Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 336

निमित्त-उपादान (कृष्ण जी की बांसुरी)।

13 सूत्र

शुभोपयोग से कर्म बन्धता भी है निर्जरा भी होती है, जैसे काँटे से काँटा निकलता है, उसी सीढ़ी से चढ़ना भी होता है उतरना भी होता है, पानी से मकान गिरता भी है बनता भी है, फसल पानी से उगती भी है और नष्ट भी होती है, हँसने और रोने की आँखे एक ही होती हैं, दवाई मुख्य है, पर साधन के रूप में इञ्जेक्शन भी महत्त्व पूर्ण होता है।
कर्म
स्वचतुष्टय और परचतुष्टय- पेसेञ्जर का टिकट, पेसेञ्जर के द्रव्य की अपेक्षा है स्लीपर के द्रव्य की अपेक्षा नहीं है, कलकत्ता से दिल्ली के क्षेत्र की अपेक्षा टिकट है अन्य क्षेत्र की अपेक्षा नहीं है, निश्चित तारीक के काल की अपेक्षा टिकट है अन्य काल की अपेक्षा नहीं है, सेकेण्ड क्लास के भाव की अपेक्षा टिकट है फस्ट क्लास के भाव की अपेक्षा नहीं है।
विवेक
जैसे मन्दिर के सामने की फोटो मन्दिर नहीं है बल्कि भीतर-बाहर, आजू-बाजू सभी दीवालों की फोटो मिलाने से मन्दिर कहलाता है, उसी प्रकार वस्तु स्वरूप को समझना चाहिए।
विवेक
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता नहीं है तो इसका यह अर्थ नहीं कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य के लिये निमित्त भी नहीं है।
कर्म
क्षेत्र- आज का बच्चा कहता है मन्दिर क्यों जाऊँ ? आत्मा या भगवान् का ध्यान घर में बैठकर भी कर सकते हैं, इसका उत्तर हमें उसी की भाषा में देना होगा कि जिस प्रकार एक घर में रसोई अलग, स्नानघर अलग, पखाना अलग, शयन कक्ष अलग-अलग होते हैं, उसी प्रकार परमात्मा का ध्यान करने के लिये मन्दिर हैं, यदि पखाना खाने के स्थान पर और खाना पखाने के स्थान पर हो तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं ? यदि यह अयोग्य है, तो मन्दिर का कार्य मन्दिर मे होना चाहिये, घर का कार्य घर में होना चाहिये, मन्दिर की वेदी पर कोई भोजन की थाली रखकर नहीं खाता तथा आपरेशन थियेटर पर ही आपरेशन होता है रसोईघर या दुकान पर नहीं उत्तर सुनते ही बच्चे को समझ में आ जायेगा।
भक्ति
भाव समवाय- मन की महत्त्वाकाङ्क्षा पर रोक लगाना, कर्म-नोकर्म मिलने पर राग-द्वेष नहीं होना भाव समवाय प्रत्यय है, जब तक भावों में निर्मलता नहीं होगी तब तक द्रव्य, क्षेत्र, काल और भव रूप चार प्रत्यय मिलने पर भी कार्य की सिद्धि नहीं होगी।
मन
निमित्त और उपादान-राधा ने कृष्ण जी से कहा मुझे बाँसुरी सुनाओ, सुनने की तीव्र इच्छा थी, दुनिया का ये स्वभाव है कि जिसको जो कला आती है, उसे करने को कहो तो वह पहले फूलता है, कृष्णजी ने कहा आज हमारा सुनाने का मन नहीं है, किसी को अपने पक्ष में करना है तो उसकी प्रशंसा कर दो, तब राधा ने कहा, 'अर्थ तो है तुम्हारी श्वाँस का, वरना ये टुकड़ा है बाँस का' असंख्यात जीव भगवान् के चरणों में बैठते हैं, तो भी क्षायिक सम्यक्त्व सबको नहीं होता, निमित्त तो सबके लिए बराबर है पर उपादान नहीं है, इसलिए जरूरी नहीं कि निमित्त है तो उपादान जाग ही जाए, कृष्णजी प्रशंसा सुनकर बजाने बैठ गए, घण्टों निकल गये, अब राधा को भूख लगी यदि काम बन्द कराना है तो निन्दा कर दो, राधा ने कहा- 'अर्थ क्या है तुम्हारी श्वाँस का, गर न होता ये टुकड़ा बाँस का', कृष्ण जी ने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया, बताओं दोनों में कौन मुख्य है ? वस्तुत: यदि श्वाँस में जुकाम हो जाए तब कितनी अच्छी बाँसुरी हो स्वर नहीं आयेगा, श्वाँस अच्छी है और बाँसुरी फटी है तो भी सुर नहीं आता, अत: निमित्त उपादान की बहुत बड़ी महिमा है, बाँसुरी की उतनी ही कीमत जितनी श्वाँस की।
कर्म
देह से भिन्न आत्मा को पर पदार्थ का कर्ता, भोक्ता, एकत्व, ममत्व मानना एवं माता-पिता, देश, मकान, स्त्री-पुत्रादि, पञ्चपरमेष्ठी- ये सब उपचरित असदभूत व्यवहारनय से मेरे हैं।
अनासक्ति
उपचार आसानी से बदल जाता है, जैसे मकान मेरा है पर बिकने पर दूसरे का हो जाता है।
अनासक्ति
द्रव्यार्थिक नय एक्सरे की तरह है, पर्यायार्थिक नय कैमरे की तरह है।
ज्ञान
नय सम्यग्ज्ञान के अंश हैं, मिथ्याज्ञान में मिथ्या नय होते हैं।
ज्ञान
रामचन्द्रजी सम्यग्दृष्टि थे तो भी कहते थे कि मैं सीता और लक्ष्मण के विना जीवित नहीं रह सकता, सीता की दीक्षा के बाद और लक्ष्मण की मृत्यु के बाद भी राम जीवित रहे, जैसे भारतीय रेल को अपनी सम्पत्ति कहता है लेकिन मानता नहीं, माता-पिता को अपने कहता है पर मानता नहीं, यदि कोई अपने या पड़ोसी के मां-बाप को मार डाले तो भी धारा 302 का केस बनता है।
अनासक्ति
मैं रोटी खाता हूँ, मैं उपदेश करता हूँ आदि सब कथन उपचरित असद्भूत व्यवहारनय का है।
ज्ञान