Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Effort & Diligence

पुरुषार्थ

637 सूत्र · पृष्ठ 8 / 9

आशा को सहेली और उत्साह को मित्र बनाइए आप मञ्जिल पा जायेंगे।
पुरुषार्थ
प्रतिभा से धन कमाया जाता है धन से प्रतिभा नहीं, आत्मविश्वास खोना ही सबसे बड़ी हानि है।
पुरुषार्थ
किसी काम में सफलता तभी मिलती है जब कार्य करने में आनन्द आये।
पुरुषार्थ
इतनी थकान काम करने की मेहनत से नहीं होती जितनी टाल-मटोली की आदत से होती है। हर चीज आसान होने से पहले मुश्किल लगती है।
पुरुषार्थ
रुकावटों से उबरने का एक ही हल है, हिम्मत न हारना। जैसे शान्त समुद्र से नाविक कभी कुशल नहीं बनता है, जब उसमें लहरें उठती हैं तब नाविक कुशलता प्राप्त करता है।
पुरुषार्थ
विना परीक्षा के पुरस्कार नहीं मिलता है।
पुरुषार्थ
जीवन एक युद्धक्षेत्र है, हम सब योद्धा हैं, यहाँ सभी को जीवन से लड़ना होता है। जीवन में मुसीबतें भी आती हैं, उनसे लड़ना सीखो मुसीबतों के सामने झुकने और घुटने टेकने से काम नहीं चलेगा। जीवन में आयी चुनौतियां भी एक चुनाव हैं, चुनाव का सामना तो करना ही होगा। हालांकि यह पैराशूट लेकर विमान से कूदने जैसा भारी काम है। तुम्हे इस निराशा के चक्र से बाहर निकलना होगा, कि 'मैं कुछ नहीं कर सकता' अपने साहस को मजबूत बनाइये और चलना शुरू कीजिए। सफलता आपका इन्तजार कर रही है, ईश्वर यद्यपि आपके साथ हर पल है, लेकिन पहला कदम आपको ही उठाना होगा।
पुरुषार्थ
ईश्वर पर भरोसा कीजिए पर ईश्वर के भरोसे मत बैठिये, क्योंकि ये विचार अच्छे सेहत मन्द को भी मानसिक तौर पर विकलाङ्ग बना देते हैं।
पुरुषार्थ
शिल्पकार की हथौड़ी के प्रहार को सहे विना मूर्ति नहीं बनती, कठोर विपदाओं के विना उन्नति नहीं होती।
पुरुषार्थ
मस्तिष्क की शक्ति अभ्यास है आराम नहीं। धैर्य सारे आनन्द और शक्तियों का स्रोत है।
पुरुषार्थ
प्रति दिन यदि थोड़ा भी धर्म, धन और श्रुत का सञ्चय किया जाये तो वह समुद्र से भी अधिक हो जायेगा।
पुरुषार्थ
पुरूषार्थी वह है जो दुर्भाग्य की रेखाएँ मिटा दे।
पुरुषार्थ
कोई कितना भी मूर्ख क्यों न हो कोशिश करने वाले को बुद्धिमान बनते देर नहीं लगती।
पुरुषार्थ
संकल्प लेना गाड़ी चालु करने जैसा है, चालु करने के बाद एक्सीलेटर दबाने से स्पीड बढ़ती है, इसी तरह विशुद्धि बढ़ाना ऐक्सीलेटर बढ़ाने की तरह है।
पुरुषार्थ
निर्णय एक बार, प्रयत्न बार-बार करना चाहिए।
पुरुषार्थ
लड़कर प्राप्त करने से अधिक समर्पण से प्राप्त कर सकते हैं। दुविधा से बचोगे तो सुविधा में रहोगे।
पुरुषार्थ
मञ्जिले उन चरणों को मिलती हैं जो थमते नहीं, बात उन्ही की बनती है जो मुश्किलों में रुकते नहीं।
पुरुषार्थ
कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं, जीता वही जो डरा नहीं।
पुरुषार्थ
यदि हाथ की लकीरों से भाग्य बनता है, तो जिनके हाथ नहीं हैं क्या उनका भाग्य नहीं होता है?
पुरुषार्थ
सफलता पूँछने से नहीं जूझने से मिलती है।
पुरुषार्थ
सच्चे पुरूषार्थ में अच्छे फल शीघ्र ही लगते हैं।
पुरुषार्थ
कार्य करते हुये भयभीत होना मूर्खता है और कार्य करते हुये सावधान रहना बुद्धिमत्ता है।
पुरुषार्थ
जहाँ खड़े हैं वही से कदम बढ़ाएँ, स्मरण रखें अपनी तुलना दूसरों से कदापि न करें, दूसरों की बराबरी करने की अपेक्षा उससे भी श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करें।
पुरुषार्थ
बैठे रहने से किस्मत भी बैठ जाती है, बीमारियाँ भी आ जाती हैं और जीवन भी बैठ जाता है।
पुरुषार्थ
करणीय कार्य को कल पर मत डालो उसे आज ही करो।
पुरुषार्थ
किरण ढूँढने वालों को उजालों की कमी नहीं रहती है।
पुरुषार्थ
काम सही ढङ्ग से किया जाय तो परिणाम सही निकलता है।
पुरुषार्थ
आज तक जो नहीं हुआ वह अब हो सकता है, यदि उसके पीछे निष्ठा और तीव्र प्रयत्न हो।
पुरुषार्थ
लक्ष्य सपने की तरह नहीं स्थिर सङ्कल्प हो, कोई कभी यह न सोचे कि मेरे विना कोई काम रूक जायेगा।
पुरुषार्थ
नियति व पुरूषार्थ में विश्वास रखने वाले का मनोबल बढ़ता है। मनोबल बीमारी और बुढ़ापे से बचाता है।
पुरुषार्थ
आधे मन से किये काम के नतीजे भी आधे ही आते हैं। अल्प समय की फिसलन दीर्घ काल तक दुःख देती है।
पुरुषार्थ
यदि सम्यक पुरुषार्थ है तो भविष्य कभी बुरा नहीं हो सकता है।
पुरुषार्थ
जन्म की कुण्डली ज्योतिषि बनाता है पर भविष्य की कुण्डली हम स्वयं बनाते हैं।
पुरुषार्थ
एक क्षण भी प्रमाद मत करो यह वाक्य छोटा है पर साधना बड़ी है।
पुरुषार्थ
अच्छे कार्य को कभी टालो मत, न उदासीनता से करो, कार्य को बोझ मत समझों, उसमें रूचि लो, हमेशा आँखें खुली और मुँह बन्द रखो।
पुरुषार्थ
तीन शक्ति- 1.उत्साहशक्ति, 2.मन्त्रशक्ति, 3.प्रभुत्व शक्ति सदा अपने पास रखें।
पुरुषार्थ
जिसको स्वयं पर भरोसा नहीं, वह राम भरोसे क्या कर लेगा? ईश्वर पर भरोसा रखिये, ईश्वर के भरोसे मत रहिये।
पुरुषार्थ
शक्ति को पहचानना, अभिव्यक्त करना और उसका उपयोग कर लाभ उठाना चाहिए।
पुरुषार्थ
जो सीखा उसका अभ्यास अवश्य करें, अभ्यास ही मनुष्य को परिपूर्ण बनाता है।
पुरुषार्थ
मनुष्य उद्यम से ही सफल होता है, धन एवं विद्या का स्थान तो गौण है।
पुरुषार्थ
लम्बी यात्रा का शुभारम्भ एक कदम से शुरू होता है।
पुरुषार्थ
विना लक्ष्य के फेंके गये तीर व्यर्थ हो जाते हैं एवं शक्ति और समय का दुरुपयोग होता है।
पुरुषार्थ
सफलता में प्रेरणा एक प्रतिशत, परिश्रम निन्यानवे प्रतिशत होना चाहिये।
पुरुषार्थ
क्या आप आँख खुलते ही बिस्तर छोड़ देते हैं?
पुरुषार्थ
क्या आप श्रम को सर्वश्रेष्ठ कर्म समझते हैं?
पुरुषार्थ
क्या आपको श्रम की रोटी खाने में आनन्द आता है?
पुरुषार्थ
जो काम आपको दिया जाता है, क्या उसे दूसरे की देख-रेख के विना ठीक तरह से कर लेते हैं?
पुरुषार्थ
खाने से नहीं पचाने से पहलवान बनते हैं, कमाने से नहीं बचाने से धनवान बनते हैं। पढ़ने से नहीं चिन्तन से विद्वान् बनते हैं, चर्चा से नहीं चर्या से भगवान् बनते हैं।।
पुरुषार्थ
क्या अभी तक आपने अपने जीवन जीने का कोई आदर्श लक्ष्य निर्धारित किया है?
पुरुषार्थ
एक-एक कदम चलते-चलते रास्ता पार हो जाता है, छोटे-छोटे कपड़ों को इकट्ठा कर सिलने पर ओढ़ने का वस्त्र बनता है जिसे कन्था कहते हैं, एक-एक सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते पर्वत की चोटियों पर पहुँच जाते हैं, एक-एक पद पढ़ते-पढ़ते विद्वान् बन जाते हैं और एक-एक कोंड़ी जोड़ते-जोड़ते करोड़पति बन जाते हैं, ये पाँच चीजें धीरे-धीरे प्राप्त होती हैं।
पुरुषार्थ
बाल अवस्था में विद्या अर्जित नहीं की, युवा अवस्था में धन अर्जित नहीं किया, प्रौढ़ अवस्था में तपस्या नहीं की तो वृद्ध अवस्था में क्या करेगा?
पुरुषार्थ
जिसके दिन धर्म-अर्थ-काम पुरुषार्थ से शून्य व्यतीत होते हैं वह लुहार की भस्त्रा के समान सांस लेता हुआ भी नहीं जीता है। अर्थात् धर्म को मुख्य रखकर प्रत्येक कार्य करना चाहिए।
पुरुषार्थ
'अभ्यास', रानी बछड़े के पास- राज महल के छत पर बैठे राजा ने रानी से कहा कि अपन अपने बल का परीक्षण करें कि अपन दोनों में कौन बलवान है? दोनों तैयार हो गये, बल का कैसे पता लगायें, राजा ने कहा! वह गाय खड़ी है उसके छोटे से बछड़े को वहाँ से यहाँ तक लाया जाए, पहले रानी गयी और पहले खण्ड तक बछड़े को ले आयी, फिर राजा गया वह भी वहाँ तक ले आया, दोनों समान एक बल वाले हुये, अब रानी छः महीने तक उस बछड़े को रोज लाती रही, राजा ने उस दिन से कोई अभ्यास नहीं किया, छः माह बाद रानी बोली अपने बल की पुनः परीक्षा कर लें, उसी बछड़े को लाने की बात हुयी, रानी तो बछड़े को उठाकर तत्काल विना थके ऊपर ले आयी, राजा उस बछड़े को उठा ही नहीं सका, राजा को बडा खेद हुआ सोचने लगा मेरी शक्ति कैसे क्षीण हुयी, तब रानी ने कहा हे राजन्! खेद मत करो यह अभ्यास की शक्ति है।
पुरुषार्थ
मञ्जिल उन्ही को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पङ्खों से कुछ नहीं होता, हौसलों में उड़ान होती है।।
पुरुषार्थ
अबुद्धि पूर्वक होने वाले इष्टानिष्ट में अपना भाग्य प्रधान होता है, बुद्धि पूर्वक होने वाले इष्टानिष्ट में अपना पुरुषार्थ प्रधान होता है।
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ से ही कार्य सिद्ध होते हैं सङ्कल्प करने मात्र से नहीं, जिस प्रकार सोये हुए सिंह के मुख में मृग अपने आप प्रवेश नहीं कर जाते हैं किन्तु सिंह को पुरुषार्थ करना पड़ता है।
पुरुषार्थ
उद्यम साहस धीरता, पराक्रमी मतिमान। एते गुण जो पुरूष में, सो निरभै बलवान।।
पुरुषार्थ
जीवन है अनमोल, इसे जो व्यर्थ गमाया करते हैं, अपना कर्तव्य भुलाकर, वे पीछे पछताया करते हैं। जो धर्म निभाते हैं अपना, सदा सुख पाया करते हैं, वो सच्चे अर्थों में जीवन को सफल बनाया करते हैं।।
पुरुषार्थ
जिन्दगी सिर्फ अपने ही दम पर जी जाती है, दूसरों के कन्धे पर तो अर्थी ही जाती है।
पुरुषार्थ
ईश्वर से आशीर्वाद ले लिया भरपूर फसल होगी, बीज बोया नहीं, फसल काटने गया तो कुछ नहीं मिला, आशीर्वाद के साथ पुरूषार्थ आवश्यक है, जैसे पुत्र माँगा पर ब्रह्मचर्य ले लिया तो सन्तान नहीं होती है।
पुरुषार्थ
इम्पोसिबल= यानी आई एम पोसिबल, अर्थात् असम्भव कुछ भी नहीं है।
पुरुषार्थ
साधना अभिशाप को वरदान बना देती है। भावना पाषाण को भगवान् बना देती है।।
पुरुषार्थ
साईकिल चलाना आता नहीं और ढलान में बैठ गए तो हाथ-पैर टूटेंगे और गिरने के भय से बैठेंगे ही नहीं तो सीख नहीं पायेंगे, विना सीखे पानी में कूदेंगे तो डूबेंगे और डूबने के भय से पानी में उतरेंगे ही नहीं तो सीखेंगे कैसे? इसी प्रकार योग्य गुरु से शिक्षा दीक्षा लेकर रत्नत्रय की आराधना करना चाहिए।
पुरुषार्थ
सम्बन्ध बनाए रखने के लिए व साधना में आगे बढ़ने के लिए कष्टों को सहना अनिवार्य है।
पुरुषार्थ
माँ-बाप दौलत दे सकते हैं पर योग्यता स्वयं प्राप्त करना पड़ती है।
पुरुषार्थ
एक लक्ष्य निश्चित करके उसमें मन को एकाग्र करना चाहिये, क्योंकि संयम पूर्वक किया गया अभ्यास शीघ्र ही सिद्धि को देता है।
पुरुषार्थ
मोक्ष मार्ग शरीर आश्रित नहीं आत्म आश्रित है, एवं सङ्कल्प में शक्ति होती है।
पुरुषार्थ
जिसका वर्तमान उज्ज्वल होता है उसका भविष्य नियम से उज्ज्वल होता है।
पुरुषार्थ
आचार्य श्री शान्तिसागर जी से एक व्यक्ति ने कहा पञ्चम काल में मोक्ष प्राप्त नहीं होता है, तब आप कष्ट क्यों सह रहे हैं, आचार्यश्री ने कहा यह पेड़ किसका है? व्यक्ति ने कहा- आम का, आचार्यश्री ने कहा- तो फल तोड़ लाओ, व्यक्ति बोला- मौसम में मिलेगा, आचार्यश्री ने कहा- इसी तरह मोक्ष का फल भी इसी मुनि मुद्रा में लगेगा। वे व्यक्ति आगे चलकर मुनि पायसागर बने।
पुरुषार्थ
साधु ने एक व्यक्ति को पारस मणि चार माह के लिए दिया, जितना सोना बनाना चाहो बना लो, वह बाजार में लोहा खरीदने गया, आज महँगा हैं कल खरीदेंगे, यह कहते कहते चार माह में लोहा नहीं खरीद सका, साधु ने अपना मणि वापस ले लिया, हमें भी नर भव रूपी मणि मिला, संयम का पालन कल करेंगे, ऐसा सोचकर सारा जीवन खो देते हैं।
पुरुषार्थ
पिता ने बेटों को बीज दिये और कहा सम्भाल के रखना, एक लड़के ने बेंच दिये, दूसरे ने तिजोरी में रख दिए, तीसरे ने खेत में बो कर सैकड़ों बोरा अनाज बना दिया, कुछ वर्षों बाद पिता ने बेटों से बीज माँगे, तो पहला बाजार दौड़ा, दूसरा तिजोरी में देखने गया तो सड़ गए थे, तीसरे ने खेत में से लाकर पिता का मन जीत लिया, इसी तरह धर्म रूपी बीज को संयम रूपी खेत में बो दो तो अनन्त गुना फलता है।
पुरुषार्थ
जिस प्रकार घर में आग लगने पर कुँआ खोदने का प्रयत्न करना व्यर्थ है, उसी प्रकार जब तक शरीर स्वस्थ है, जब तक वृद्धावस्था दूर है, जब तक इन्द्रियों में क्षमता है और जब तक आयु क्षय नहीं हुई है, तब तक बुद्धि मान को आत्म कल्याण के लिए महान प्रयत्न कर लेना चाहिए।
पुरुषार्थ
नाटक के पहले महीनों अभ्यास करते हैं तब थोड़ी देर के लिए रंगमंच पर सफल होते हैं, उसी प्रकार इन्द्रिय और कषाय को जीतने का अभ्यास कई भवों में करना पड़ता है तब सफलता (मुक्ति) मिलती है।
पुरुषार्थ
लक्ष्य एक साथ बनाया जाता है प्राप्त क्रम से किया जाता है।
पुरुषार्थ
आज का पुरूषार्थ कल भाग्य बन जाता है।
पुरुषार्थ