Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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111 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

तीर्थङ्कर उनके माता-पिता, बलभद्र, चक्रवर्ती, अर्धचक्रवर्ती, देव और भोगभूमि के जीवों का आहार होता है पर नीहार नहीं होता है।
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देव-नारकी, भोगभूमि के जीव, चक्रवर्ती, तीर्थङ्कर, नारायण, बलभद्र एवं कामदेव इनकी दाड़ी-मूँछ नहीं होती है।
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महाविदेह में एक-एक क्षेत्र के आश्रित छियानवे करोड़ गाँव होते हैं, नगर, मटम्ब, पत्तन आदि सब इसी में गर्भित हैं।
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एक-एक विजयार्द्ध पर एक सौ दस-एक सौ दसविद्याधरों की नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी के आश्रित एक-एक करोड़ नगर हैं, इस तरह ढाईद्वीप में एक सौ सत्तर विजयार्द्ध हैं और अठारह हजार सात सौ कुल उनकी नगरियाँ हैं, पाँच अरब कुल जनसंख्या है।
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सोलह अङ्ग प्रमाण जीव राशि में एक अङ्कको अनन्त के बराबर जानना चाहिए, तीन अङ्क मध्यम अनन्तानन्त प्रमाण सिद्ध हैं और तेरह अङ्क प्रमाण सभी जीव जानना, किन्तु बारहअङ्क प्रमाण अनाद्यनन्त निगोदिया और एक अङ्क में बहु भाग निगोदिया हैं और शेष में चारों गतियों के जीव हैं, देव राशि भी मध्यम अंसख्यात है।(उनतीस अङ्क मनुष्यों का प्रमाण कहा है, वह सामान्य है)।
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चक्रवर्ती के पुत्र-पुत्रियों की संख्या तिलोयपणत्ति में लिखी है, इससे सिद्ध है कि शान्ति, कुन्थु, अरनाथ तीर्थङ्करों के भी पुत्रियाँ हुयी हैं।
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सिद्धक्षेत्र, सिद्धशिला, प्रथमस्वर्ग का ऋजुविमान, ढाईद्वीप, प्रथम नरक का पहला पटल ये पाँच पैतालीस लाख योजन के हैं।
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पञ्चम काल में प्रथम तीन हजार वर्ष में चौसठ जीव विदेह क्षेत्र जाकर नौ वर्ष में दीक्षा ले कर अलग-अलग केवल ज्ञान प्राप्त कर, नौ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व काल तक विहार कर मुक्त होंगे, अगले तीन हजार वर्ष में बत्तीस, इसके अगले तीन हजार वर्ष में सोलह, आठ, चार, दो, एक, क्रमश: इक्कीस हजार वर्ष में एक भवावतारी होंगे।
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तीर्थङ्करों के कुल में कोई नरक नहीं जाता हैकृष्ण जी गए हैं।
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चक्रवर्ती और तीर्थङ्कर की जठराग्नि ज्वाला मुखी के समान तीव्र होती है।
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महाविदेहों में हमेशा चौथा काल, उत्तमादि भोग भूमि में क्रम से पहला, दूसरा, तीसरा काल रहता है।
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पाँच विदेह क्षेत्रों में एक सौ सत्तर विद्याधरों की नगरियों में एवं आठ सौ पचास म्लेच्छ खण्डों में हमेशा चौथा काल ही होता है।
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तृतीय काल के प्रारम्भ से अन्त तक एवं असंख्यातद्वीप समुद्रों में हमेशा तीसरा काल ही रहता है अर्थात् जघन्य भोग भूमि रहती है।
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नरकों में सदा छठवा काल 'दुषमा-दुषमा' ही होता है।
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चौरासी लाख बिलों में चौरासी लाख स्थाई वैतरणी नदियाँ होती हैं।
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विदेह क्षेत्र में बत्तीस नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी में एक तीर्थङ्कर हो सकते हैं, छ: खण्ड होते हैं, हमेशा चौथा काल होता है, सामान्य केवली हमेशा रहते हैं, आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी भी हमेशा रहते हैं, एक नगरी के तीर्थङ्कर दूसरी नगरी में नहीं जाते हैं।
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लवण समुद्र में राक्षस द्वीप के विचित्री कूट पर्वत पर पचास योजन लम्बी-चौड़ी लङ्का है।
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सात राजू में एक लाख चालीस हजार योजन(मध्यलोक का प्रमाण) कम करने पर ऊर्ध्व लोक का प्रमाण होता है और अधोलोक सात राजू प्रमाण है।
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हुण्डावसर्पिणी काल के दोष से चौथे काल में अठ्ठावन शलाका पुरुष, तीर्थङ्कर की पुत्रियाँ, चक्रवर्ती की हार, तीसरे काल में आदिनाथ जी का मोक्ष इत्यादि अनहोनी हुई हैं।
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भोगभूमि में सात दिन तक उत्तानाशय (पीट के सहारे लेटना), सात दिन तक अङ्गूठा चूसना, सात दिन तक रेंगना, सात दिन तक लड़खड़ाकर चलना, सात दिन तक स्थिर चलना, सात दिन में कलाएँ प्राप्त करना, सात दिन में गुणों की प्राप्ति करना, इस प्रकार जघन्य भोगभूमि में मनुष्य उनञ्चास दिन में जवान, मध्यम भोगभूमि में पैंतीस दिन में और उत्तम भोगभूमि में इक्कीस दिन में जवान हो जाते हैं।
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भोग भूमि में खाने को है पर भूख नहीं है और नरकों में भूख है पर खाने को नहीं है।
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भोगभूमि में भाई-बहिन ही पति-पत्नि बन जाते हैं और उनको सम्यक्त्व हो जाता है और वे स्वर्ग ही जाते हैं, यदि कर्मभूमि में ऐसा हो तो वे भाई-बहन नरक चले जायेंगे।
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भोगभूमि का वैभव- भूमि निर्मल दर्पणवत् साफ-स्वच्छ, कीड़ों से रहित, पाँच वर्ण की चार अङ्गुल प्रमाण मधुर सुगन्धित घास। जल जन्तु रहित वापिकाएँ। औषधि युक्त अमृत तुल्य निर्मल जल। अनेक प्रकार के अनुपम आसनो से युक्त मृदु शय्याओं वाले प्रासाद, स्वर्ण एवं रत्न मयी पर्वत, नदियों के दोनों तटों पर रत्नों से युक्त सीढ़ियाँ। विकलत्रय असंज्ञी जीवों से रहित जल, रोग-कलह-ईर्ष्या का अभाव। रात-दिन एवं सर्दी-गर्मी-अन्धकार के भेद से रहित मौसम। पापों से रहित, पति पत्नी के अलावा परिवार-ग्राम-नगरादि से रहित। एक पुरुष में नौ हाथियों का बल। प्रशस्त बत्तीस लक्षणों से युक्त कवलाहारी होकर भी नीहार से रहित। दस प्रकारके कल्पवृक्ष, बत्तीस प्रकार के पेय पदार्थ, नाना प्रकार के वादित्र, सोलह प्रकार के आहार। सत्रह प्रकार के व्यञ्जन, चौदह प्रकार के छाल, एक सौ आठ प्रकार के खाद्य पदार्थ, तीन सौ त्रेसठ प्रकार के (मिष्टान्न) स्वाद्य पदार्थ। त्रेसठ प्रकार के रस, सोलह हजार प्रकार की फूल मालाएं, सोलह प्रकार के भवन-स्वस्तिक-नन्द्यावर्त, ''चक्रवर्ती के भोग से अनन्तगुणे भोग'', विक्रिया द्वारा अनेक प्रकार के शरीर, भोग सामग्री, पुरूष के सोलह प्रकार व स्त्री के चौदह प्रकार के आभूषण, चौसठ कलाओं से युक्त कला गुण, वज्रवृषभनाराच संहनन, सम चतुरस्र संस्थान युक्त शरीर। पुरुष का छींक से व स्त्री का जम्भाई से कष्ट रहित मरण होता है एवं स्वर्ग ही जाते हैं।
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इस जम्बूद्वीप में सात क्षेत्र, एक मेरू, दो कुरू(देवकुरु उत्तरकुरु), जम्बू और शाल्मलि दो वृक्ष, छह कुलाचल, कुलाचलों पर स्थित छह महा सरोवर, चौदह महानदियाँ, बारह विभङ्ग नदियाँ, सोलह वक्षारगिरि, चार गजदन्त, चौंतीस नगरियाँ, चौंतीस रजतगिरि, चौंतीस वृषभाचल, अड़सठ गुफाएँ, चार गोलाकार नाभिगिरि एवं सैंतीस सौ चवालीस विद्याधर राजाओं के नगर हैं, इन सभी से यह जम्बूद्वीप अत्यधिक सुशोभित है। इस से दूने धातकीखण्ड में और पुष्करार्ध में हैं। लक्ष्मणजी के समान कृष्णजी ने भी कोटि शिला उठाई प्रतिनारायण जरासन्ध को मारने का निश्चय किया।
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विजयार्द्ध का माप- जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के विजयार्ध की ऊँचाई पच्चीस योजन है, सवा छ: योजन पृथ्वी के नीचे स्थित है, पचास योजन चौड़ा है और चाँदी के समान सफेद वर्ण वाला है।
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समुद्रों के जल का स्वाद- लवण समुद्र के जल का स्वाद नमक के समान है। वारुणीवर समुद्र के जल का स्वाद शराब के समान है, घृतवर का जल घी और क्षीरवर का जल दूध के समान है। कालोदधि और अन्तिम स्वयम्भूरमण समुद्र का जल पानी के समान है। पुष्करवर समुद्र का मधु और पानी के समान तथा बाकी समस्त समुद्र इधु रस के समान स्वाद वाले हैं।
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समुद्रों में मत्स्यों की अवगाहना- लवण समुद्र के तीर पर सम्मूच्छन जन्म से उत्पन्न हुये महामत्स्य नौ योजन लम्बे तथा समुद्र के मध्य में अठारह योजन लम्बे हैं, गर्भ जन्म से उत्पन्न होने वाले मत्स्यों की लम्बाई सम्मूच्छन मत्स्यों की लम्बाई से आधी होती है। स्वयम्भूरमण समुद्र के तीर पर मत्स्यों की लम्बाई पाँचसौ योजन की, समुद्र के मध्य में एक हजार योजन लम्बे, पाँच सौ योजन चौड़े, ढ़ाई सौ योजन ऊँचे मत्स्य हैं, राघवमत्स्य का घनफल साढ़े बारह करोड़ योजन से ज्यादा निकलता है। लवणसमुद्र में नौ योजन, कालोदधि में अठारह योजन और स्वयम्भूरमण में एक हजार योजन इन तीन समुद्रों के सिवाय अन्य समुद्रों में मत्स्यादि जलचर जीव नहीं होते हैं।
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आदिनाथ भगवान् का माता के गर्भ में वैसा ही निवास था जैसा कि जल में सूर्य प्रतिबिम्बित होता है।
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श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव के बैरी सूर्पक नामक देव ने वसुदेव का हरण किया, उन्होंने मुक्कों से उसकी पिटाई की तो छूटकर गझ्झा नदी में गिरे, वहाँ से निकलकर जङ्गल में घूमने लगे वहाँ म्लेच्छों के राजा ने उन्हे देखा जिससे म्लेच्छराज की जरा नामक कन्या को व्याहकर वहीं रहने लगे और उस कन्या से जरत्कुमार नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। नेमिनाथ भगवान् जब गर्भ में आये तब प्रतिदिन, दिन में तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी, चौदह रत्नों की एक-एक हजार देव रक्षा करते थे।
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नव निधियाँ-1.कालनिधि- में ज्योतिष्शास्त्र, निमित्तशास्त्र, न्यायशास्त्र कलाशास्त्र, व्याकरणशास्त्र पुराण आदि का सद्भाव होता है। 2.महाकालनिधि- में विद्वानों के द्वारा निर्णय करने योग्य पञ्च लोह आदि नाना प्रकार के लोहों का सद्भाव होता है। 3.पाण्डुकनिधि- में शालि, ब्रीही, जौं आदि समस्त प्रकार के धान्य तथा कड़वे-चरपरे आदि पदार्थों का सद्भाव होता है। 4.माणवकनिधि-में कवच, ढाल, तलवार, बाण, शक्ति, तोमर, चक्रादि नाना प्रकार के दिव्य शस्त्रों का सद्भाव होता है। 5.सर्पनिधि- में शय्या, आसन आदि नाना प्रकार की वस्तुओं तथा घर के उपयोग में आने वाले नाना प्रकार के बर्तनों का सद्भाव होता है। 6.सर्वरत्ननिधि- इन्द्रनीलमणि, महानीलमणि, वज्रमणिआदि बड़ी-बड़ी दो शिखा के धारक उत्तमोत्तम रत्नों का सद्भाव होता है। 7.शङ्खनिधि-भेरी, शङ्ख, नगाड़े, वीणा, छल्लरी और मृदङ्ग आदि आघात से तथा फूँककर बजाने योग्य नाना प्रकार के बाजों का सद्भाव होता है। 8.पद्मनिधि- पाटाम्बर, चीन, महानेत्र, दुकूल, उत्तम कम्बल तथा नाना प्रकार के रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्रों का सद्भाव होता है। 9.पिङ्गलनिधि-कड़े कटि सूत्र आदि स्त्री-पुरूषों के आभूषण और हाथी-घोड़ा आदि के आभूषणों का सद्भाव होता है। ये नवनिधियां कामवृष्टि नामक गृहपति के अधीन होती हैं और सदा चक्रवर्ती के मनोरथों को पूर्ण करती हैं।
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श्वेताम्बर मान्यता- नन्दीश्वरद्वीप तक विद्याधर जा सकते हैं, और ऋद्धिधारी मुनि तेरहवे रुचकगिरि द्वीप तक जा सकते हैं।
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इस अध्याय में वर्णनीय विषय: 1. जम्बूद्वीप का वर्णन नक्शा द्वारा, 2. सुमेरुपर्वत का वर्णन एवं उसकी गणना, कौन सा वन कहाँ है, कितनी ऊँचाई पर है 3. नन्दीश्वर द्वीप का वर्णन, सभी द्वीप और समुद्रों को दूना करके एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन प्रमाण निकलता है, 4. छियानवे अन्तर्द्वीप का वर्णन, 5. पैतालीस लाख योजन प्रमाण ढाईद्वीप का नक्शा द्वारा वर्णन करना चाहिए, 6. मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन जिनालय का वर्णन, 7. पाँच भरत, पाँच ऐरावत के त्रिकाल सम्बन्धी तीस चौबीसी के सात सौ बीस तीर्थङ्करों का वर्णन करना चाहिए।
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''माता'' का सम्बोधन भारत के साथ है पर अन्य देशों के साथ नहीं।
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राष्ट्र पिता की बेटी 'आजादी' है, उसकी रक्षा के लिये पति का चुनाव होता है।
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ढोल की पोल-नरतन बड़ा अनमोल- सब कुछ डांवा डोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को। दाने गिनकर दाल मिलेगी, गेहूँ की बस छाल मिलेगी, पानी के इञ्जेक्शन होंगे, घोषित रोज इलेक्शन होंगे। हलवाई हैरान मिलेंगे, विन चीनी मिष्ठान्न मिलेंगे, जलने वाला खेल मिलेगा, बस मिट्टी का तैल मिलेगा। शीशी में पेट्रोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल..।। रोते हुए बाजार मिलेंगे, हँसते हुए सियार मिलेंगे, धन्धे केवल काले होंगे, जमकर के घोटाले होंगे। ऊसर होंगे, बञ्जर होंगे, सूखे हुए समन्दर होंगे, पेड़ न होंगे, हवा न होगी, अस्पताल में दवा न होगी। कटा-फटा भूगोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के अन्दर पोल.....।। भारी-भारी बस्ते होंगे, आँसू सबसे सस्ते होंगे, बच्चे बौने हो जायेगें, स्वयं खिलौने हो जायेगें। पढ़े-लिखे बेकार मिलेंगे, हाथों में हथियार मिलेंगे, पुण्य न होगा, पाप ही होगा, राम-नाम का जाप न होगा। मारकाट का बोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल.....।। सारे कवि स्वच्छन्द मिलेंगे, विना भाव के छन्द मिलेंगे, गीत न होंगे, गले न होंगे, आँख किसी की सजल न होगी। मञ्चों पर लफ्फाजी होगी, सिर्फ चुटकुले बाजी होगी, जो सस्तें में बिक जायेंगे, उतने ज्यादा टिक जायेंगे। मात्र यही किल्लोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। राजनीति में तन्त्र मिलेगा, इक गहरा षडयन्त्र मिलेगा, न सुभाष न गाँधी होगें, खादी में अपराधी होंगे। जनता गूँगी-बहरी होगी बेबस कोट-कचेरी होगी, गुण्डों को संरक्षण होगा, संसद में आरक्षण होगा। हर क्षेत्र में राजनीति का रोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। प्यासों की भी रैली होगी, गङ्गा बिल्कुल मैली होगी, घरों-घरों में फैक्स लगेगा, सांसों पर भी टैक्स लगेगा। कम्प्यूटर की माया होगी, बेकारी की छाया होगी, चादर नीचे पड़ी मिलेगी, खटिया सबकी खड़ी मिलेगी। सबका बिस्तर गोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। बाहर से डॉलर आयेंगे, उनको वही देख पायेंगे, जो अंग्रेजों के प्यारे होंगे, भारत के हत्यारे होंगे। आज हँस रहे कल रोओगे, पता नहीं कितना खोओगे, आजादी की लाश मिलेगी, जनता बहुत उदास मिलेगी। मातम का माहौल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।।
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नीरस जीवन को सरस, सूने आँगन में रौनक, पतझड़ में बसन्त, निराश जीवन में उत्साह भरने वाले त्यौहार कहलाते हैं।
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