Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 2 / 6

सोचना आस्रव है, सोचना ही है तो आत्मा परमात्मा का चिंतन करो। बोलना आस्रव है, बोलना ही है तो जिससे वैराग्य का विकास हो वही बोलो। चेष्टा आस्रव का कारण है, करना पड़े तो इन्द्रिय संयम, प्राणी संयम के संयमरूप चेष्टा हो।
संयम
आँख से देखना नियत है पर क्या देखेगी यह अनियत है अन्यथा पञ्चेन्द्रिय निरोध मूलगुण पालन के पुरुषार्थ का उपदेश क्यों?
संयम
उसे ही देखो जिसके देखने से आपके दर्शन, ज्ञान, चारित्र में बाधा न आ सके।
संयम
आत्मसम्मान, आत्मज्ञान, आत्मसंयम ये तीनों ही जीवन को परम शक्ति की ओर ले जाते हैं।
संयम
दीक्षा लेते समय के परिणामों का हमेशा चिन्तन करते रहने से संयम और वैराग्य सुदृढ़ रहता है।
संयम
मनुष्य जब एक नियम तोड़ता है तब दूसरा अपने आप ही टूट जाता है इसलिए प्राण जाने पर भी प्रण (नियम) को नहीं त्यागना चाहिए।
संयम
छोटे-छोटे संकल्प ही आत्मशक्ति को बढ़ाते हैं।
संयम
क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपने को पूज्य समझना; ये भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते वही पण्डित कहलाता है।
संयम
संयम व विवेक से रहने वाले पाप से बचते हैं।
संयम
जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य इन छह शत्रुओं को वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से लिप्त नहीं होता और अनर्थों में नहीं पड़ता है।
संयम
अपने कर्तव्य में लगे रहना और मौन रहना लांछन का सबसे अच्छा उत्तर है।
संयम
साधना त्याग से होती है और 'भोग' संयोग से होता है।
संयम
योगी इन्द्रियों का दास नहीं मालिक होता है।
संयम
जो मन, वचन और काय को अपने वश में रखे वही सच्चा योगी होता है।
संयम
विज्ञापन वे करते हैं जिन्हें अपनी साधना पर विश्वास नहीं होता है।
संयम
निरतिचार व्रत पालन ही संसार के विच्छेद का कारण है।
संयम
व्रतहीन मनुष्य निरन्तर भाग्यहीन धन धान्यादि से रहित भयभीत तथा सदा दुःखी रहता है।
संयम
अनुशासन मात्र अपने जीवन को ही नहीं अपितु परिवार, समाज, देश व सम्पूर्ण विश्व को उज्ज्वल करता है।
संयम
जो अपने ऊपर शासन नहीं करेगा वह सदैव दूसरों का सेवक रहेगा।
संयम
जो अपनी बुराइयों पर विजय पा लेता है वही अजेय होकर संसार पर शासन करता है।
संयम
सांसारिक उपलब्धियाँ समय में हैं, आध्यात्मिक उपलब्धि संकल्प में है।
संयम
संकल्प तलवार है जो समय को मारती है, शाश्वत की रक्षा करती है।
संयम
संसार में पत्थर से शक्तिशाली लोहा, लोहे से शक्तिशाली अग्नि, अग्नि से शक्तिशाली पानी, पानी से शक्तिशाली हवा और हवा से शक्तिशाली संकल्प होता है।
संयम
संन्यास समाधि का प्रथम चरण है।
संयम
दुर्बल मन का मनुष्य संयम पालन नहीं कर पाता, पर जिसके मन में लगन होती है वह अभ्यास से संयम पालना सीख लेता है।
संयम
सुख-शान्ति; ऐशो-आराम से नहीं संयम से प्राप्त होती है।
संयम
सब संयमों का मूल जिह्वा और जननेन्द्रिय के नियन्त्रण में बसता है।
संयम
मन के विकारों को जीतने के लिए इन्द्रिय संयम की सहायता लें, विजय निश्चित होगी।
संयम
आत्मसंयम की रक्षा अपने खजाने के समान करो क्योंकि उससे बढ़कर इस जीवन में और कोई निधि नहीं है।
संयम
जो तन व धन को संभाले वह संसारी और जो मन व वचन को संभाल ले वह संन्यासी है।
संयम
निषिद्ध कर्मों को करते हुए कोई व्यक्ति साधक नहीं बन सकता है।
संयम
साधक को चाहिए कि वह अपने को कभी भोगी या संसारी व्यक्ति न समझे, उसमें सदा यह जागृति रहनी चाहिए कि ''मैं साधक हूँ''।
संयम
साधक उसी को कहते हैं, जो निरन्तर सावधान रहता है।
संयम
जैसी परिस्थिति आये उसी में साधना करनी चाहिए, अनुकूलता देखोगे तो साधना नहीं हो पायेगी।
संयम
साधुत्व का सम्बन्ध ख्याति, पूजा और लाभ से नहीं स्वयं से होता है।
संयम
शास्त्र की आँख से जो देख-देखकर चलता है, जो देख-देखकर बोलता है, जो देख-देखकर पूर्ण क्रिया करता है वही साधु है।
संयम
मात्र व्यापार करने से लाभ नहीं होता है बल्कि समझदारी से जो व्यापार करता है उसे लाभ होता है अन्यथा मूलधन भी खो बैठता है। इसी प्रकार साधु बनने मात्र से कल्याण नहीं होता, साधु बनने के बाद साधुपने के प्रति वफादार रहने से व साधुपने का पूर्ण पालन करते रहने से ही कल्याण होता है।
संयम
जो हृदय से कोमल हो और काया से खूब कठोर वह साधक आत्म कल्याण साध सकता है।
संयम
जितनी अधिक सहजता उतनी अधिक साधुता।
संयम
साधु का जीवन साधा हुआ नहीं सहज होता है।
संयम
साधु में यदि आध्यात्मिक निधि नहीं है तो मानवता पर कलंक है।
संयम
मुनियों का संयम गृहस्थों को दबाने के लिए नहीं बल्कि अपनी महत्त्वकांक्षा को मिटाने के लिए होता है।
संयम
दुःख आने पर प्रसन्न होना बहुत ऊँची साधना है।
संयम
शरीर का शृंगार दूसरों के लिए होता है किन्तु चेतना का शृंगार स्वयं के लिए।
संयम
साधु साधना में श्रम करते हैं इसलिए श्रमण कहलाते हैं।
संयम
हे आत्मन्! आप अपने प्राण दे देना पर नियम मत छोड़ना।
संयम
असंयमित जीवन पशु जैसा जीवन है, जिसके जीवन में संयम है उनको शान्ति है।
संयम
गाड़ी के चारों पहिया ठीक होना चाहिए एवं श्रावक की चारों कषायें मन्द होना चाहिए।
संयम
सिर्फ पुरुष ही क्यों अपने अंदर के रावण को मारें? स्त्रियों को भी चाहिए कि वो भी अपने अंदर की कैकई, मंथरा, शूर्पनखा को मारें।
संयम
सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है।
संयम
यथासंभव हमें अपना जीवन 'सहज' में जीना चाहिए और किसी आदत को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।
संयम
जब-तक सविकल्प अवस्था है तब तक अपनी गलती खोजो।
संयम
अनेक जीवों को समझाने की अपेक्षा एक स्वयं को समझा लेना अच्छा है।
संयम
प्रशंसा से पिघलना मत और आलोचना से उबलना मत।
संयम
आँखें ही साधना की सिद्धि कर देती हैं और आँखें ही साधना का नाश करती हैं।
संयम
इन्द्रिय निरोध तभी संभव है जब मन वश में हो।
संयम
गुप्ति, समिति, परीषहजय चारित्र की रक्षा करने वाली भावनाएँ हैं।
संयम
जितना विशुद्ध संयम होता जाता है, उतना ज्ञान का क्षयोपशम होता जाता है।
संयम
दुःख में कभी घबराओ मत और सुख में कभी इतराओ मत।
संयम
सत्य समझो, सहिष्णु व शीतल बनो, संक्लेश से बच जाओगे।
संयम
उत्तम पुरुष वही है, जो अपने मन को वश में रखकर विपरीत स्थिति में धैर्य रखकर उन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लें।
संयम
मन में विकार उत्पन्न करने वाली वस्तुओं के पास होने पर भी जिनके मन में पाप नहीं आता, वे ही धीर पुरुष माने जाते हैं।
संयम
परिणामों में निर्मलता आने से असंयम स्वयं ही भाग जायेगा।
संयम
समता की परीक्षा विषमता में ही होती है। समता के बिना साधुपन नहीं रह सकता।
संयम
समता के अभाव में मौन, अध्ययन, नियम, व्रत, उपवास, तप सब व्यर्थ हैं।
संयम
जितना विशुद्ध संयम होता जाता है, उतना ज्ञान का क्षयोपशम होता जाता है।
संयम
सत्य समझो, सहिष्णु व शीतल बनो, संक्लेश से बच जाओगे।
संयम
उत्तम पुरुष वही है, जो अपने मन को वश में रखकर विपरीत स्थिति में धैर्य रखकर उन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लें।
संयम
मन में विकार उत्पन्न करने वाली वस्तुओं के पास होने पर भी जिनके मन में पाप नहीं आता, वे ही धीर पुरुष माने जाते हैं।
संयम
परिणामों में निर्मलता आने से असंयम स्वयं ही भाग जायेगा।
संयम
समता की परीक्षा विषमता में ही होती है। समता के बिना साधुपन नहीं रह सकता।
संयम
समता के अभाव में मौन, अध्ययन, नियम, व्रत, उपवास, तप सब व्यर्थ हैं।
संयम
जीवन संघर्ष में वही सफल होते हैं, जिन्हें माता-पिता ने शान्त रहने और धैर्य रखने की शिक्षा दी हो, धैर्य प्रतिभा का एक आवश्यक अंग है।
संयम
असावधानी विनाश को शीघ्र ही बुलाती है, सचेत रहो, सावधानी रखो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अंदर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है।
संयम
ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है।
संयम