Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 378

तीन अनुबद्ध केवली। पाँच श्रुतकेवली। तीन करण। बारह प्रकार के समयसार

20 सूत्र

ज्ञान हीन मनुष्य को मोक्ष प्राप्त नहीं होता जैसे पानी के बिलोने से हाथ चिकने नहीं होते हैं।
ज्ञान
जीवकाण्ड को जानिये, कर्मकाण्ड को खण्डिये, ज्ञानकाण्ड मय अर्थात् सिद्ध भगवान् बनिए।
ज्ञान
महावीर भगवान् के समवसरण में सात सौ केवली थे, वे सभी पञ्चमकाल में बासठ वर्ष के भीतर मोक्ष चले गये, तीन अनुबद्ध केवली, महावीर भगवान् के निर्वाण होने के बाद, गौतम स्वामी बारह वर्ष, सुधर्मा स्वामी बारह वर्ष जम्बूस्वामी अड़तीस वर्ष तक विहार करते रहे।
धर्म
एक मत के अनुसार जम्बूस्वामी को मिलाकर पाँच केवली हुए हैं जिनमें अन्तिम श्रीधरकेवली हुए हैं। पाँच श्रुतकेवली हुए हैं, 1.विष्णु जी, 2.नन्दिमित्र जी, 3.अपराजित जी, 4.गोवर्धन जी, 5.भद्रबाहु जी, इनके द्वारा सौ वर्ष तक प्रभावना हुयी। इनके बाद ग्यारह अङ्ग चौदह पूर्व के पाठी नहीं हुये। फिर ग्यारह अङ्ग दस पूर्व के पाठी मुनि हुये। फिर ग्यारह अङ्ग के पाठी हुये। फिर दस अङ्ग के पाठी हुये।
ज्ञान
छः सौ तेरासी वर्ष के बाद एक अङ्ग के भी पाठी नहीं हुये, फिर अंग के अंश के ज्ञाता हुये, उनमें धरसेन जी, पुष्पदन्त जी, भूतबली जी, गुणधर जी, माघनन्दि जी, यतिवृषभ जी, कार्तिकेय जी, जिनचन्द्र जी, समन्तभद्र जी, पूज्यपाद जी, अकलङ्क जी हुये जिनके द्वारा धर्म तीर्थ आज तक सुरक्षित है।
ज्ञान
क्षेत्र- सबसे कम लवण समुद्र से, उससे ज्यादा कालोदधि से उससे ज्यादा जम्बूद्वीप से उससे ज्यादा धातकीखण्ड से और सबसे ज्यादा पुष्करार्द्ध से सिद्ध हुये हैं।
धर्म
काल- भरत और ऐरावत में उत्सर्पिणी की अपेक्षा अवसर्पिणी काल में ज्यादा सिद्ध होते हैं।
धर्म
घीव दूध में रम रहा, व्यापक सब ही ठौर। 'दादू' वक्ता बहुत हैं, मथ काढ़े ते और।।
ज्ञान
1. शुक्रवार में गुरूवार का अभाव- प्रागभाव कहलाता है, 2.शुक्रवार में शनिवार का अभाव- प्रध्वंसाभाव कहलाता है, 3. एक अङ्गुलिका दूसरी अङ्गुलि में, एक फल का दूसरे फल में, एक तन्तु का दूसरे तन्तु में अभाव- अन्योन्याभाव कहलाता है, 4. एक परमाणु का दूसरे परमाणु में और एक जीव का दूसरे जीव में अभाव- अत्यन्ताभाव कहलाता है।
ज्ञान
बन्धापसरण और बन्धव्युच्छित्ति में अन्तर-बन्धापसरण में संवर नहीं होता है, जैसे एक व्यक्ति आठ दिन की छुट्टी लेकर गया। बन्धव्युच्छित्ति में संवर हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति रिटायर्ड हो गया।
कर्म
तीन करण- मिथ्यात्व पर तीन करण रूपी थप्पड़ पड़े, वह मर गया लेकिन अनन्तानुबन्धी छिप गयी, जैसे ऊधम करने वालों में एक बच्चे पर थप्पड़ पड़ा तो शेष बच्चे भाग गये।
कर्म
प्रायोग्यलब्धि में, चौतीस बन्धापसरणों में, छठवे गुणस्थान में बँधने वाली प्रकृतियों का भी बन्ध रुक जाता है।
कर्म
अनुभवी से समझे विना शास्त्र पढ़ने से कोई सफल नहीं होता, जैसे ज्योतिषी ने कहा! मन्दिर के कलश में इतनी सम्पत्ति है, वह श्रावण कृष्ण एकम् को मिलेगी, उस नासमझ ने कलश तोड़ डाला, ज्योतिषी को झूठा ठहराया, किसी अनुभवी ने कहा भैया! इस तिथि को कलश की जहाँ छाया पड़े वहाँ खोदो, भाग्य से मिल मिलती है, कार्य की सिद्धि समझदार की होती है।
ज्ञान
जब मन्द कषाय होती है तब तत्त्व विचार होता है, तत्त्व चिन्तन में मन न लगे तो तीव्र कषाय समझना चाहिए, तीव्र कषाय के उदय में देशना लब्धि नहीं होती है।
क्षमा
गधों के बीच में शेर का बच्चा अपने स्वभाव को भूलकर बोझा ढो रहा था, शेर की दहाड़ सुनकर उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया, इसी प्रकार संसारी प्राणी संसार में रुल रहा है, जब गुरु रूपी सिंहों कि दहाड़ सुनता है तव अपने स्वरूप का ज्ञान होता है और फिर सिद्धों की श्रेणी मे जाकर मिल जाता है।
ज्ञान
बारदाने में अपनी सारी पूँजी लगा देंगे तो व्यापार किससे करेंगे, इसी तरह व्याकरण, छन्द, अलङ्कार आदि शास्त्रों में सारी जिन्दगी लगा देंगे, तो कल्याण कब करेंगे?
ज्ञान
ट्रेफिक भरे रास्ते से गुजरना है तो धीरे-धीरे हार्न बजाते हुये चले जाते हैं तो रास्ता अपने आप निकल आता है, इसी प्रकार कितना भी तीव्र कर्म का उदय हो, तत्त्वाभ्यास से रास्ता मिल ही जाता है।
पुरुषार्थ
जो ज्ञानदान के उपकार को भूलता है वह सौ भव तक कुत्ते की योनी में रहता है और दीर्घ काल तक निगोद में रहता है।
ज्ञान
पचास वर्ष में जितना अकेले पढ़कर सीखोगे, उतना छः माह में ज्ञानियों की सङ्गति से सीख जाओगे।
संगति
शुद्ध मनुष्य छठवे गुणस्थान से होते हैं, एकेन्द्रिय से असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक शुद्ध तिर्यञ्च होते हैं।
धर्म