Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 31

लोभ

37 सूत्र

विद्या, तप, धन, शरीर, युवावस्था और उच्चकुल ये छह सज्जनों के लिए गुण और दुष्टों के लिए दुर्गुण हैं जिनके कारण विवेक के नष्ट होने पर अभिमानी और दोषपूर्ण दृष्टि वाले होकर वे दुष्ट लोग महापुरुषों की तेजस्विता को नहीं देख पाते हैं।
विवेक
दगाबाजी से धन जमा करना ऐसा है जैसा कि मिट्टी के कच्चे घड़े में पानी भर कर रखना है।
सत्य
कर्ज होना गृहस्थ का कष्ट है, धन रखना योगियों का कष्ट है, आभूषण धारण करना विधवा का कष्ट है, भागना राजा का कष्ट है, पति का परस्त्री आसक्त होना स्त्री का कष्ट है, पुत्र का कुपुत्र होना माता-पिता का कष्ट है, स्त्री का योग्य न होना पति का कष्ट है और मन में संतोष न होना सभी का कष्ट है।
संतोष
आदमी में गुण तभी तक हैं जब तक वह तृष्णा से दूर रहता है।
संतोष
पदासीन और तिजोरी के निकट जिसका मरण होता है, वे नरक जाते हैं।
अनासक्ति
धन, सत्ता और मान-मनुष्य से असंख्य पाप और अनर्थ कराते हैं।
धन
कटोरा लेकर माँगने वाला ही भिखारी नहीं है अपितु संग्रह करने वाला ही सबसे बड़ा भिखारी है।
संतोष
मनुष्य की इच्छापूर्ति तो ईश्वर भी नहीं कर सकता है।
संतोष
महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वर ही जीवन को विषाक्त करता है।
संतोष
जिस वस्तु को प्राप्त करने में सन्ताप होता है उसे दूर से ही छोड़ देना चाहिए।
संतोष
भीतर में लोभ न हो तो आवश्यक वस्तु अपने-आप प्राप्त होती है; क्योंकि वस्तु का लोभ ही वस्तु की प्राप्ति में बाधक है।
संतोष
जिस प्रकार काठ अपने ही अंदर से प्रकट हुई अग्नि द्वारा भस्म होकर खत्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने ही भीतर रहने वाली तृष्णा से नाश को प्राप्त होता है।
संतोष
लोभी उपकारी नहीं हो सकता है।
संतोष
हिंसा और परिग्रह विश्व अशान्ति के दो मूल कारण हैं इसलिए अहिंसा और अपरिग्रह से ही विश्व में सर्वत्र शान्ति सम्भव है।
अनासक्ति
संतोषरूपी अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं उन्हें जो शान्ति व सुख की प्राप्ति होती है, वह धन के लोभियों को जो इधर-से-उधर दौड़ते हैं, उन्हें प्राप्त नहीं होती है।
संतोष
शान्ति ठीक वहाँ से आरंभ होती है, जहाँ महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो जाता है।
संतोष
जब आपको किसी मामले में भलाई-बुराई न सूझ पड़े, तब उस समय अपनी इच्छा पर संयम रखें।
संयम
दासता का कारण स्थूल पदार्थों तथा सांसारिक वस्तुओं की इच्छा करना ही है।
संतोष
सत्य तो निकट है लेकिन अपनी अशान्ति उसे सदा अपने पास नहीं रहने देती है।
संतोष
सन्त नहीं बन सकते तो सन्तोषी बन जाओ।
संतोष
सर्वोत्कृष्ट मानव वह है जिसे सर्वोत्तम सन्तोष है।
संतोष
दुनिया में कोई भी सन्तुष्ट नहीं है—गरीब अमीर होना चाहता है, अमीर सुन्दर दिखना चाहता है, कुँवारे शादी करना चाहते हैं और शादीशुदा मरना चाहते हैं।
संतोष
वे ही सम्पदाशाली हैं जिनको कोई आवश्यकता ही नहीं है।
संतोष
सुख का मूल संतोष है, एक आदमी जल और स्थल के सारे रत्न पाकर गरीब रह सकता है और एक आदमी फटे वस्त्रों और रूखी रोटियों में भी धनी हो सकता है।
संतोष
अनासक्ति और सन्तोष के बिना सुख की कल्पना करना व्यर्थ है।
संतोष
सच्चा सुख तो इस जगत् के सत्य को समझकर सन्तोष प्राप्त करने में हैं।
संतोष
संतोषी सदा सुखी और लालची सदा दुःखी रहता है।
संतोष
वस्तु के अभाव से दुःख नहीं होता, प्रत्युत वस्तु मिल जाए-इस इच्छा से दुःख होता है।
संतोष
सुनना चाहते हैं इसीलिए न सुनने का दुःख होता है। देखना चाहते हैं इसीलिए न दिखने का दुःख होता है। बल चाहते हैं इसीलिए निर्बलता का दुःख होता है। जवानी चाहते हैं इसीलिए वृद्धावस्था का दुःख होता है। तात्पर्य है कि वस्तु के अभाव में दुःख नहीं होता, वस्तु की चाहत से, उसके अभाव का अनुभव करने से दुःख होता है।
संतोष
लोग व्यक्ति विशेष के आदर में भी धर्म का ही आदर करते हैं। यदि कोई व्यक्ति माने कि मेरा आदर है तो वही ठगाया गया, पतित हुआ, दुःखी हुआ, दुःखों का बीज बो चुका, लोगों की कोई हानि नहीं हुई, उन्होंने शुभोपयोग का लाभ ही उठाया है, घात तो उसी का हुआ जिसने भ्रम किया।
विनम्रता
आज के युग में उपहार देने में स्वार्थ ज्यादा परमार्थ कम नजर आता है।
दान
अजीब चाहत होती है इंसान की जो प्राप्त है उसका आनंद नहीं उठाता क्योंकि इंतजार है थोड़ा और प्राप्त हो जाए और यह थोड़ा कभी खत्म ही नहीं होता है।
संतोष
इस जगत् के पथ में विविध प्रलोभन के गर्त हैं उनसे बचकर रहो अन्यथा सांसारिक यातनाओं के सहने में ही समय बिताना होगा।
संतोष
दीन वह है जो सांसारिक सुख का लोभी है।
संतोष
बाह्य पदार्थ तो छूटा ही है लोभ कषाय छोड़ना है।
संतोष
बाह्य परिकर (भोग-उपभोग की सामग्री एवं नौकर चाकर) से भी शान्ति नहीं मिलती है इसके उदाहरण देखने हो तो सम्राट, मन्त्री, श्रीमन्तों के समीप जाकर देखो।
संतोष
सम्पत्तिशाली व लोकमान्य तिलक बनने में शान्ति नहीं मिलेगी।
संतोष