Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 247

असंयम का होना भव-भव में रोना।

9 सूत्र

आरम्भ में दया नहीं होती, स्त्री की सङ्गति से ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है, शङ्का से सम्यक्त्व एवं धनग्रहण करने से दीक्षा नष्ट हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
इस लोक में 'आहार, भय, मैथुन और परिग्रह' संज्ञाओं से बाधित होकर जीव तीव्र दुःख पाता है और उनका सेवन करता है तो दोनों लोकों में दुःख पाता है।
अनासक्ति
चक्रवर्ती, असुरेन्द्र और सुरेन्द्र स्वाभाविक इन्द्रियों से पीड़ित होते हुए, उस दुःख को सहन न कर सकने से रम्य विषयों में रमण करते हैं।
अनासक्ति
जिन्हें विषयों में रति है उन्हें दुःख स्वाभाविक जानो, क्योंकि यदि वह दुःख स्वाभाविक न हो तो विषयों में व्यापार न हो।
अनासक्ति
नास्तिक मानता है कि जब तक जीवन है तब तक सुख से जियो अगर धन न हो तो कर्ज लेकर घी पियो क्योंकि शरीर के जल जाने पर पुनः कहाँ से मिलेगा।
ज्ञान
आलसी सोचता है कर लेंगे कर लेंगे कर लेंगे, इस चिन्ता में मर जाएंगे, मर जाएंगे, मर जाएंगे यह भूल ही जाता हैं।
समय
इन्द्रिय विषयों मे आत्म हितकारी कुछ भी नहीं है फिर भी जीव अज्ञान के कारण उन्हीं विषयों में रमता है।
अनासक्ति
जो मोही धर्म का विघात करके विषय सुख का अनुभव करते हैं वे पापी वृक्ष को जड़ से काटकर फल पाना चाहते हैं।
धर्म
पराग को पीते-पीते कमल बन्द हो गया, भौंरा विचार करता है, रात्रि व्यतीत होगी सूर्य उदित होगा, कमल खिल जाएगा हम उड़ जाएंगे, इतने में हाथी आकर के कमलनि सहित उसे खा जाता है, इसी प्रकार संसारी प्राणी योजनाएँ बनाता रहता है और सोचता है कि इसके बाद आत्म कल्याण कर लेंगे बीच में ही यमराज रूपी हाथी खा जाता है।
समाधि