Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Mind

मन

369 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

जिस प्रकार समुद्र की लहरें कचरे को बाहर फेंक देती हैं उसी प्रकार सज्जन पुरुष भी मानसिक विकार रूपी कचरे को तुरंत सम्यक् चिन्तन से बाहर फेंक देते हैं।
मन
लोग हमें अच्छा मानें या न मानें, अच्छा जानें या न जानें, अच्छा कहें या न कहें, पर हमारे भाव अगर अच्छे हैं तो हमारे मन में हर समय प्रसन्नता रहेगी और मरने पर सद्गति होगी।
मन
विचार शुद्धि से आचार शुद्धि स्वयमेव होती है।
मन
आपका हर विचार आपके भविष्य का बीज बनता है।
मन
आचरण रहित विचार कितने अच्छे क्यों न हों, उन्हें खोटे मोती की तरह समझना चाहिए। अच्छे विचार रखना भीतरी सुंदरता है।
मन
महान् विचार जब कार्य रूप में परिणत हो जाते हैं तब महान् कृतियाँ बन जाती हैं।
मन
मारना चाहते हो तो स्वयं के बुरे विचारों को मारो।
मन
प्रसन्नता के सूत्र–संतोषी बनें, आशावादी बनें, हमेशा खुश रहें, हमेशा सकारात्मक एवं अच्छी सोच रखें, हमेशा चिन्ता मुक्त रहें, परोपकार की भावना रखें, विपत्ति में सोचें जो होगा सो देख लेंगे इत्यादि।
मन
बुरा मत सोचना क्योंकि बुरा सोचने वाला भला नहीं बन पाता है।
मन
मनुष्य दुःखी, निराश, चिंतित, उद्विग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है।
मन
जिन्दगी मिली है जीने के लिए उसको हँस के जियो क्योंकि आपको देखकर भी कोई मुस्कुराता होगा।
मन
अच्छे ने अच्छा, बुरे ने बुरा जाना मुझे जिसकी जैसी सोच उसने वैसा ही पहचाना मुझे।
मन
जिसकी बड़ी सोच होती है वही सबसे बड़ा होता है।
मन
सुख-दुःख का वेदन देखने से नहीं सोचने से होता है, यदि देखने से दुःख होने लगे तो फिर अग्नि के देखने से आँखें जलने लगेंगी।
मन
हम व्यक्ति के कामों से यह जानते हैं कि वह क्या-क्या सोचता है, न कि उसके बताने पर कि वह क्या सोचता है।
मन
आप वही बनते हैं जिसके बारे में आप पूरा दिन सोचते हैं।
मन
आप जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, उनमें मास्टरी प्राप्त करते हैं।
मन
आप वो हैं जो आपकी सोच है अतः अपनी सोच को सही बनायें, वरना लोहे को दूसरा नहीं बल्कि उसकी जंग ही उसे नष्ट कर देती है।
मन
फर्क सिर्फ सोच का होता है सकारात्मक या नकारात्मक वरना सीढ़ियाँ वही होती हैं पर किसी को ऊपर ले जाती तो किसी को नीचे लाती हैं।
मन
दूसरों के प्रति हमारे शुभ विचार हमारी सुप्त चेतना को जाग्रत कर हमें प्रबल शक्ति प्रदान करते हैं।
मन
जिसके वश में अपना मन नहीं है, उसको सिद्धि कैसे प्राप्त होगी?
मन
भविष्य का भय न करने वाला ही वर्तमान का आनंद ले सकता है।
मन
जिसके परिणाम विशुद्ध होते हैं उसकी आँखें और चेहरा चमकता है और जिसका मन विकृत है उसकी भाषा और देह विकृत हो जाती है।
मन
चंचल मन वाला खोटा पुरुष सोचकर ठीक रीति निकाल भी ले पर उसे व्यवहारिक रूप देते हुए डगमगाता है और अपने अभिप्राय को कभी पूरा नहीं कर पाता है।
मन
चिन्ता से रूप, बल और ज्ञान का नाश होता है अर्थात् चिन्ता चिता बनाती है। जिसे नहीं करना चाहिए उसे करने से और जिसे करना चाहिए उसे नहीं करने से ही चिन्ता और भय होते हैं।
मन
जितना समय आप किसी कार्य की चिंता में लगाते हैं, यदि उतना ही समय आप उस कार्य में लगाएँ तो चिंता जैसी कोई चीज ही नहीं रह जाएगी।
मन
बिस्तर पर चिंताओं को ले जाना अपनी पीठ पर गट्ठा बाँधकर सोना है।
मन
चिन्ताओं से दूर भाग्यशाली व्यक्ति ही जीवन का आनन्द ले सकता है।
मन
कार्य करने के पहले सोचना चिंतन है बाद में सोचना चिंता है।
मन
जिस प्रकार ईंधन सहित अग्नि में वृद्धि होती है उसी प्रकार चिंता युक्त मनुष्य के संसार की वृद्धि होती है क्योंकि चिंता से कर्म बंध होता है। ‘‘दरिद्र को सदा अनेक प्रकार की चिंता होती हैं। जो होने वाला है वह होता है, जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता है इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले को चिंता की बाधा नहीं सताती है।’’
मन
आप जिसके कारण चिंता करते हो उसका कुछ नहीं बिगड़ता, पर आपका सब कुछ नाश को प्राप्त हो रहा है।
मन
चिंतन चिदानंद के पास ले जाता है और चिन्ता चिता के पास ले जाती है।
मन
समय से पहले बूढ़ा होना, समय से पहले मरना, अपनी प्रज्ञा को नष्ट करना अपने शारीरिक एवं मानसिक बल को नष्ट करना हो तो चिन्ता करो।
मन
जिसका जितना विशाल चिंतन है उसके समीप चिन्ता परमाणु मात्र भी नहीं मिलती है।
मन
अपने को पर का और पर को अपना कर्त्ता मानने पर चिंता उत्पन्न होती है।
मन
चिन्ता से मस्तिष्क की नसें फूल जाती हैं, जिससे व्यक्ति ‘पागल’ हो जाता है।
मन
चिन्ता के दुष्परिणाम–१. मन का उदास रहना, २. बुद्धि का भ्रष्ट होना, ३. मस्तिष्क का भारीपन होना, ४. चेहरे का मुरझाना, ५. शरीर की शक्ति का क्षीण होना, ६. क्रोधी स्वभाव का होना, ७. बालों का सफेद होना, ८. समय से पूर्व वृद्धत्व का आगमन होना है।
मन
वैद्य और वक्ता दोनों ही धीरता से काम लेते हैं। ‘‘चिंता सब सुखों को नष्ट करती है।’’
मन
कल की चिंता करने वाले, आने वाले जन्म की चिंता नहीं कर पाते हैं।
मन
बुद्धि की स्थिरता के बिना भी आदर्श पूरा नहीं होता है।
मन
अगर हमारा मन कमजोर है तो हमें एक राई बराबर घटना पहाड़ जैसी लगने लगती है, अगर हमारा मन मजबूत है तो पहाड़ जैसी घटना भी राई बराबर नजर आती है।
मन
चिन्ता से रूप, बल और ज्ञान का नाश होता है अर्थात् चिन्ता चिता बनाती है। जिसे नहीं करना चाहिए उसे करने से और जिसे करना चाहिए उसे नहीं करने से ही चिन्ता और भय होते हैं।
मन
जितना समय आप किसी कार्य की चिंता में लगाते हैं, यदि उतना ही समय आप उस कार्य में लगाएँ तो चिंता जैसी कोई चीज ही नहीं रह जाएगी।
मन
बिस्तर पर चिंताओं को ले जाना अपनी पीठ पर गट्ठा बाँधकर सोना है।
मन
चिन्ताओं से दूर भाग्यशाली व्यक्ति ही जीवन का आनन्द ले सकता है।
मन
सबसे ज्यादा हिंसा बुरा चिन्तन करने से होती है।
मन
उपहार का मूल्य बढ़ता जा रहा है और भावनाओं का अवमूल्यन हो रहा है।
मन
किसी दिन अखबार नहीं मिले और चाय नहीं मिले तो पेट साफ नहीं होगा मतलब हम किसी वस्तु के नियंत्रण में हैं।
मन
हमारी आदत के कारण हम स्वयं से ज्यादा अपने निकट के लोगों को परेशान करते हैं।
मन
कार्य करने के पहले सोचना चिंतन है बाद में सोचना चिंता है।
मन
आज आदमी को भोजन की भूख कम सम्मान की भूख ज्यादा सताती है।
मन
जिस प्रकार ईंधन सहित अग्नि में वृद्धि होती है उसी प्रकार चिंता युक्त मनुष्य के संसार की वृद्धि होती है क्योंकि चिंता से कर्म बंध होता है। ''दरिद्र को सदा अनेक प्रकार की चिंता होती हैं। जो होने वाला है वह होता है, जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता है इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले को चिंता की बाधा नहीं सताती है।''
मन
आप जिसके कारण चिंता करते हो उसका कुछ नहीं बिगड़ता, पर आपका सब कुछ नाश को प्राप्त हो रहा है।
मन
चिंतन चिदानंद के पास ले जाता है और चिन्ता चिता के पास ले जाती है।
मन
समय से पहले बूढ़ा होना, समय से पहले मरना, अपनी प्रज्ञा को नष्ट करना अपने शारीरिक एवं मानसिक बल को नष्ट करना हो तो चिन्ता करो।
मन
जिसका जितना विशाल चिंतन है उसके समीप चिन्ता परमाणु मात्र भी नहीं मिलती है।
मन
अपने को पर का और पर को अपना कर्त्ता मानने पर चिंता उत्पन्न होती है।
मन
वैद्य और वक्ता दोनों ही धीरता से काम लेते हैं। ''चिंता सब सुखों को नष्ट करती है।''
मन
कल की चिंता करने वाले, आने वाले जन्म की चिंता नहीं कर पाते हैं।
मन
जब तक मन में विकल्प चलता है तब तक गुरु प्रभु कुछ भी नहीं दिखता है, विकल्प संसार बढ़ाने वाला है।
मन
अगर हमारा मन कमजोर है तो हमें एक राई बराबर घटना पहाड़ जैसी लगने लगती है, अगर हमारा मन मजबूत है तो पहाड़ जैसी घटना भी राई बराबर नजर आती है।
मन
मनुष्य के मन पर भय का जितना प्रभाव पड़ता है, उतना और किसी शक्ति का नहीं।
मन
मानसिक पापों से सदा सावधान रहो, उनका परित्याग करो, मन से उन कुवासनाओं को निकाल दो, जो दुष्कर्म कराती हैं।
मन
आज टी.वी. के विभिन्न चैनलों ने आदमी का चैन छीन लिया है।
मन
जो बात आपके मन की सुख-शान्ति और संतुलन को विचलित करे उसे मत सुनिये, मत देखिये, मत समझिये।
मन
जो बहुत खिल-खिलाकर हँसते हैं, समझ लो भीतर-ही-भीतर बहुत दुःखी होते हैं, बात-बात पर हँसी भरे-पूरे जीवन का चित्र नहीं उभारती, जीवन की शून्यता और दर्द को उभारती है।
मन
क्षुद्र बातें क्षुद्र मन वालों को प्रभावित करती हैं।
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विपत्ति के समय विलाप करने से दुःख कम नहीं होता बल्कि बढ़ता ही है।
मन
जो हर पल हर घड़ी किसी न किसी छोटी बात से परेशान रहते हैं और सुन्दर जिन्दगी को शान्ति और आनंद में नहीं जीते हैं वे सिर्फ शिकायत करते हैं।
मन
अधिकांश समय हम नकारात्मक भावनाओं से ग्रसित रहते हैं, गुस्सा, चिड़चिड़ाहट, भय, खौफ आदि।
मन
आदमी कान का कच्चा होता है और स्त्री सन्देह की पुतली होती है।
मन
उत्तम जीवन जीने के लिए नकारात्मक सोचना छोड़ दें।
मन
आँसुओं को देखकर कठोर पत्थर हृदय भी पिघल जाता है।
मन
जो जैसा होता है उसे दूसरे भी वैसे ही नजर आते हैं।
मन
क्रोध, पानी और मन सदा नीचे की ओर बहता है।
मन