तन, नाहीं पसेव निहार। प्रिय हित वचन, अतुल्य बल, रुधिर श्वेत आकार।। लक्षण सहस रु आठ तन, समचतुष्क सण्ठान। वज्रवृषभ नाराच जुत, ये जनमत दश जान।।
भक्ति
केवलज्ञान के दस- योजन शत इक में सुभिख, गगन गमन मुख चार। नहीं अदया उपसर्ग नहीं, नाहीं कवलाहार।। सब विद्या ईश्वरपनो, नाहीं बढ़े नख केश। अनिमिष दृग छाया रहित दश केवल के वेश।।
भक्ति
देवकृत चौदह- देवरचित हैं चार दश, अर्धमागधी भाष। आपस माहि मित्रता, निर्मल दिश आकाश।। होत फूल फल ऋतु सबै, पृथ्वी काँच समान। चरण कमल तल कमल है, नभते जय जयवान।। मन्द सुगन्ध बयार पुनि, गन्धोदक की वृष्टि। भूमि विषै कण्टक नहीं, हर्ष मयी सब सृष्टि।। धर्म चक्र आगे चले, पुनि वसु मङ्गल सार। अतिशय श्री अरहन्त के, ये चौतीस प्रकार।।
भक्ति
द्वादश तप दश धर्म जुत, पालें पञ्चाचार। षडावश्यक गुप्तित्रय, आचारज गुणसार।।
धर्म
अनशन ऊनोदर करें, व्रतसंख्या रस छोर। विविक्त शैयासन करें, काय क्लेश सुठौर।। प्रायश्चित धर विनय जुत, वैयावृत स्वाध्याय। पुनि उत्सर्ग विचार के, धरे ध्यान मन लाय।। हमने भगवान् के दरबार में बड़ी गजब बात देखी है। देते हुए उसके हाथ नहीं देखे पर झोलियाँ सबकी भरी देखी हैं।।
धर्म
शास्त्रों का हो पठन सुखदा, लाभ सत्सङ्गति का। सद् व्रतों का सुजस कहके, दोष ढाकूँ सभी का।। बोलूँ प्यारे वचन हित के आपका रूप ध्याऊँ। तो लों सेऊं चरण जिन के मोक्ष जो लों न पाऊँ।। तव पद मेरे हिय में मम हिय तेरे पुनीत चरणों में। तव लों लीन रहूँ प्रभु जब लों न पाया न मुक्ति पद मैंने।।
भक्ति
ऐसो वेद न देखो पांड़े, आसं पास कपासा। खोद विनोद करो मत पांड़े, अर्ध-अर्ध स्वाहा॥
ज्ञान
साधना अभिशाप को वरदान बना देती है। भावना पाषाण को भगवान् बना देती है।।
पुरुषार्थ
जब चिन्तये तब सहस फल, लक्षा गमन करेय। होय अनन्त फल तब, जब जिनवर दर्शेय।।
भक्ति
पूजा तीन प्रकार की, छोटी-बड़ी-मझ्झोल। जैसा मौका देखिये, वैसी लीजे खोल।।
भक्ति
क्षणभङ्गुर जीवन की कलियाँ, प्रातः काल खिली न खिली, मलयाचल की शुचि शीतल वायु, सुगन्ध समेत मिली न मिली। कलिकाल कुठार लिये फिरता, तन नम्र से चोट झिली न झिली, भज ले अरिहन्त अरी रसना!, फिर अन्त समय में हिली न हिली।।
समाधि
पतझड़ में पेड़ के पत्ते झड़ जाते हैं, बुरे वक्त में सगे भाई लड़ जाते हैं। चार दिन की जिन्दगी है, प्रेम से बिता डालो, अन्त समय में सभी मौन चले जाते हैं।।
समाधि